अपने हिस्से की ज़िंदगी
(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)
भीरिया ने पहली मीटिंग में ही बॉस के सामने अपनी बातें रख दी थी। सब चुप थे, लेकिन रिया ने डरे बिना बोला। आलोक उसे देखता रह गया था। उसे लगा इस लड़की में कोई अलग ही ताकत है। धीरे-धीरे दोनों की बातचीत शुरू हुई। पहले ऑफिस की बातें, फिर धीरे-धीरे ज़िंदगी की बातें। रिया ने बताया कि उसने भी एक नौकरी छोड़ी थी। उसके परिवार ने भी उसे समझाया था, ताने मारे थे। लेकिन उसने नहीं सुना।
रिया अक्सर कहती, ‘आलोक, ज़िंदगी किसी और के हिसाब से नहीं जी जाती। लोग तुम्हें उस रास्ते पर चलने को कहेंगे जो उन्होंने चला है। लेकिन तुम्हारी ज़िंदगी तुम्हारी है। अगर जीनी है, तो अपने दिल की सुनो।’
आलोक मुस्कुरा देता, लेकिन अंदर से वह जानता था कि उसमें इतना साहस नहीं है। वह डर से घिरा हुआ था। असफल होने के डर से, गिरने के डर से, लोगों की बातों के डर से।
एक शाम दोनों ऑफिस के बाहर चाय पी रहे थे। आसमान ने लालिमा ओढ़ राखी थी। रिया ने अचानक पूछा, ‘तुम खुश तो हो ना, अपनी ज़िंदगी से?’
आलोक ने चाय का घूंट लिया। कुछ पल चुप रहा। फिर पहली बार सच कहा, ‘नहीं...मैं खुश नहीं हूं। शायद कभी था भी नहीं।’
यह कहते ही उसे अजीब सा हल्कापन महसूस हुआ जैसे सालों से छाती में दबा हुआ कोई पत्थर हट गया हो।
रिया ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा, ‘तो बदलो इसे। कोई और आकर तुम्हारी ज़िंदगी नहीं बदलेगा। ना मैं, ना तुम्हारे परिवार वाले। तुम्हें खुद उठना होगा, खुद लड़ना होगा, खुद अपनी ज़िंदगी की कहानी गढ़ना होगा।’
‘कहानी?’ आलोक ने हैरत से पूछा।
रिया मुस्कुराई, ‘हां, कहानी। शतरंज की रानी जैसे सबसे ताकतवर मोहरा होती है खुद का रास्ता खुद बनाती है। तुम्हें भी वैसे ही जीना होगा।’
रिया की यह बात आलोक के दिल में उतर गई। पहली बार उसने महसूस किया कि वह अपनी ही ज़िंदगी का कैदी बन गया है और इस जेल की चाबी उसके अपने हाथ में है।
उस रात वह सो नहीं पाया। छत पर बैठकर उसने अपने बचपन के सपनों को याद किया। वह एक लेखक बनना चाहता था। कहानियां लिखना चाहता था, लोगों के दिलों को छूना। अपने शब्दों से दुनिया बदलना...यही उसका असली सपना था। लेकिन उसने क्या किया? उसने अपने सपनों को मारकर एक सुरक्षित रास्ता चुन लिया। और अब वो सुरक्षित रास्ता भी उसे तोड़ रहा था धीरे-धीरे, अंदर से।
अगले दिन ऑफिस में बैठा वह फाइलों के बीच घुट रहा था। एसी चल रही थी, लेकिन उसे ठंडक नहीं मिल रही थी। हर शब्द उसे बेगाना लग रहे थे। उसकी उंगलियां की बोर्ड पर रुकी हुई थीं, लेकिन दिमाग कहीं और था। तभी उसने एक फैसला लिया। उसने तुरंत अपना इस्तीफा लिख दिया। हाथ कांप रहे थे... दिल जोर से धड़क रहा था... पूरा शरीर पसीने से तर था...लेकिन इस बार उसने डर को खुद पर हावी नहीं होने दिया। उसने डर को पी लिया पहली बार।
जब उसने अपने बॉस को इस्तीफा दिया, तो सब चौंक गए।
‘क्या पागलपन है ये?’
‘इतनी अच्छी नौकरी क्यों छोड़ रहे हो?’
‘एक दिन तुम्हें पछताना पड़ेगा अलोक, अपने फैसलों पर।’
लेकिन इस बार आलोक के चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी। वो शांति जो किसी तूफान के बाद आती है, जब आसमान साफ हो जाता है। घर पहुंचकर उसने अपने पिता को सब बता दिया। घर में तूफान आ गया।
‘तुम्हें समझ नहीं है ज़िंदगी की!’ पिता की आवाज गूंजी।
‘हमने तुम्हारे लिए क्या-क्या नहीं किया... एक छोटी सी नौकरी भी नहीं कर पाए तुम?’
‘लिखोगे? कलम से पेट भरेगा?’
मां की आंखों में आंसू थे और पिता के शब्द तीर की तरह चुभ रहे थे, लेकिन इस बार आलोक जानता था कि ये तीर चोट पहुंचाते हैं, लेकिन मारते नहीं।
आलोक चुपचाप सब सुनता रहा। फिर उसने धीमी स्वर में कहा, ‘पापा, मैं अब और समझौता नहीं कर सकता। मैं अपनी ज़िंदगी जीना चाहता हूं...अपने सपनों के साथ। अगर मैं गिरूंगा, तो खुद गिरूंगा। लेकिन कम से कम मरते दम तक जी भी लूंगा।’
उस रात घर में सन्नाटा था। रसोई में मां की चम्मच बर्तनों से टकराने की आवाज भी नहीं आई। पिता अपने कमरे में बैठे रहे। और आलोक छत पर तारों के नीचे पहली बार खुद को आजाद महसूस कर रहा था। आने वाले दिन आसान नहीं थे। नौकरी छूट गई थी, बचत कम थी, और समाज की बातें अलग। रिश्तेदार ताने मारते, ‘लिखने से कभी घर चलता है?’ (क्रमश:)



