भारतीय युवा क्वांटम तकनीक में बढ़ाएं अपनी भागीदारी
भविष्य में क्वांटम तकनीक संचार और गणित में तेज़ी लाने के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था, रक्षा, स्वास्थ और वित्त के क्षेत्र में बड़े बदलाव की वाहक बनने जा रही है। भारत ने इस क्षेत्र में अपनी ताकत बढ़ाने की दृष्टि से 2023 में ही ‘राष्ट्रीय क्वांटम मिशन’ की शुरुआत कर दी थी। इसका लक्ष्य देश में क्वांटम कंप्यूटिंग, क्वांटम संचार, क्वांटम सेंसर और क्वांटम पदार्थों पर अनुसंधान को बढ़ावा देना है। इस अभियान के लिए हज़ारों-करोड़ों रुपए का प्रावधान किया गया है ताकि भारत इस उभरती हुई तकनीक की वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे न रह जाए। जिस तरह से इंटरनेट की सुविधा हासिल होने के बाद दुनिया डिजिटल संचार मानचित्र में बदल गई, उसी तरह क्वांटम तकनीक भी भविष्य में हमारी रोजमर्रा की ज़िंदगी को गहराई से प्रभावित कर सकती है। इसलिए यह तकनीक केवल वैज्ञानिकों की ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के भविष्य को तय करने का मापदंड साबित हो सकती है। क्योंकि भारत में 28 से 35 आयु वर्ग के युवाओं की संख्या 65 प्रतिशत और 15 से 29 आयु वर्ग के युवाओं की संख्या 27 फीसदी है।
दुनिया में इस समय तेज़ी से प्रगति हो रही है। कुछ समय पहले तक असंभव सी लगने वाली चीज़ें आज प्रौद्योगिकी की मदद से सरलता से परिणाम तक पहुंच रही हैं। एक समय संगणक के विकास ने प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव किया था। अब कृत्रिम बौद्धिकता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई) ने चिकित्सा से लेकर हथियारों के निर्माण तक हर क्षेत्र में कंप्यूटर और रोबोट के प्रयोग को नया आयाम दिया है। पारंपरिक कंप्यूटर की दुनिया में इस प्रगति के समानांतर एक और अनुसंधान चल रहा है, जिसका नाम है क्वांटम कंप्यूटिंग यानी अतिसूक्ष्मता का विज्ञान। भारत ने भी अब इस क्षेत्र में गति लाने का ऐलान कर दिया है। भौतिक शास्त्र के क्वांटम सिद्धांत पर काम करने वाली इस कंप्युटिंग में असीमित संभावनाएं देखी जा रही हैं। शोध के लिहाज से यह विषय किसी के लिए भी रुचि का विषय हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार एक पूर्ण विकसित क्वांटम कंप्यूटर की क्षमता सुपर कंप्यूटर से भी ज्यादा आंकी जा रही है। इस क्वांटम कंप्यूटिंग या मैकेनिक्स की खास बात यह है कि इसकी शुरुआत के बाद भारतीय और पश्चिमी वैज्ञानिक यह मान रहे हैं कि भारतीय भाववादी सिद्धांत को जाने बिना अणु में चेतना का आकलन नहीं किया जा सकता। क्वांटम भौतिकी और कृत्रिम बौद्धिकता एक तरह से चेतना के भाववादी सिद्धांत को ही अस्तित्व में लाने के उपाय हैं।
क्वांटम कंप्यूटिंग या यांत्रिकी एक लैटिन शब्द है। इसका अर्थ अतिसूक्ष्म कण है। इस विषय के अंतर्गत पदार्थ के अति सूक्ष्म कणों का अध्ययन किया जाता है। इनमें परमाणु न्यूक्लियस एवं इलेक्ट्रॉन व प्रोटॉन सभी मौलिक कणों का अध्ययन शामिल है। इसमें इनके व्यवहार और उपयोगिता का अध्ययन किया जाता है। इस नवीन विषय के अध्ययन की नींव 1890 में वैज्ञानिक मैक्स प्लांक ने डाली थी। हालांकि इस समय तक वैज्ञानिक यह मानकर चल रहे थे कि भौतिकी में जितने नियमों का आविष्कार होना था, लगभग हो चुका है। अब केवल इन नियमों को प्रत्येक जगह क्रियान्वित करना भर शेष है। किंतु कुछ प्रश्न तब भी ऐसे थे, जिनके हल खोजे नहीं जा सके थे।
विज्ञान ने पहले परमाणु को ही ऐसा सबसे सूक्ष्मतम कण बतलाया था, जिसने विश्व का निर्माण किया है। फिर आगे की खोज से ज्ञात हुआ कि परमाणु भी विभाजित हो सकता है यानी उसे और अत्यंत सूक्ष्म कणों में बांटा जा सकता है।
पारंपरिक कंप्यूटर बिट (अंश) पर काम करते हैं वहीं क्वांटम कंप्यूटर में प्राथमिक इकाई क्यूबिट यानी कणांश होती है। पारंपरिक कंप्यूटर में प्रत्येक बिट का मूलाधार या मूल्य शून्य और एक होता है। कंप्यूटर इसी शून्य और एक की भाषा में ही कुंजी पटल (की-बोर्ड) से दिए निर्देश को ग्रहण करके समझता है और परिणाम को अंजाम देता है। वहीं क्वांटम की विलक्षणता यह होगी कि वह एक साथ ही शून्य और एक दोनों को ग्रहण कर लेगा। यह क्षमता क्यूबिट की वजह से विकसित होगी। क्वांटम कंप्यूटर की क्षमता को देखते हुए इसके विकास में भारत समेत अनेक देश लगे हैं। यही वजह है कि आविष्कार से पहले इसकी क्षमताओं का मूल्यांकन कर लेने वाले देश इसके अनुसंधान पर बड़ी धन राशि खर्च कर रहे हैं। चीन ने 15 अरब डॉलर खर्च करने की घोषणा की है। यूरोपीय यूनियन इस क्षेत्र में करीब 8 अरब डॉलर खर्च कर रही है। भारत सरकार ने भी इस दिशा में शोध को बढ़ावा देने के लिए क्वांटम सूचना विज्ञान और प्रौधोगिकी संस्था का गठन तो पहले ही कर लिया था, लेकिन केवल क्वांटम तकनीक पर नवीन शोध और आविष्कार के लिए 2023-24 से 2030-31 तक चलने वाले इस अभियान पर इस 6003.65 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।
हैरानी इस पर भी है कि इस क्षेत्र में भविष्य की अपार संभावनाएं होने के बावजूद इस जटिल विषय की ओर युवा आकर्षित नहीं हो रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि कुशाग्र बुद्धि वाले जो विद्यार्थी कल्पनाशील विचार रखते हैं, उन्हें हतोत्साहित किया जाकर इस मेधा शक्ति को कंपनियों के पारंपरिक कार्यों में खपाया जा रहा है या सरकारी नौकरियां करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। अतएव भारत के इंजीनियरिंग तकनीक से शिक्षित युवा इस तकनीक में कौशल दक्षता दिखा सकते हैं।
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