बदलने वाली है दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों की राजनीति 

भारतीय समाज की बहुलता और विविधता किसी को भी चक्कर में डाल देने वाली है। इसकी पेचीदगियां इतनी ज्यादा हैं कि हम भारतवासी भी इन्हें पूरी तरह से जानने का दावा नहीं कर सकते। इस देश को समझने के लिए हम सभी को एक ऐसी स्कीम बनानी पड़ती है जिससे श्रेणियां कम हो जाएं और समाज का एक स्पष्ट मानचित्र उभर सके। इसीलिए संविधान-निर्माताओं ने समाज की नक्शानवीसी करते हुए उसे दो (पिछड़े और अगड़े) हिस्सों में बांटा था। इसके बाद पिछड़े वर्ग की विशाल बहुसंख्यक श्रेणी का विभाजन तीन हिस्सों (एससी, एसटी और ओबीसी) में कर दिया गया था। इसी स़ाफ-सुथरे लगने मानचित्र के अनुसार धीरे-धीरे हमारी चुनावी गोलबंदी की संरचना बनी। हमारे पार्टी-सिस्टम पर इसकी गहरी छाप है। इसी के मुताबिक आरक्षण के ज़रिये यह तय होना शुरू हुआ कि राज्य के संसाधनों पर किसका कितना हक होगा। कहना न होगा कि मोटे तर पर इसे मान लिया गया। दूसरी तरफ इस संवैधानिक नक्शे में संशोधन करने की कोशिशें भी चलीं, और उनकी चर्चा भी खूब होती रही। परन्तु इनमें से किसी को कानूनी दृष्टि से कामयाबी नहीं मिली। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताज़े फैसले के आते ही ऐसा लगने लगा है कि अब ये तमाम कोशिशें भारत की बदली हुआ सामाजिक-राजनीतिक रूपरेखा का आधार बनने वाली हैं। कुल मिला कर इस फैसले ने संविधान के स्थापित समाजशास्त्र को खतरे में डाल दिया है। 
दलितों और आदिवासियों के वर्गीकरण के बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अगर पलटा या संशोधित नहीं किया गया तो वह समाज और राजनीति के संबंधों को भीतर से बाहर तक बदल डालने की तरफ ले जा सकता है। इसका असर केवल अनुसूचित जातियों और जनजातियों तक ही सीमित नहीं रहेगा। अन्य पिछड़ा वर्ग पर भी इसका गहन और रूपांतरकारी असर पड़ेगा। अगले दस से पंद्रह साल के भीतर-भीतर देश की 60 से 70 प्रतिशत आबादी की राजनीतिक-सामाजिक आत्मपहचान पहले जैसी नहीं रह जाएगी। ज़ाहिर है कि इस फैसले को लागू होने से पहले गंभीर राजनीतिक और कानूनी रुकावटों का सामना करना पड़ सकता है।
उदाहरण के लिए अब बिहार में कर्पूरी ठाकुर के ज़माने वाले उस मुंगेरी लाल कमीशन की प्रासंगिकता नए सिरे से समझ में आ सकती है जिसने ओबीसी में नये समतामूलक वर्गीकरण का  प्रस्ताव किया था। इसी तरह से मंडल कमीशन की रिपोर्ट के साथ नत्थी आर.एल. नाइक (कमीशन के एकमात्र दलित सदस्य) की उस असहमति पर निगाह डालने की ज़रूरत महसूस होगी जिसमें अन्य पिछड़े वर्ग को खेतिहर और कारीगर जातियों के दो हिस्सों में बांट कर उसी के मुताबिक आरक्षण का प्रतिशत अलग-अलग तय करने का आग्रह किया गया था। मुंगेरी लाल व नाइक के प्रस्तावों के अलावा संभवत: हो सकता है कि यह फैसला काका कालेलकर कमीशन के सदस्य शिव दयाल सिंह चौरसिया द्वारा व्यक्त की गई उस विस्तृत असहमति पर गौर करने की तरफ भी ले जाए जिसमें आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के आग्रह की कड़ी आलोचना दर्ज है। यानी, अब हाल ही में बनाई गई ईडब्ल्यूएस कैटेगरी पर पुनर्विचार करने की गुंजाइश पैदा हो सकती है। मोदी सरकार द्वारा बनाये गये रोहिणी कमीशन के आंकड़े पहले से ही ओबीसी के पुन: वर्गीकरण की ज़मीन तैयार करने का काम कर रहे हैं। अब ये आंकड़े नये संदर्भ में और भी प्रभावी लगने लगेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की खास बात यह है कि उसने पंजाब समेत कुछ राज्य सरकारों द्वारा शुरू की गई उस प्रक्रिया पर कानूनी मुहर लगा दी है जो एससी-एसटी श्रेणियों में वर्गीकरण की तरफ ले जाती है। अगर यह फैसला पहले आ गया होता तो बिहार में नितीश कुमार द्वारा बनायी गई महादलित श्रेणी में पासवान, पासी, धोबी और चमार जातियां (कुल दलित समाज का 69 प्रतिशत) राजनीतिक दबाव डाल कर न घुस पातीं। उस सूरत में बिहार का दलित आरक्षण दो हिस्सों में बंट गया होता। ज्यादा बड़ा हिस्सा उन 18 बिरादरियों को मिल रहा होता जो संख्याबल में कमज़ोर और सामाजिक-शैक्षिक रूप से बहुत ज्यादा पीछे मानी जाती हैं। अब अगर उत्तर प्रदेश सरकार चाहे तो बसपा के मुख्य जाटव जनाधार के आरक्षण पर दबदबे को घटा कर दूसरी लेकिन संख्याबल में कमज़ोर दलित जातियों को प्रमुखता दे सकती है। इस रोशनी में अदालती फैसले को लेकर चिराग पासवान और बसपा की बेचैनियों को आसानी से समझा जा सकता है। 
यह फैसला छुआछूत विरोधी अधिनियम पर भी पुनर्विचार की गुंज़ाइश पैदा करता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया है कि गुजरात और तमिलनाडु समेत कई राज्यों में कुछ ऐसे दलित समुदाय भी हैं जो कुछ दूसरे दलित समुदायों के साथ वैसा ही छुआछूत का व्यवहार करते हैं जैसे ऊंची जातियों द्वारा उनके साथ किया जाता है। हम जानते हैं कि यह एक यथार्थ है जिसकी अभिव्यक्ति हिंदी के दलित लेखन में भी हो चुकी है। ओम प्रकाश वाल्मीकि की बहुचर्चित कहानी ‘शवयात्रा’ इसका सबसे विख्यात उदाहरण है। इस कहानी में वाल्मीकि समाज के एक सदस्य की बेटी की मृत्यु के बाद उसकी शवयात्रा में स्वयं को उच्चतर मानने वाला दलित समुदाय कंधा देने के लिए तैयार नहीं होता। इस कहानी पर दलित लेखक संघों द्वारा काफी आपत्ति की जा चुकी है, और कई बार इसे दलित एकता तोड़ने वाली कहानी भी कहा गया है। 
भाजपा व हिंदू एकता के प्रोजेक्ट के लिए इस फैसले ने कई तरह की अनिश्चितताएं पैदा कर दी हैं। एक तरफ वह अतिदलित और अतिपिछड़े वर्ग को नये आश्वासन देकर एक बार फिर अपनी तरफ खींच सकती है, और दूसरी तरफ इसकी प्रतिक्रिया में ओबीसी श्रेणी की शक्तिशाली खेतिहर जातियां उसका साथ छोड़ने की तरफ जा सकती हैं। एक तरह से हिंदुत्व के दायरे में सोशल इंजीनियरिंग के पैरोकारों को यह समझने में अभी मुश्किल होने वाली है कि उनकी रणनीति की अगली संरचना कौन सी होगी। पहली नज़र में लग रहा है कि इंडिया गठबंधन को इस फैसले से कुछ फौरी लाभ हो सकता है। जातिगत जनगणना के सवाल पर भाजपा फूंक-फूंक कर कदम उठा रही है। जहां मजबूरी होती है (जैसे बिहार), वहां वह इसका समर्थन करती है। पर मोदीजी चुनावी मुहिम के दौरान उसे समाज को तोड़ने वाला भी करार देते हुए दिखते हैं। लेकिन, ‘इंडिया’ गठबंधन कांग्रेस के नेतृत्व में खुल कर जातिगत जनगणना के पक्ष में है। अगर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को दलित-आदिवासी व ओबीसी श्रेणियों में इस फैसले के मुताब़िक उपश्रेणियां बनानी पड़ीं, तो उन्हें व्यवस्थित और विस्तृत जातिगत जनगणना कराने की तरफ जाना ही होगा। एक तरह से सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला देकर जातिगत जनगणना करने की मांग पर अघोषित मुहर ही लगा दी है। संघ के सिद्धांतकारों के लिए यह पूर्वानुमान लगाना बहुत मुश्किल है कि इस फैसले की रोशनी में हुई जातिगत जनगणना के परिणामस्वरूप हिंदू राजनीतिक एकता की नयी क्या होगी।
     
लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।

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