कश्मीर की वादियों में स्थित रागन्या देवी मंदिर

वार्षिक खीर भवानी मेले में हिस्सा लेने के लिए मैं ज्येष्ठ अष्टमी (22 जून 2026) को खीर भवानी मंदिर में था, जो श्रीनगर के निकट तुल्लामुल्ला (जिसे तुलमुल भी कहते हैं), गंदरबल, जम्मू-कश्मीर में स्थित है। इस मंदिर से संबंधित एक पौराणिक कथा यह है कि रावण ने रागन्या देवी का भव्य मंदिर श्रीलंका में बनवाया, लेकिन देवी रावण की करतूतों से नाराज़ थीं, उन्होंने श्रीलंका को हमेशा के लिए छोड़ने का निर्णय लिया, इसलिए उन्होंने खुद को एक पत्थर के टुकड़े में परिवर्तित किया और हनुमान जी से कहा कि वह उन्हें हिमालय में ले जायें। देवी के निवास हेतु एक अच्छी जगह तलाश करते हुए हनुमान जी को तुल्लामुल्ला में एक चश्मे के निकट उचित जगह महसूस हुई; उन्होंने देवी को वहीं स्थापित कर दिया। समय के साथ उस जगह वर्तमान खीर भवानी मंदिर का निर्माण हो गया। हालांकि रागन्या देवी दुर्गा का रूप हैं, लेकिन कश्मीर में वह वैष्णव रूप में हैं।
रागन्या देवी के मंदिर को खीर भवानी इसलिए कहा जाता है; क्योंकि यहां पवित्र चश्मे पर दूध व उससे बनी खीर चढ़ाने की प्रथा है। इस चश्मे के बीच में मंदिर है। हर साल मई-जून में इस मंदिर में ज्येष्ठ अष्टमी उत्सव का आयोजन किया जाता है। रागन्या देवी के (कश्मीरी पंडित) भक्तों के लिए पूर्णिमा के चांद से आठवें दिन का बहुत अधिक महत्व है। दरअसल, खीर भवानी मंदिर जाने का इरादा मैंने एक अन्य वजह से भी किया था। किशोरावस्था में विद्रोही स्वभाव होना स्वाभाविक है। मैं भी विद्रोही था और हर किशोर की तरह ज़रा से संघर्ष से संसार को बदलने के सपने देखता था लेकिन मुझे यह विद्रोही-शैली सड़क छाप लगती थी। मेरे आदर्श स्वामी विवेकानंद हैं, जो कभी झुके नहीं, कभी कमज़ोर नहीं पड़े और कभी गलत राह पर नहीं चले। मैं उन्हीं की किताबों को पढ़कर अपने ही क्रांति-मार्ग की तलाश कर रहा था। मैंने पढ़ा कि अपनी यात्राओं के दौरान स्वामी जी कश्मीर के खीर भवानी मंदिर में भी गये थे, जहां उन्हें ऐसे चमत्कारिक आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति हुई कि उनका जीवन-दर्शन ही बदल गया। मैंने भी खीर भवानी जाने का इसलिए इरादा किया।
1898 में स्वामी जी अपनी यात्राओं के दौरान कश्मीर के इसी प्राचीन मंदिर में गये थे। उन्होंने देखा कि मंदिर जर्जर स्थिति में है। मां दुर्गा के भक्त स्वामी जी हताशा व निराशा से भर गये। उन्होंने खुद से कहा, ‘अगर मेरे पास संसाधन होते तो मां के लिए यहां विशाल व भव्य मंदिर का निर्माण करा देता।’ और तभी उन्होंने देवी मां की आवाज़ सुनी, जो उन्हें डांटती हुई कह रही थीं, ‘क्या तुम यह सोचते हो कि मैं यहां अपने लिए सोने का सात मंज़िला मंदिर नहीं बनवा सकती? मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी या तुम मेरी रक्षा करोगे?’ और इस तरह स्वामी जी ने अपने जीवन का बुनियादी सबक सीखा। इसी से प्रेरित होकर मैं कभी मंदिरों में पैसा नहीं चढ़ाता हूं या जिसे ‘दान’ का वीभत्स नाम दिया जाता है- मैं इस यूनिवर्स के रचनाकार को क्या दूंगा, उसके पास क्या नहीं है?
