राजनीति
सफाई की बात निकली है तो झाड़ू की बात करनी होगी। ये वही झाड़ू है। जिसका कभी स्वर्ण युग का समय था। लोग इसके आजू-बाजू डोलते थे। आज झाड़ू बेकार में ही गिरी पड़ी है। जिनको ताकत का गुमान है। और जो कभी राजनीति के चंद्रगुप्त थे। वो अब खाक छान रहे हैं। उस देश में जहां हमाम में सब नंगे हों।
वहां झाड़ू और साफ-सफाई की बातें कोरी बकवास ही लगती हैं। या हम सफाई की बात को परीलोक की कहानी मान लेते हैं। भ्रष्टाचार में हम नहीं डूबे हैं। बल्कि भ्रष्टाचार हममें डूबा है। लिहाजा सफाई की बात बेमानी है। साफ केवल नेताओं के कपड़े हैं। बाकी सब सब्जबाग है। मीरिचिका है। सफाई सिर्फ तिलस्म है। इसके अलावे और कुछ नहीं। तिलस्म स्थायी नहीं होता है। देश कभी साफ होगा। ये केवल दिवास्वप्न है, लेकिन इधर झाड़ू से उम्मीद बंधी थी। सबको मालूम है कि बिना झाड़ू के सफाई नहीं हो सकती। लिहाजा झाड़ू ज़रूरी थी।
लेकिन झाड़ू के दिन अभी खराब चल रहें हैं। लिहाजा क्रिकेट की भाषा में अगर हम कहें तो झाड़ू अभी बैकफुट पर भी नहीं खेल रही है। लिहाजा वो अभी रजनीति की पिच से बाहर हो गई है। यही हाल हाथ का है। डेढ़ दशक पहले इसी झाड़ू ने हाथ को ठेलकर राजनीति के पिच से बाहर धकेल दिया था। वही झाड़ू अब अपने दिन गिन रही है। मुफ्त की बस और सस्ती शराब भी झाड़ू को नहीं बचा पाई। एक समय था कि झाड़ू को लोग हाथ से पकड़कर चलाते थे। झाड़ू से लोगों को प्रेम था। लेकिन जनता का मूड कपूर की तरह होता है। धीरे-धीरे उड़ जाता है। कभी झाड़ू को चलाने के लिए हाथ का होना ज़रूरी था। हाथ अभी खुद बैसाखियों पर चल रही है। इधर झाड़ू किसी को रास नहीं आ रही है। पहले जनता ने और अब सांसदों-विधायकों ने झाड़ू को लताड़ दिया है। सुराख वाली नाव में बैठना कहां की अक्लमंदी है।
लिहाजा सब लोग भाग रहें ह़ैं। नाव से कूदकर। वैसे भी सबके बस की बात नहीं है कि वो अकेले ही सफाई कर दे। वो भी तब जब सौ में पिच्यानवे बेईमान हैं हमारे देश में। राजनीति में झाड़ू को लोग पसंद नहीं करते। लोगों का मूड बदल गया है। राजनीति करने वाले लोग झाड़ू का नहीं बल्कि पाईपों का इस्तेमाल करते हैं। झाड़ू ने जिस तरह से सफाई करी थी। और एक साफ-सुथरा माहौल बनाया था। लोगों को दो सौ यूनिट फ्री की बिजली, फ्री का पानी, फ्री की स्वास्थ्य सुविधाएं। बच्चों के लिए जिस तरह से वर्ल्ड क्लास स्कूल बनवाये थे। लोगों को रास नहीं आया। कहा जाता है कि जैसे मुफ्त के खाने में लोगों को स्वाद नहीं मिलता है। जो चीज सहज ही उपलब्ध हो उसकी लोग कीमत नहीं समझते। वैसे ही मुफ्त की योजनाओं से लोगों ने कन्नी काट ली है।
होना कुछ नहीं है। वैसे लोग जो दूध की वैन पलटने पर दूध लूटने लग जाते हैं। तेल का टैंकर पलट जाए तो गैलन लाने घर की तरफ दौड़ पड़ते हैं। वैसे लोग आपको भ्रष्टाचार पर बात करते हुए किसी चाय की दुकान पर मिल जाएंगे!
-मेघदूत मार्केट फुसरो ,बोकारो झारखंड
पिन 829144



