घातक सिद्ध होने लगा है पर्यावरण प्रदूषण

अभी मानसून का सीजन आरंभ ही हुआ है और कुछ दावों के बावजूद पूरी तरह से ऐसा नहीं लग रहा कि देश में भयानक सूखा पड़ सकता है। साथ ही दिल्ली या देश के दूसरे हिस्सों में वायु प्रदूषण भी अभी इतनी गंभीर स्थिति में नहीं पहुंचा है कि उससे निजात दिलाने के लिए क्लाउड सीडिंग या कृत्रिम वर्षा की जाए ताकि कृषि को बचाया जा सके और प्रदूषण के मार से बचा जा सके। लेकिन दिल्ली सरकार ने संभवत: ऐसा ही कुछ समझ लिया है और अभी से क्लाउड सीडिंग की तैयारी में लग गई है। हालांकि उसने अभी इसके परीक्षण की तारीख घोषित नहीं की है, पर तैयारी आरंभ कर दी गई है। वर्ष 2025 में दिल्ली में दो बार क्लाउड सीडिंग की कोशिश हुई थी, लेकिन वह दोनों ही बार नहीं हो सकी थी। इसके पीछे जो कारण बताया गया था, वह यह था कि सबकुछ सीमित टाइम में किया गया था। मतलब योजना बनी और उसे तुरंत अमल में ले आया गया। 
अब दिल्ली सरकार ने यह तय किया है कि वह इसे जब भी करना चाहे तो उसे किसी तरह की परेशानी न हो। इसके लिए उसने कानपुर आईआईटी को जिम्मा दिया है और वह इसके सभी तकनीकी पक्षों पर काम कर रहा है। उसका मुख्य उद्देश्य यह है कि जब भी क्लाउड सीडिंग हो तो वह सफल हो। इसके लिए उड़ानों के शिड्यूल से लेकर मौसम विभाग तक से वह संपर्क में है। इससे साफ होता है कि दिल्ली सरकार ने तय कर लिया है कि वह वर्ष 2026 में कभी भी सूखा या वायु प्रदूषण से निपटने के लिए क्लाउड सीडिंग करा सकती है। वैसे इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि दिल्ली, देश के दूसरे प्रदेशों के लिए कभी-कभी मार्गदर्शक का भी काम करती है। अगर यहां पर भविष्य मे होने वाली क्लाउड सीडिंग सफल हो जाती है, तो देश के दूसरे प्रदेश जो पानी की कमी से जूझ रहे हैं या फिर वायु प्रदूषण पर रोक लगा पाने में पूरी तरह से सफल नहीं हो पा रहे हैं, वह इसका सहारा लेंगे। 
लेकिन अगर यह क्लाउड सीडिंग चलन में आ जाती है या इसे दूसरे कार्यक्रमों की तरह नियमित करने की योजना बनी तो तय है कि यह देश के इकोसिस्टम को तो बिगाड़ेगी ही, साथ ही इंसानी सेहत को भी व्यापक तरीके से प्रभावित करेगी। इस समय देश के पर्यावरण का पूरा इकोसिस्टम बिगड़ चुका है, इसके कारण थोड़-थोड़े समय पर नई-नई बीमारियां सामने आ रही हैं और स्थिति यह हो गई है कि सर्दी, गर्मी तथा वर्षा अपनी सीमाएं तोड़ रही हैं। जब ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम चक्र हद तक खराब हो चुका है तो आखिर क्यों क्लाउड सीडिंग कराना चाहती है सरकार? राजस्थान हो या फिर महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश हो या फिर मध्य प्रदेश सभी जगह पानी की कमी है और पेयजल स्रोत इस स्तर पर हैं कि वर्ष 2027 की गर्मियों में पानी की किल्लत हो सकती है। अगर मौसम विभाग की भविष्यवाणियों पर विश्वास कर लें तो यह वर्षाकाल सूखा ला रहा है। अगर पर्यावरणविद् तथा चिकित्सा जगत की बात मान ली जाए तो प्रकृति के खिलाफ, उसे नीचा दिखाने के लिए क्लाउड सीडिंग पर उतारु अफसर, भारत में भविष्य में कई तरह की नई बीमारियों के लिए नए रास्ते तो खोल ही रहे हैं, साथ ही धरती के प्रदूषण को बढ़ाने में भी सहयोग ही करेंगे।  
