अपने हिस्से की ज़िंदगी
भीड़भरी सड़क पर हर दिन संवेदनाओं का एक रेला गुजरता है। हजारों चेहरे, हजारों मंज़िलें, लेकिन हर चेहरे के पीछे एक नितांत निजी संसार जो अनकही कहानियों और अदृश्य बोझ तले दबा हुआ है। भीड़ के इस समंदर में झांकें, तो किसी की आंखों में वर्षों की थकी हुई उदासी तैरती नज़र आती है, तो किसी के माथे की लकीरों में भविष्य की चिंताओं का जाल बुना हुआ दिखता है। कुछ चेहरे तो ऐसे भी हैं, जिन पर एक अजीब-सा शून्य पसरा रहता है। एक ऐसा खालीपन, जो यह चीख-चीख कर कहता है कि इंसान भीड़ का हिस्सा होकर भी भीतर से कितना एकाकी हो सकता है।
आलोक भी एक ऐसा ही लड़का है, जिसकी आंखों में अनगिनत सपने हैं। इतने बड़े कि अक्सर वे यथार्थ की ऊंची दीवारों से टकराकर दरकने लगते हैं। स्वभाव से शांत और पढ़ाई में मेधावी आलोक का घर छोटा था, पर उसकी मजबूरियां बहुत विशाल। उसके घर की दीवारें वक्त से पहले ही जर्जर हो चुकी थीं, मानो संघर्षों की मार सहते-सहते उन्होंने भी घुटने टेक दिए हों। बरसात के दिनों में छत से टपकती बूंदें सिर्फ मकान की बदहाली नहीं बताती थीं, बल्कि यह अहसास दिलाती थीं कि इस परिवार की परेशानियां भी ठीक उसी तरह निरंतर और अविराम हैं।
उसके पिता एक छोटी सी सरकारी नौकरी में थे। तनख्वाह इतनी थी कि महीने की ज़रूरतें बस किसी तरह पूरी हो जाएं, लेकिन इच्छाएं हमेशा अधूरी रह जातीं। जिम्मेदारियों का बोझ उनके कंधों पर साफ दिखाई देता था, भले ही वे उसे शब्दों में कभी व्यक्त न करते हों। मां...इस घर की असली धुरी थी। सुबह से रात तक उनका दिन बस काम में बीत जाता। चूल्हा-चौका, कपड़े, सफाई, और परिवार की हर छोटी-बड़ी ज़रूरत के लिए हमेशा तत्पर रहती। उनके पास खुद के लिए समय जैसे कभी था ही नहीं। उनकी उंगलियां सूखकर खुरदुरी हो गई थीं, जैसे हर रेखा में त्याग की कहानी लिखी हो। लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति हमेशा बनी रहती। वो शांति जो खुशी से नहीं, बल्कि हालात से समझौता कर लेने के बाद आती है।
आलोक जब उन्हें देखता, तो उसे अपने सपनों का बोझ और भी भारी लगने लगता...क्योंकि अब वो सिर्फ उसके नहीं रहे थे, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीद बन चुके थे। घर में हमेशा एक ही बात दोहराई जाती, ‘बेटा, ज़िंदगी समझौते का नाम है। जो मिले, उसी में खुश रहो। संतोषी सदा सुखी।’
पिता यह बात इतनी ठंडी आवाज में कहते कि लगता जैसे कोई सच बता रहे हों। कोई ऐसा सच जिसे उन्होंने अपनी कमर सीधी करके स्वीकार कर लिया हो। लेकिन आलोक के दिल में कहीं न कहीं यह बात चुभती रहती। वह रात को छत पर बैठकर तारों को देखता और सोचता, क्या सच में ज़िंदगी समझौता ही है? क्या इंसान अपने सपनों का मालिक नहीं हो सकता? क्या हर उस इंसान की कहानी समझौते पर खत्म होती है जिसके पास पैसे नहीं हैं?
बचपन में जब दूसरे बच्चे गलियों में गेंद उछालते, आलोक कोने में बैठकर डायरी में कुछ लिखता रहता। कहानियां बनाता, उड़ने वाले घोड़ों की, बादलों से बात करने वाले बच्चों की, उन दुनिया की जो असली नहीं थीं लेकिन उसे ज़िंदगी से ज्यादा सच लगती थीं। मां ने एक बार उसकी डायरी उठाकर देख लिया था। कुछ पन्ने पढ़कर उनकी आंखें चमक उठी थीं। लेकिन फिर पिता की आवाज़ आई, ‘यह सब करने से नौकरी नहीं लगेगी। किताबें पढ़ो बेटा, किताबें।’
मां ने डायरी वापस रख दी थी चुपचाप। बिना कुछ कहे। लेकिन उस दिन आलोक ने मां की आंखों में एक अजीब सी बेचैनी देखी थी जैसे वह खुद भी कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन कह नहीं पाईं। शायद उनकी अपनी एक कहानी थी जो अधूरी रह गई थी। शायद कोई सपना जो वह कभी बयां नहीं कर पाईं थीं।
कॉलेज खत्म होने के बाद आलोक ने अपनी डायरी आलमारी के किसी कोने में दबा दी थी। उसने सोचा शायद उसके पिता सही कहते हैं। शायद सपने देखने वालों को ही तोड़ा जाता है। काफी मशक्कत के बाद आलोक को एक बड़ी कम्पनी में नौकरी मिल गई थी। घर में खुशियों की लहर दौड़ गई। पिता गर्व से भर उठे। पहली बार उन्होंने आलोक के कंधे पर हाथ रखा। उस हाथ में एक अजीब सा स्नेह था जो आलोक ने पहले कभी महसूस नहीं किया था। मां की आंखों में सुकून था। वो सुकून जो एक मां को तब मिलता है जब उसे लगता है कि उसका बच्चा अब सुरक्षित है।
लेकिन वह नौकरी उसके सपनों की नहीं थी। वह सिर्फ एक मजबूरी थी। एक ऐसी मजबूरी जिसे उसने खुशी का नाम दे दिया था। हर सुबह छह बजे अलार्म बजता। वह उठता, तैयार होता, भीड़ भरी बस में सफर करता, ऑफिस पहुंचता। और फिर वही फाइलें, मीटिंग्स, बॉस की डांट, कलीगों का झगड़ा। शाम को जब वह घर लौटता, तो लगता जैसे कोई उसकी जान चूसकर ले गया हो। वह खुद को आईने में देखता और सोचता, ‘क्या यही वो ज़िंदगी है, जो मैंने चाही थी? क्या मैं तीस साल बाद भी यही करूंगा? फाइलें देखूंगा, लोगों की बातें सुनूंगा, और एक दिन ऐसे मर ही जाऊंगा जैसे कभी जी ही नहीं पाया?’
कभी-कभी रात को वह अपनी पुरानी डायरी निकालता। पीले पड़ चुके पन्नों पर उसके बचपन के शब्द लिखे हुए थे। वह उन्हें पढ़ता और एक अजीब सी कसक महसूस करता जैसे कोई उसका अपना हिस्सा उससे छीन लिया गया हो। एक दिन ऑफिस में एक नई प्रोजेक्ट मीटिंग थी। उसी मीटिंग में उसकी मुलाकात रिया से हुई। रिया एक फ्री लांसकंसल्टेंट थी। आत्मविश्वास से भरी हुई, अपनी शर्तों पर जीने वाली लड़की। उसके बाल खुले थे, आंखों में एक अलग ही चमक थी। वह चमक तब होती है जब कोई इंसान खुद के लिए जी रहा हो। (क्रमश:)



