कांग्रेस की लड़ाई शीघ्र थमती प्रतीत नहीं होती
शायर टी.एन. ‘राज’ का एक शे’अर है :
है यही जी में कि सब खानाजंगी में मरें,
मुल्क पे मिटने की ़खातिर खानदां कोई ना हो।
नि:संदेह यह शे’अर देश के लिए कुर्बानी के बारे में है, परन्तु मैं इसे यहां पंजाब के कांग्रेसी नेताओं की कांग्रेस के लिए कुर्बानी के संदर्भ में ही देख रहा हूं। कांग्रेस इस समय पूरी तरह अंतर्कलह में ही फंसी हुई है और सभी नेता कांग्रेस को जिताने के नाम पर अपनी-अपनी रोटियां सेंकने में लगे हुए हैं, परन्तु शायद वह यह नहीं सोचते कि यह अंतर्कलह कांग्रेस को कितना नुकसान पहुंचा सकती है और यह कांग्रेस की नाव को डुबो सकती है। इस तरह वे सभी मुख्यमंत्री बनते-बनते विधायक बनने से भी रह सकते हैं।
खैर, चाहे आज चन्नी गुट ने पंजाब कांग्रेस के प्रभारी भूपेश बघेल को मिलने का फैसला किया है, जिसका मीडिया में प्रभाव यह लिया जा रहा है कि चन्नी गुट के तेवर नर्म पड़ गए हैं, परन्तु वास्तविकता यह नहीं है, अपितु यह उस गुट की लड़ाई के दाव-पेंच का एक हिस्सा है। हमारी जानकारी के अनुसार ऐसा इसलिए किया गया है ताकि राहुल गांधी के पास खुली बगावत का प्रभाव न बने, क्योंकि वह भी कांग्रेस छोड़ने की रणनीति पर नहीं चल रहे। उनका लक्ष्य अब तक सिर्फ पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष अमरिन्दर सिंह राजा वड़िंग की जगह किसी अन्य को अध्यक्ष बनवाना था, परन्तु अब वह राहुल गांधी से पंजाब कांग्रेस का प्रभारी बदलने की मांग भी करेंगे। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा है कि डी.जी.पी. बार-बार यह बयान दे रहे हैं कि इस एस.एस.पी. को किसी कीमत पर नहीं हटाया जाएगा, परन्तु यह भी तो हो सकता है कि खुद डी.जी.पी. ही बदल दिया जाए। इसलिए चाहे फिलहाल दोनों में से कोई भी गुट कांग्रेस छोड़ने की बात नहीं कर रहा, परन्तु आज देर रात राहुल गांधी की देश वापसी के बाद यदि राहुल गांधी ने ज़मीनी हकीकत देख कर कोई बहुसम्मति या सर्वसम्मति वाला फैसला न किया गया तो पंजाब कांग्रेस दोफाड़ होने की ओर भी बढ़ सकती है।
जो डूबेगी किश्ती तो डूबेंगे सारे,
ना तुम ही बचोगे ना साथी तुम्हारे।
पंजाब कांग्रेस में विवाद बढ़ा कैसे?
रहबर की ़खता एक पल की भी,
सदियों पे भारी पड़ती है।
तुम इतना त़ग़ाफुल कर बैठे,
बात बिगड़ती जाती है।
—लाल फिरोज़पुरी
(त़ग़ाफुल =देरी, लापरवाही)
मैं राहुल गांधी से निजी रूप में मिला हूं, और उनकी समझ से प्रभावित भी हूं, परन्तु शायद वह एक राजनेता कम और एक विचारक तथा सवाल उठाने वाले व्यक्ति ज़्यादा हैं। जितनी भीतरी जानकारी पंजाब कांग्रेस की लड़ाई बारे मुझे मिली है, उसके अनुसार यह लड़ाई बढ़ने में राहुल गांधी की एक पल की गलती अधिक लगती है। राहुल गांधी के साथ अंतिम फैसला यह हुआ था कि चरणजीत सिंह चन्नी को प्रचार समिति का प्रमुख बनाया जाएगा और अमरिन्दर सिंह राजा वड़िंग को भी समान सम्मान देने के लिए एक समिति का प्रमुख बनाया जाएगा, परन्तु पहले नम्बर पर पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष विजय इन्द्र सिंगला या फिर किसी अड़चन की सम्भावना पर परगट सिंह को बनाया जाएगा।
यहां राहुल की एक पल की गलती यही मानी जा रही है कि वह स्वयं फैसला लागू करवाने की बजाय अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम पर विदेश चले गए। बाद में राजा वड़िंग तथा उनके समर्थक माने जाते भूपेश बघेल ने कांग्रेस संगठन प्रभारी के.सी. वेणुगोपाल के ज़रिये राहुल गांधी को संदेश भिजवाए कि यदि राजा वड़िंग को बदला गया तो पंजाब कांग्रेस में बड़ी फूट पड़ सकती है, क्योंकि लगभग सभी ज़िला अध्यक्ष राजा वड़िंग के पक्ष में हैं। इस पर राहुल गांधी ने राजा वड़िंग के लिए हां कर दी। चन्नी गुट तथा शेष वड़िंग विरोधी गुट इस घोषणा से हैरान रह गए। उनमें एकता बढ़ी और उन्होंने अपनी ताकत का प्रदर्शन किया, परन्तु दूसरी ओर भूपेश बघेल स्पष्ट रूप में राजा वड़िंग के पक्ष में सामने आए। हमारी जानकारी के अनुसार चन्नी तथा दूसरे समर्थक गुट रणनीति के तहत कि उनका कोई साथी टूटे न, भुपेश बघेल से मिलकर अपनी ताकत का प्रदर्शन तो करेंगे, परन्तु राहुल गांधी के समक्ष वे अब सिर्फ राजा वड़िंग को ही नहीं, अपितु भूपेश बघेल को बदलने की मांग भी करेंगे, जबकि दूसरी ओर राजा वड़िंग के समर्थक भी लगातार अपनी ताकत बढ़ाने तथा दिखाने में लगे हुए हैं।
सतलुज फिल्म तथा भाजपा नेता
वही है रंग मगर बू है कुछ लहू जैसी,
ये अब की फसल में खिलते गुलाब कैसे हैं?