धरती पर खासकर भारत में पर्यावरण प्रदूषण खतरनाक स्तर पर है। सर्दी में तो यह जिस स्तर पर होता है, उसके विषय में सिर्फ यह कहा जा सकता है कि वह खतरे का पैमाना तोड़ने को बेताब होता है। आम दिनों में अर्थात सर्दी के इतर के दिनों में उत्तराखंड, कश्मीर तथा दूसरे पूर्वोत्तर के राज्यों को छोड़कर हल्की सी राहत रहती है। चिंता करने की बात यह है कि कानपुर आईआईटी जैसे संस्थान को इसके लिए काम करना पड़ रहा है। पर्यावरण वैज्ञानिक पहले ही कह चुके हैं और अब चिकित्सा जगत भी इसके नुकसान बता रहा है। इसी साल मार्च माह में जारी हुए दिल्ली के आर्थिक सर्वेक्षण में यह शामिल है कि मौसम विभाग की राय से दिल्ली में अधिक कृत्रिम वर्षा के ट्रायल किए जाएं। यह एक शॉर्ट टर्म आपातकालीन उपाय माना गया है तथा यह भी था कि इसे कराने का उद्देश्य हवा में जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कण हैं उन्हें खत्म करना है। 
जयपुर में भी यहां के एक समय के जल रक्षक बांध रामगढ़ को फिर से जिंदा करने के लिए क्लाउड सीडिंग हुई थी पर परिणाम वही जो दिल्ली में हुए थे। वैसे इन दोनों राज्यों के अतिरिक्त महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक में इस तरह के प्रयास हो चुके हैं और नतीजे हमारे पक्ष में बहुत अधिक नहीं रहे हैं। हां, दूसरे देशों की बात अलग है। वहां की जलवायु भी अलग है और मौसम चक्र भी। यूएई तथा चीन मे यह आम है। ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, स्पेन और अमरीका में भी यह जब तब कराई गई है। चीन में तो प्रदूषण से निपटने के लिए इसे कई बार कराया जा चुका है पर चीन मानव के प्रति कितना संवेदनशील है, यह कोविड काल से समझा जा सकता है और वहां पर तो सात दशक से यह प्रयास चल रहे हैं। दुबई में तो जब यह हुई तो इसे वहां आयी बाढ़ का एक कारण माना गया था। विशेषज्ञों ने कहा था कि इसने वहां के बादलों में जो नमी थी उसे बढ़ा दिया, जिससे यह बाढ़ की स्थितियां बनीं। पर चिंता का विषय इसके होने और उसकी सफलता का नहीं है। बात यह है कि इससे क्या मानव को होने वाली बीमारियों में वृद्धि होगी?
नदियों में रहने वाली मछलियों, कछुओं या फिर धरती में अंदर तक समाए केंचुओं के लिए यह टॉक्सिक हो जाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि केंचुए हमारी धरती के लिए बहुत अधिक लाभकारी हैं। वह खेत आदि की मिट्टी को पोली बनाते हैं, मिट्टी में मौजूद कार्बनिक पर्दाथों को जैविक खाद में परिवर्तित करते हैं। अगर वह बीमारियों की जद में आ जाएंगे तो खेती को प्राकृतिक लाभ कैसे मिलेगा? अगर यह रसायन हमारी फसलों में समां जाए तो यह हमारे पेट में सीधे जाकर वहां पर कई बीमारियां अपना प्रभाव बढ़ा सकती हैं। स्किन एलर्जी के विषय में अधिक बताने की जरूरत ही नहीं है। वैसे ही पर्यावरण प्रदूषण के कारण चर्म रोग भारत में कम नहीं है। अगर पानी पीने की समय सीमा लंबे काल तक हो तो फिर पेट की बीमारी अर्जाइरिया का खतरा बढ़ जाता है। इससे हमारी त्वचा तो नीली जैसी हो जाती है और जीवनभर यह सही नहीं होती। यह खतरनाक भले ही न हो पर समाज में इस तरह के रंग को लेकर जीना किसी शर्मनाक स्थिति से कम नहीं है। वैसे इसके कारण सांस लेने में परेशानी होना भी सामने आया है, पर अभी यह सभी प्रारंभिक प्रक्त्रिया में हैं और इन पर रिसर्च जारी है। लेकिन जब हमारे शरीर पर पर्यावरण प्रदूषण के कारण पहले ही से कई बीमारियां अपना असर छोड़ रही हैं। 

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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