पंजाब कांग्रेस की एकजुटता
देश के विभाजन के बाद पंजाब में अक्सर कांग्रेस की तूती बोलती रही है। वर्ष 1966 में नए पंजाब के अस्तित्व में आने के बाद भी इसके रहे प्रभाव को कम करके नहीं देखा जा सकता। चाहे आप्रेशन ब्लू स्टार और सिख विरोधी दंगों ने इसकी छवि को आघात पहुंचाया था, परन्तु इसके बावजूद प्रदेश में यह अकालियों के बराबर की पार्टी बनी रही और यह अक्सर अपनी-अपनी पारी खेलते रहे हैं। सिर्फ वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में यह पार्टी 18 सीटों पर सिमट गई थी, जबकि तीसरी पार्टी के रूप में उभरी आम आदमी पार्टी लोगों के भरपूर समर्थन से 92 सीटों पर काबिज़ हो गई थी, परन्तु इससे पहले वर्ष 2017 के चुनाव में इसने बड़ी जीत हासिल करके सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया था।
प्रदेश में अभी भी यह पार्टी सक्रिय ज़रूर दिखाई देती है परन्तु इसके मुकाबले में शासन कर रही आम आदमी पार्टी और तीसरी पार्टी के रूप में उभरने के लिए भारतीय जनता पार्टी भी मैदान में उतर चुकी है, जबकि अकालियों के अलग-अलग दल अपने-अपने ढंग-तरीके से प्रदेश की राजनीति में उभरने का यत्न करते दिखाई दे रहे हैं, परन्तु कोई भी अकाली दल अभी पहले वाली स्थिति में नहीं है। अब जबकि चुनाव में कुछ माह का समय ही शेष रह गया है तो आम आदमी पार्टी सक्रियता के पक्ष से अधिक विश्वास में प्रतीत होती है और बंगाल की जीत के बाद भाजपा भी पंजाब के चुनावी दंगल में पूरे हौसले के साथ उतरने का यत्न कर रही है। अब कांग्रेस हाईकमान द्वारा प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं को अलग-अलग पद और ज़िम्मेदारियां देने से पहले अधिक समय तक इस पार्टी में भी भारी असमंजस पैदा हुआ दिखाई देता रहा है। यह भी प्रभाव बना रहा है कि प्रदेश में पार्टी एकजुट नहीं है, अपितु यह अलग-अलग गुटों में बंटी हुई है। यह भी कि इसके कई वरिष्ठ नेता आपसी दौड़ में एक-दूसरे से आगे निकलने का यत्न कर रहे हैं। ऐसी स्थिति के ज्यादा समय बने रहने के कारण पार्टी में विवाद बढ़ते रहे थे और इसकी आंतरिक कमज़ोरी जग-ज़ाहिर हो गई थी। अब बड़ी हिचकिचाहट के बाद दिल्ली में हाईकमान द्वारा गहन और विस्तारपूर्वक विचार-विमर्श के उपरांत अलग-अलग ज़िम्मेदारियां निभाने के लिए पदाधिकारियों की घोषणा कर दी गई है। इस घोषणा से प्रकट हुई आशंकाओं और लगाए जाते अनुमान को एक बार तो विराम लग गया है।
आगामी दिनों में चुनाव की तैयारी के लिए पार्टी को कड़ी मेहनत करनी होगी। लम्बे इंतज़ार के बाद चाहे पार्टी को एकजुट रखने के लिए और ज्यादातर वर्गों को प्रतिनिधित्व देने के लिए नामों की घोषणा तो कर दी गई है परन्तु इसके बाद एकाएक पार्टी के भीतर बड़ा जोश और उत्साह पैदा हुआ दिखाई नहीं दिया। अब पार्टी के भीतर चुनाव के लिए उत्साह पैदा करने के लिए पार्टी को सांझी रणनीति पर काम करना होगा, ताकि यह अन्य पार्टियों के समान होकर चुनाव दंगल में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने में समर्थ हो सके।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

