जीवन बचाने वाले डॉक्टरों को भी चाहिए सहारा

हर वर्ष प्रथम जुलाई वह अवसर है, जब पूरा राष्ट्र उन लोगों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है, जिनके हाथों में केवल स्टेथोस्कोप नहीं बल्कि असंख्य जीवनों की धड़कनों की जिम्मेदारी होती है। डॉक्टर केवल रोगों का उपचार करने वाले पेशेवर नहीं हैं, वे निराशा के अंधकार में आशा का दीप जलाने वाले प्रहरी हैं। जब किसी परिवार की सारी उम्मीदें टूटने लगती हैं, तब सफेद कोट पहने एक चिकित्सक ही विश्वास का अंतिम आधार बनकर खड़ा दिखाई देता है। वह मृत्यु और जीवन के बीच खड़ी वह मजबूत दीवार है, जिसके पीछे अनगिनत परिवारों की मुस्कान सुरक्षित रहती है। डाक्टर वर्षों तक दूसरों के घाव भरते हैं लेकिन उनके अपने मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक घावों की चर्चा शायद ही कभी होती है। वे दूसरों की पीड़ा को कम करने के लिए स्वयं की पीड़ा को मुस्कान के पीछे छिपा लेते हैं। यह विषय हमें याद दिलाता है कि जो व्यक्ति प्रतिदिन जीवन बचाने की लड़ाई लड़ता है, वह भी अंतत: एक संवेदनशील इंसान है, जिसे सहारे, सम्मान, संवेदना और मानसिक संबल की आवश्यकता होती है।
जब कोई मरीज अस्पताल के आपातकालीन कक्ष में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहा होता है, तब डॉक्टर केवल चिकित्सा विज्ञान का प्रयोग नहीं करता बल्कि अपने अनुभव, निर्णय क्षमता, धैर्य और संवेदनशीलता की भी अंतिम परीक्षा देता है। वह केवल शरीर का उपचार नहीं करता बल्कि भयभीत परिवार को आश्वस्त करता है, टूटती उम्मीदों को संभालता है और निराशा में भी विश्वास जगाने का प्रयास करता है। उसके लिए प्रत्येक मरीज केवल एक केस फाइल नहीं बल्कि एक संपूर्ण जीवन होता है, जिसके पीछे सपने, परिवार और भविष्य जुड़ा होता है। कोविड-19 महामारी ने पूरी दुनिया को यह सिखाया कि सभ्यता की सबसे मजबूत ढाल विज्ञान और चिकित्सा व्यवस्था है तथा उसके वास्तविक नायक डॉक्टर हैं। जब पूरी दुनिया भय, अनिश्चितता और असहायता से घिर गई थी, तब डॉक्टरों ने अपने परिवारों से दूर रहकर दिन-रात अस्पतालों में सेवा की। संक्रमण का खतरा जानते हुए भी वे मरीजों के बीच खड़े रहे। अनेक चिकित्सकों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया, अनेक अपने परिवार से महीनों तक नहीं मिल सके लेकिन उन्होंने अपने कर्त्तव्य से कभी समझौता नहीं किया। उस दौर ने यह सिद्ध किया कि सफेद कोट केवल एक वर्दी नहीं बल्कि त्याग, साहस और मानवता का प्रतीक है। 
भारत की चिकित्सा व्यवस्था आज अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। आधुनिक अस्पताल, रोबोटिक सर्जरी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, टेलीमेडिसिन, जीनोमिक्स, डिजिटल हैल्थ रिकॉर्ड व अत्याधुनिक जांच तकनीकों ने उपचार को अधिक सटीक और प्रभावी बनाया है। फिर भी इन सभी तकनीकों के केंद्र में डॉक्टर ही है। 
मशीनें रिपोर्ट दे सकती हैं, एल्गोरिद्म संभावनाएं बता सकते हैं लेकिन किसी मरीज की आंखों में झांककर उसे विश्वास दिलाने का कार्य केवल एक संवेदनशील चिकित्सक ही कर सकता है। करुणा, संवाद, नैतिकता और मानवीय स्पर्श का कोई तकनीकी विकल्प नहीं हो सकता। दुर्भाग्यवश आज चिकित्सकों को अनेक नई चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। मरीजों और परिजनों की बढ़ती अपेक्षाएं, चिकित्सकीय लापरवाही के आरोप, अस्पतालों में हिंसा, कानूनी जटिलताएं, सोशल मीडिया पर अधूरी जानकारी के आधार पर निर्णय, अत्यधिक कार्यभार और संसाधनों की कमी कई बार उनके पेशे को अत्यंत तनावपूर्ण बना देती है। कई चिकित्सक सप्ताह में 80-100 घंटे तक कार्य करते हैं। अनेक युवा डाक्टर वर्षों तक कठिन प्रशिक्षण, रात्रिकालीन ड्यूटी और सीमित विश्राम के साथ अपने करियर का निर्माण करते हैं। ऐसे में उनका मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य व्यवस्था का भी महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है।
समाज को यह भी समझना होगा कि चिकित्सा विज्ञान सर्वशक्तिमान नहीं है। प्रत्येक उपचार की अपनी सीमाएं होती हैं और हर मरीज को बचा पाना संभव नहीं होता। जब किसी असफल उपचार के बाद डॉक्टरों पर हिंसा होती है, तब सबसे अधिक आहत मानवता होती है। विश्वास और संवाद ही डॉक्टर और मरीज के संबंध की वास्तविक नींव हैं। यदि यह विश्वास कमजोर होगा तो संपूर्ण स्वास्थ्य व्यवस्था प्रभावित होगी। आज आवश्यकता केवल उत्कृष्ट चिकित्सकों की नहीं बल्कि ऐसे स्वास्थ्य तंत्र की भी है, जो अपने चिकित्सकों का भी समान रूप से ध्यान रखे। मैडीकल कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य सहायता को अनिवार्य बनाया जाए, अस्पतालों में मनोवैज्ञानिक परामर्श उपलब्ध हो, कार्य के घंटे संतुलित हों, सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ हो तथा समाज चिकित्सकों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता का व्यवहार अपनाए। जिस प्रकार विमान यात्रा में पहले स्वयं ऑक्सीजन मास्क पहनने की सलाह दी जाती है और उसके बाद दूसरों की सहायता करने को कहा जाता है, उसी प्रकार स्वस्थ चिकित्सक ही स्वस्थ समाज का निर्माण कर सकते हैं।

#जीवन बचाने वाले डॉक्टरों को भी चाहिए सहारा