दहलीज़ तक आ पहुंची है प्राकृतिक आपदाओं की आहट
हाल ही में वेनेजुएला में आए 7.2 और 7.5 तीव्रता के विनाशकारी दोहरे भूकम्प ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इस भीषण आपदा के कारण अब तक 1500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 68,900 लोग लापता हैं। राजधानी कराकस और तटीय राज्य ला गुआइरा में भारी तबाही हुई है। इस त्रासदी ने न केवल वेनेजुएला, बल्कि भारत सहित दुनिया के सभी देशों को आपदा प्रबंधन और बुनियादी ढांचे को लेकर कई महत्वपूर्ण सबक दिए है। मृतकों और लापता लोगों के आधिकारिक आंकड़े भले ही बदलते रहे हों, लेकिन त्रासदी की गंभीरता निर्विवाद है। हज़ारों परिवार असहनीय पीड़ा से गुजर रहे हैं। ऐसे समय में संवेदना व्यक्त करने के साथ यह एक प्रश्न मन में उठता है हर बड़ी आपदा के बाद हम कोई स्थायी सबक नहीं सीखते हैं? प्राकृतिक आपदाएं कभी कैलेंडर देख कर नहीं आतीं, न ही वे कभी देश चुनती हैं, न मौसम और न समय। जब धरती कांपती है, नदियां उफान पर आती हैं या पहाड़ दरकते हैं, तब विकास के बड़े-बड़े दावे भी कुछ ही पलों में बिखर जाते हैं। ऐसे समय में किसी देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी आर्थिक समृद्धि नहीं बल्कि उसकी तैयारी होती है।
इस बार एक सकारात्मक पक्ष भी सामने आया। आधुनिक तकनीक ने कुछ क्षेत्रों में लोगों को भूकम्प के झटके महसूस होने से कुछ सैकेंड पहले चेतावनी दे दी थी। सुनने में यह समय बहुत कम लगता है लेकिन आपदा की घड़ी में यही कुछ सैकेंड जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन सकते हैं। स्पष्ट है कि विज्ञान इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसे चेतावनी तंत्र को और अधिक सटीक, तेज और व्यापक बनाया जाए। हमारा देश भी भूकम्प, बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं का लम्बा इतिहास रखता है। 1993 का लातूर भूकम्प, 2001 का भुज भूकम्प, 2004 की सुनामी, 2013 की केदारनाथ त्रासदी तथा हाल के वर्षों में हिमालयी क्षेत्रों में आई अचानक बाढ़ और भूस्खलन की घटनाएं आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित हैं। इन घटनाओं का एक ही संदेश है कि प्रकृति को कभी हल्के में नहीं लिया जा सकता। वैज्ञानिक आज भी यह नहीं बता सकते कि किस दिन और किस समय भूकम्प आएगा, लेकिन वे वर्षों से यह अवश्य बता रहे हैं कि भारत का बड़ा हिस्सा भूकम्पीय दृष्टि से संवेदनशील है। देश का लगभग 60 प्रतिशत भूभाग किसी न किसी स्तर के भूकम्पीय जोखिम वाले क्षेत्र में आता है। इसका अर्थ यह है कि भविष्यवाणी भले संभव न हो, लेकिन पूर्व तैयारी पूरी तरह संभव है। यहीं से एक और सवाल उभरता है। आज देश के लगभग हर शहर में बहुमंजिला आवासीय परिसर, व्यावसायिक भवन और ऊंचे टावर विकास की नई पहचान बन चुके हैं। लेकिन क्या हमने कभी गंभीरता से यह पूछा कि इन इमारतों की मजबूती केवल सामान्य परिस्थितियों के लिए है या किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के लिए भी? किसी भी भवन की असली परीक्षा उसके उद्घाटन के दिन नहीं होती। उसकी परीक्षा उस दिन होती है जब धरती कांपती है, जब अचानक बाढ़ आती है, जब तेज हवाएं चलती हैं या जब प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है। यदि उस समय भवन लोगों की जान बचा सके तो वही वास्तविक विकास है।
भारत में लगातार आ रहे छोटे भूकम्पों का मुख्य कारण भारतीय टेक्टोनिक प्लेट का यूरेशियन प्लेट से टकराना और उत्तर की ओर खिसकना लगभग 49 मिलीमीटर प्रति वर्ष है। इसके कारण हिमालयी क्षेत्र और आसपास के इलाकों में जमीन के भीतर लगातार दबाव और तनाव बनता रहता है, जो छोटे-छोटे झटकों के रूप में समय-समय पर बाहर निकलता है। भारत जिस भू-भाग पर स्थित है, वह लगातार उत्तर दिशा की ओर यूरेशियन प्लेट से टकरा रहा है। यह प्रक्रिया हिमालय के निर्माण का कारण भी है और इसी के दबाव से जमीन के अंदर भ्रंश (फॉल्ट लाइन) सक्रिय रहते हैं। भारत की लगभग 59 प्रतिशत भूमि भूकम्प के लिहाज से संवेदनशील है। इसमें पूरा पूर्वोत्तर भारत, जम्मू-कश्मीर, पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र व गुजरात का कच्छ इलाका ‘जोन-ट’ सबसे खतरनाक में आता है। गहरे झटके और दूरगामी प्रभाव: अक्सर उत्तर भारत जैसे दिल्ली-एनसीआर में महसूस होने वाले झटकों का केंद्र अफगानिस्तान (हिंदूकुश क्षेत्र) होता है। अधिक गहराई में होने के कारण ये झटके दूर तक महसूस होते हैं लेकिन तीव्रता कम होने से आमतौर पर बड़ा नुकसान नहीं होता। भूकम्प विज्ञानियों का मानना है कि इस तरह के छोटे झटके एक तरह से राहत का संकेत भी होते हैं क्योंकि इनसे जमीन के भीतर जमा अत्यधिक दबाव धीरे-धीरे बाहर निकलता रहता है। हालांकि, देश की घनी आबादी वाले शहर (जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता) जहां निर्माण मानकों का ठीक से पालन नहीं होता, वहां इनकी वजह से बड़ा खतरा हमेशा बना रहता है।
भारत में भूकम्परोधी निर्माण के लिए मानक और नियम मौजूद हैं। समस्या नियमों की कमी नहीं बल्कि उनके पालन की है। क्या हर बहुमंजिला इमारत वास्तव में उन्हीं मानकों के अनुसार बन रही है? क्या निर्माण सामग्री की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच होती है? क्या निर्माण पूरा होने के बाद संरचनात्मक सुरक्षा का स्वतंत्र परीक्षण किया जाता है? यदि इन सवालों का जवाब पूरी तरह संतोषजनक नहीं है तो चिंता स्वाभाविक है। निर्माण की गुणवत्ता के साथ किसी भी स्तर पर किया गया समझौता या लापरवाही अंतत: निर्दोष नागरिकों के जीवन पर भारी पड़ सकती है। इसलिए सुरक्षा मानकों का पालन केवल कानूनी औपचारिकता नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है।