बहरहाल, स्वामी जी के इसी अनुभव की वजह से, मेरे अंदर के क्रांतिकारी ने मुझे खीर भवानी जाने के लिए प्रेरित किया। लेकिन सरकारी दावों के बावजूद कश्मीर जाना आज भी इतना आसान तो है नहीं कि पास के स्टेशन पर जाकर बस में बैठो और पहुंच जाओ, विशेषकर पहलगाम की निंदनीय घटना के बाद। मैं पहले जम्मू गया और फिर वहां से श्रीनगर पहुंचा जहां मेरे एक दोस्त के पिता वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में तैनात हैं। कश्मीर में अकेले निकलने की हिम्मत मैं जुटा नहीं पा रहा था, खासकर डाउनटाउन श्रीनगर व हाइवेज पर। यूं कहा जा सकता है कि मैं श्रीनगर में अपने ही ‘डर-प्रेरित कर्फ्यू’ में था और ज्यादा से ज्यादा हाई सिक्योरिटी ज़ोन के मकान में 500-गज़ के दायरे में ही चहलकदमी कर रहा था। 
खीर भवानी मंदिर श्रीनगर से लगभग 30 किमी के फासले पर है। वहां तक जाने के मेरे पास केवल दो ही विकल्प थे- पूर्ण गुमनामी में या भारी पुलिस सुरक्षा में। पहले विकल्प को मैंने तुरंत रद्द कर दिया क्योंकि उसमें अपनी ही फौज द्वारा कुछ का कुछ समझे जाने का खतरा अधिक था, कम से कम मुझे। दूसरा विकल्प नाज़ुक हालात की वजह से स्थगित कर दिया, खासकर इसलिए कि गार्ड्स रात में ही कुछ फ्री होते थे और उस समय इतनी दूर तक ड्राइव करना खतरे से भरा था। 
लेकिन शायद देवी मां ने मेरी स्थिति को समझा और खास ज्येष्ठ अष्टमी (22 जून 2026) के दिन अपने दर्शन हेतु मेरे लिए रास्ता निकाल दिया। मैं सुबह नाश्ता कर रहा था कि तभी एक इमाम साहब अंकल से मिलने के लिए आये। वह 18 जून 2026 को ही सऊदी अरब से हज (मक्का व मदीना की तीर्थयात्रा) करके लौटे थे और अंकल के लिए प्रसाद (खिजूर व ज़मज़म चश्मे का पानी) लेकर आये थे। चाय पीते हुए इमाम साहब ने मुझसे सवाल किया कि मैंने कश्मीर में क्या क्या देखा? मैंने जवाब दिया, ‘मैं सैर-सपाटे के लिए नहीं आया हूं, सिर्फ खीर भवानी जाना चाहता हूं और जाने के लिए कोई रास्ता नहीं निकल पा रहा है।’ इमाम साहब बोले, ‘मेरे साथ मेरी कार में चलो, कश्मीर में मुझे कौन रोकेगा, तुम पूरी तरह से महफूज़ रहोगे।’ मैंने अंकल की तरफ देखा, उन्होंने अनुमति दे दी।
मैं इमाम साहब के साथ उनकी कार में बैठ गया। कार उन सड़कों व गालियों से होते हुए आगे बढ़ने लगी जिन पर पुलिस व सेना भी एलएमजी (लाइट मशीन गन) से लैस गाड़ियों के बिना जाने का साहस नहीं करती हैं। इमाम साहब कार में बैठे इंतज़ार करते रहे और मैं लगभग दो घंटे तक खीर भवानी मंदिर में टहलता हुआ उन लम्हों की कल्पना करता रहा जब देवी मां ने स्वामीजी को डांट लगाते हुए दिव्य ज्ञान से मालामाल किया था। श्रीनगर के असुरक्षित क्षेत्रों में लम्बी दाढ़ी वाले इमाम साहब के साथ सुरक्षित वापस लौटते हुए मैं सोच रहा था कि अंकल पुलिस अधिकारी हैं, लेकिन रागन्या देवी ने मेरी हिफाज़त की ज़िम्मेदारी अपने किसी अन्य बेटे को दी है। मुझे देवी मां के 128 वर्ष पुराने स्वामीजी से कहे शब्द याद आ गये- ‘मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी या तुम मेरी रक्षा करोगे?’ और यह तो प्रश्न भी नहीं है, है न?
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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