—बशर नवाज़
आश्चर्यजनक बात है कि देश में लगभग दर्जन राजनीतिक लक्ष्य से प्रेरित फिल्में जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में भाजपा के हिन्दुत्व के एजेंडे को उभारती हैं, रिलीज़ हो चुकी हैं। इनमें ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरला स्टोरी’, ‘साबरमती रिपोर्ट’, ‘आर्टीकल 370’, ‘बस्तर-द नक्सल स्टोरी’, ‘जे.एन.यू.-जहांगीर नैशनल यूनिवर्सिटी’, ‘स्वतंत्र वीर सावरकर’ तथा ‘रज़ाकार’ जैसी कई अन्य फिल्में भी शामिल हैं। फिर भाजपा को क्या ज़रूरत पड़ी कि एक ऐसी फिल्म जो भाजपा पर सवाल खड़े करने की बजाय तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर सवाल खड़े करती है और सिखों तथा पंजाबियों पर हुए ज़ुल्म के एक कांड का फिल्मांकन है, को पहले तो सैंसर बोर्ड से सिनेमा में चलने की अनुमति ही नहीं मिलती और फिर यदि ओ.टी.टी. प्लेटफार्म पर रिलीज़ की जाती है तो दो दिन में पाबंदी लगा दी जाती है। यह रवैया भाजपा को लाभ नहीं पहुंचा रहा, अपितु सिखों तथा पंजाब के प्रति उसके रवैये बारे सवाल ही खड़े कर रहा है। इस तरह प्रतीत होता है या तो भाजपा ने पंजाब चुनाव में भी हिन्दू कार्ड खेलने का फैसला कर लिया है या फिर वह इस बारे में सचेत रूप में एक असमंजस वाली स्थिति पैदा करना चाहती है, क्योंकि उसके नेता भी कोई एक स्टैंड नहीं ले रहे, अपितु बिल्कुल एक-दूसरे के विरोधी बयान दे रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता आर.पी. सिंह कहते हैं कि फिल्म सैंसर बोर्ड से क्लियर नहीं थी। इसलिए सरकार ने इस पर पाबंदी लगाई है। अब गठित की गई रिव्यू कमेटी ही इस बारे फैसला करेगी। इसके विपरीत केन्द्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू कहते हैं कि फिल्म हटाने में भाजपा या सरकार की कोई भूमिका नहीं, परन्तु अगले ही पल वह दिलजीत सिंह दोसांझ पर तीव्र निजी हमले करते हैं और फिल्म को आधी सच्चाई भी बताते हैं। वह अपने दादा तथा पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की तस्वीर लगाने का विरोध भी करते हैं। जबकि पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों बिल्कुल ही अलग तथा फिल्म के पक्ष में स्टैंड लेते दिखाई दे रहे हैं। फिर यह भी आश्चर्यजनक बात है कि भाजपा के बहुत-से सिख नेता इस बारे पूरी तरह खामोश हैं और यह तो सब जानते हैं कि कई बार खामोशी अधिक ऊंची आवाज़ में अपने अर्थ बयां करती है।
प्रमुख सिख भाजपा नेताओं की भूमिका बदली
पिछले दिनों इन कालमों में लिखा था कि भाजपा ने अपने सिख तथा पंजाब मामलों बारे सलाहकार बदले हैं। हालात इस बात की भी पुष्टि करते प्रतीत होते हैं। अब फिल्म सतलुज के मामले में सिख मामलों बारे भाजपा के सबसे बड़े सलाहकार माने जाते भाजपा के राष्ट्रीय सचिव तथा दिल्ली के मंत्री मनजिन्दर सिंह सिरसा, राज्यसभा में पंजाब बारे सबसे अधिक सवाल उठाने वाले भाजपा सांसद सतनाम सिंह संधू तथा भाजपा के संसदीय बोर्ड के सदस्य एवं अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन इकबाल सिंह लालपुरा लगभग चुप हैं। हमारी जानकारी के अनुसार सिरसा की ताकत नहीं कम की गई, अपितु उन्हें किसी विवाद में न पड़ कर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए काम करने की बड़ी ड्यूटी सम्भाली गई है। वह अमित शाह तथा पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन की सलाहकार टीम में शामिल बताए जाते हैं। सतनाम सिंह संधू पार्टी की नीति निर्धारण तथा विकास के एजैंडे वाली टीम में शामिल हैं और वह पीछे रह कर चुपचाप ‘इंडियन माइनॉरिटीज़ फाऊंडेशन’ के ज़रिये अल्पसंख्यकों तथा सिखों को भाजपा के साथ जोड़ने के एजैंडे पर काम कर रहे हैं। जबकि लालपुरा बारे कहा जाता है कि वह तब तक बयान देने से गुरेज़ ही करते हैं जब तक उन्हें पार्टी द्वारा संकेत न दिया जाए। इस समय पंजाब तथा सिख मामलों पर भाजपा की ओर से बोलने की ज़िम्मेदारी शायद आर.पी. सिंह, सांसद तरुण चुघ तथा पंजाब भाजपा के अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों को सौंपी हुईर् है।
-मो. 92168-60000



