सुशासन की राह में कुछ चुनौतियां अभी शेष
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका संविधान और जनता का विश्वास होता है, लेकिन जब आम नागरिक को अपने ही अधिकार प्राप्त करने के लिए दफ्तर-दफ्तर भटकना पड़े, फाइलें महीनों तक धूल फांकती रहें और प्रक्रियाएं समाधान के बजाय समस्या बन जाएं तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर व्यवस्था किसके लिए है—जनता के लिए या स्वयं व्यवस्था के लिए? आज देश में डिजिटल शासन, पारदर्शिता और सुशासन की बातें खूब होती हैं। अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार भी हुए हैं। फिर भी नागरिकों के अनुभव बताते हैं कि कई जगहों पर अनावश्यक प्रक्रियाएं, लालफीताशाही, विवेकाधिकार का दुरुपयोग और जवाबदेही की कमी अब भी बड़ी चुनौतियां हैं। यही वह स्थिति है जिसे लोग प्रतीकात्मक रूप से ‘कागज़ी धंधा’ कहते हैं।
यह समस्या किसी एक विभाग, किसी एक सरकार या किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो तब जन्म लेती है जब नियम जनसेवा के बजाय नियंत्रण का माध्यम बन जाते हैं। जहां प्रक्रिया परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, वहां भ्रष्टाचार के लिए अवसर पैदा होते हैं और आम नागरिक सबसे अधिक पीड़ित होता है। किसान अपनी सब्सिडी के लिए, मजदूर अपने श्रम अधिकार के लिए, व्यापारी अपने लाइसेंस के लिए, छात्र अपनी छात्रवृत्ति के लिए और बुजुर्ग अपनी पेंशन के लिए यदि अनावश्यक बाधाओं का सामना करें, तो यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास का संकट भी है। सुशासन का अर्थ केवल नई योजनाओं की घोषणा नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है—सरल नियम, समयबद्ध सेवाएं, पारदर्शी निर्णय, प्रभावी शिकायत निवारण और प्रत्येक सार्वजनिक अधिकारी की स्पष्ट जवाबदेही। जिस दिन नागरिक को उसके वैध अधिकार के लिए किसी सिफारिश, दलाली या अनावश्यक दौड़-भाग की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, उसी दिन सुशासन का वास्तविक अर्थ साकार होगा। लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है व्यवस्था में सुधार। ईमानदार अधिकारी, जवाबदेह जनप्रतिनिधि, स्वतंत्र मीडिया, निष्पक्ष न्यायपालिका और जागरूक नागरिक—इन्हीं पांच स्तंभों पर सुशासन की मज़बूत इमारत खड़ी होती है।
सुधार की शुरुआत नागरिकों से भी होती है। यदि समाज रिश्वत देने को मजबूरी नहीं, बल्कि अस्वीकार्य व्यवहार माने, यदि शिकायत दर्ज कराने का साहस बढ़े, यदि पारदर्शिता की मांग जनआंदोलन बने और यदि सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित हो तो परिवर्तन अवश्य संभव है। संविधान केवल एक विधिक दस्तावेज नहीं, बल्कि राष्ट्र के नैतिक चरित्र का आधार है। उसकी गरिमा तभी सुरक्षित रहेगी जब शासन का प्रत्येक निर्णय जनता के हित, न्याय और समान अवसर की भावना से प्रेरित होगा। भारत को केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं बल्कि सुशासन की मिसाल भी बनना है। इसके लिए कागज़ी जटिलताओं, लालफीताशाही और भ्रष्ट प्रवृत्तियों पर लगातार प्रहार करना होगा। जब व्यवस्था जनता की सुविधा के लिए काम करेगी, तब लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ हर नागरिक के जीवन में दिखाई देगा। यही समय है कि हम व्यवस्था के विरोधी नहीं, बल्कि व्यवस्था में आवश्यक सुधार के समर्थक बनें क्योंकि मजबूत लोकतंत्र वही है, जहां कानून का सम्मान व पालन हो, जवाबदेही सुनिश्चित हो और नागरिक का सम्मान सर्वोपरि हो।
(युवराज फीचर्स)



