धार्मिक स्थलों के फंड जन-कल्याण के लिए खर्च किए जाएं

बचपन से सिखाया जाता है कि ईश्वर, वाहे गुरु, अल्लाह, यीशु या किसी भी धर्म के संस्थापक दु:खों का निवारण करते हैं और कर्मों का फल देने की शक्ति रखते हैं, इसलिए उनका स्मरण करना ही दिन का सबसे पहला काम था। यह सामान्य व्यक्ति के लिए उसके धर्म के पालन की बात है।  किसी को नहीं मानते यानी नास्तिक भी घोर संकट से घिरने पर परम शक्ति का महत्व समझ जाते हैं और प्रार्थना करने लगते हैं। 
अरबों रुपये का चढ़ावा : धार्मिक तीर्थस्थल अब अर्थव्यवस्था के रूप में ढलते जा रहे हैं। चढ़ावा और संपत्ति लाखों करोड़ों में और अनुयायिओं तथा दर्शनार्थियों की संख्या में अद्भुत वृद्धि ने व्यावसायिक गतिविधियों को सुगम बना दिया। धार्मिक पर्यटन के नाम पर बड़ा व्यापार होने लगा। दुनिया का तीसरा सबसे अमीर संस्थान तिरुपति बालाजी है। सौ देशों की जीडीपी से बड़ा इसका धन भंडार है। आमदनी का ऑडिट और राज्य विधान मंडल में बजट पेश होता है। पद्मनाभस्वामी की लगभग पूरी सम्पत्ति तहखाने में बंद रहती है और उच्चतम न्यायालय की समिति इसकी रिपोर्ट करती है।  इसकी एक तिजोरी बंद है और कभी सार्वजनिक रूप में ऑडिट नहीं हुआ। जगन्नाथ मंदिर अभूतपूर्व आस्था का केंद्र है। इसके नाम 24 ज़िलों में 60 हज़ार एकड़ ज़मीन है। इसका किराया, लीज़ का धन कहां और किस रूप में है, इसकी जानकारी कम ही लोगों को है। सभी धार्मिक स्थल अपनी आय का बड़ा हिस्सा जनता के लिए खर्च करते हैं और स्कूल, अस्पताल आदि का निर्माण करते हैं। 
सुविधाएं : दो वर्ष पहले चार धाम की यात्रा करने के बाद निश्चय किया कि अब कभी नहीं आया जाएगा। हालांकि इन सभी धामों के पास करोड़ों की धन-संपत्ति है, लेकिन मंदिर तक पहुंचना बहुत कठिन है। 70-80 की उम्र वालों को संतुलन बिगड़ने पर साक्षात यमलोक के दर्शन हो सकते हैं। दिल्ली के बड़े हनुमानजी का मंदिर विश्व विख्यात है। मंगलवार को इतनी लंबी लाईन लगती है कि श्रद्धालु अपनी जेब और मोबाइल संभालने में ही लगा रहता है। मूर्ति तक पहुंचने में बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। यहां दान की जो रसीद मिलती है, उसमें कोई कार्बन कॉपी या स्लिप नहीं होती। नकद दान खातों में चढ़ता है या नहीं, यह गोपनीय है।  तिरुपति हो या सिद्धिविनायक अथवा वैष्णो देवी कहीं भी दर्शन आसानी से नहीं हुए। दुबई के पास आबू धाबी के राम मंदिर में हालांकि बहुत भीड़ थी, लेकिन दर्शन से लेकर परिक्रमा तक कोई असुविधा नहीं हुई। वहां मस्जिद में जाने का अनुभव यादगार था। वेटिकन सिटी में जाना भी स्मरणीय रहा, जिसका अन्य ईसाई धार्मिक स्थलों से कोई मुकाबला नहीं।
प्रश्न उठाना चाहिए : जब इतनी अधिक मात्रा में इन सभी धार्मिक स्थलों के पास धन है, तो वह दर्शनार्थियों और यात्रियों की सुविधाओं पर खर्च क्यों नहीं होता, क्या बैंकों या तहखानों में रखा धन उन लोगों का नहीं है, जो अपनी आस्था और श्रद्धा के कारण इन खज़ानों को भरते हैं? दुनिया के धनाढ्य स्थलों में गिन लिया जाना कोई ऐसी उपलब्धि नहीं जिस पर गर्व हो, बल्कि यह श्रद्धालुओं का अपमान और उनके साथ होने वाली धोखाधड़ी है। अयोध्या के राम मंदिर में गबन की घटना अकेली नहीं है, तिरुपति में एक क्लर्क पर सौ करोड़ गबन का आरोप लग चुका है। सिर्फ हिंदू आस्था केंद्र ही नहीं मुस्लिमों के वक्फ बोर्ड भी अमानत में खयानत करते हैं। गुरुद्वारों और जैन मंदिरों में हेराफेरी कभी नहीं हुई, क्योंकि सेवा मॉडल पर इनका प्रबंध होता है।  आस्था बचे, घोटाला बंद हो, इसके लिए राष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन और धर्मस्थल ट्रस्ट होना चाहिए, जो शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) की तरह सेवा मॉडल पर आधारित हो न कि खज़ाना मॉडल पर। 
इतिहास गवाह है कि खज़ाने की लूट होती है, जबकि सेवा हमेशा दान की भावना से होती है।  हादसों पर प्रकृति का प्रकोप नहीं, ‘ज़िम्मेदार’ तय हो और कठोर सज़ा का प्रावधान। ‘डिजिटल दर्शन-डिजिटल दान’ अनिवार्य किया जाए। 1000 रुपये से अधिक दान सिर्फ  यूपीआई या कार्ड पेमेंट से हो। हर दान की रसीद तुरंत एसएमएस पर भेजा जाए। साथ ही वैबसाइट पर एक लाइव ‘दान आऊंटर’ हो। श्रद्धालुओं को पता हो कि उनके दान का पैसा क्हां गया। हर टिकट/रजिस्ट्रेशन के साथ 5 लाख रुपये का दुर्घटना बीमा तथा एक 24×7 हेल्पलाइन हो। मेडिकल, शौचाल्य और पानी की सुविधा हो। केदारनाथ व वैष्णो में ऑक्सीजन बूथ होने चाहिएं। बुजुर्ग-दिव्यांग के लिए रोप-वे/पालकी रेट निर्धारित हों। 
तीर्थ स्थानों का आय का पैसा सेवा में लगे, दान का 30 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय बुनियादी ढांचे में लगना चाहिए। तिरुपति के पास 18,000 करोड़ रुपये एफ डी है, परन्तु पैदल रास्ते में लाइट की कमी है। ऑडिट हर 6 महीने में और वेबसाइट पर खर्च का ब्योरा होना डालना चाहिए। यह नियम सभी धर्मों के ट्रस्टों पर लागू हो और ट्रस्टियों की संपत्ति घोषित हो। किसी भी स्तर पर सरकार का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। किसी भी राजनीतिक पार्टी का नेता ट्रस्ट में शामिल न हो और किसी को भी कोई विशेषाधिकार न मिले।  हज के सुविधाजनक बनने से आस्था कम नहीं हुई। वेटिकन में ऑडिट है, इसलिए भरोसा बढ़ा। भारत में अगर ‘कष्ट’ को ‘ब्रांड’ बनाएंगे तो पर्यटक आएंगा, परन्तु विश्वास नहीं बचेगा।

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