बागवानी के ज़रिये लाई जा सकती है फसली विभिन्नता
बागवानी का रकबा तो बढ़ रहा है, परन्तु बहुत कम रफ्तार से। कुल कृषि योग्य रकबे का 7-8 प्रतिशत रकबा बागवानी के अधीन होना चाहिए, जो इससे बहुत कम है। बाग लगाने को लेकर किसान काफी उत्साहित हैं, लेकिन इस पर बहुत खर्च आता है और इसके फलों से आय काफी समय बाद मिलना शुरू होती है। पंजाब के अधिकतर किसान कज़र्दार हैं तथा बागों पर और खर्च करके वे कज़र् का और बोझ नहीं उठाना चाहते। बागवानी विभाग के विशेषज्ञ उन किसानों को चुनते हैं जो फसली विभिन्नता और धान-गेहूं के चक्र से छुटकारा पाना चाहते हैं और उन्हें बाग लगाने के लिए प्रेरित तो करते हैं, लेकिन सफलता बहुत कम मिलती है। बीमारी रहित फलों की किस्मों के पौधे उन्हें उपलब्ध नहीं होते। चाहे पीएयू तथा बागवानी विभाग द्वारा नर्सरियां स्थापित हैं और कुछ निजी नर्सरियां भी हैं, जो राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से मान्यता प्राप्त हैं, लेकिन इनमें भी किसानों को स्तरीय और सही किस्म के पौधे उपलब्ध नहीं होते। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड द्वारा नये बाग लगाने के लिए और प्रमाणित नर्सरियों से गुणवत्ता वाले स्तरीय पौधे सब्सिडी पर भी दिए जा रहे हैं।
जुलाई से सदाबहार फलों के पौधे लगाने का समय शुरू हो जाता है—जैसे आम, अमरूद, लीची, चीकू, पपीता, लुकाठ और बिल आदि। ये जुलाई से सितम्बर तक लगाए जा सकते हैं जबकि पतझड़ में लगाने वाले फल जैसे अनार, आड़ू, अलूचा, फालसा और अंजीर आदि जनवरी और फरवरी में लगाए जाएंगे। आंवला और केला फरवरी-मार्च के अलावा आजकल भी सफलतापूर्वक लगाये जा सकते हैं। बागवानी विभाग के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर डॉ. स्वर्ण सिंह मान कहते हैं कि सदाबहार पौधों के बाग लगाने के लिए किसानों को अभी से विशेषज्ञों से सम्पर्क करके ज़मीन की मिट्टी और पानी की जांच एवं टैस्ट करवा लेने चाहिएं। अगर मिट्टी में कोई रोग हो तो बागवानी विभाग के अधिकारियों की सलाह लेनी चाहिए। बाग लगाने से पहले गर्म, ठंडी तथा तेज़ हवाओं को रोकने के लिए पेड़, जैसे देसी आम, जामुन, बिल, शहतूत, बोगनविलिया, करौंदा आदि की बाड़ लगा देनी चाहिए। पौधे लगाने से 15 दिन पहले निर्धारित अंतराल पर गड्ढे खोद लेने चाहिएं। इनमें तीसरा हिस्सा देसी खाद, तीसरा हिस्सा भल्ल ऊपरी डेढ़ फुट मिट्टी में मिलाकर फिर से भर देने चाहिएं। सदाबहार पौधे हमेशा दोपहर के बाद लगाने चाहिएं ताकि पौधे रात को कम तापमान में ठीक रहें। पौधे लगाने के बाद दीमक से बचाव के लिए क्लोरोपाइरोफॉस 20 ई.सी. प्रति पौधा डालनी चाहिए। क्लोरोपाइरोफॉस का इस्तेमाल साल में कम से कम दो बार कर लेना चाहिए, जुलाई-अगस्त या दिसम्बर में। पौधों को पानी देने वाली खालें पहले ही अलग बना देनी चाहिएं। बाग में लगाई गई अन्य फसल को पानी देने का प्रबंध अलग हो तो अच्छा है ताकि पौधों को ज़रूरत के अनुसार उचित समय पर पानी दिया जा सके।
पंजाब की हल्की और रेतीली ज़मीन में अक्सर ज़िंक की कमी हो जाती है। इससे पत्ते पीले पड़ जाते हैं और ऊपर की ओर मुड़ना शुरू हो जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए 600 ग्राम ज़िंक सल्फेट और 300 ग्राम अनबुझा चूना 100 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे करना चाहिए। नए लगाए गए पौधों की शुरू से देखभाल ज़रूरी है। कभी भी कोई शाखा पैवंद से नीचे टूटने नहीं देनी चाहिए। अगर पौधा टेढ़ा चलता है तो उसे डंडे का सहारा देकर सीधा कर देना चाहिए।
पंजाब में किन्नू की काश्त का रकबा सभी फलों से ज़्यादा है, लेकिन यह रकबा ज्यादातर फिरोज़पुर, अबोहर और होशियारपुर के क्षेत्रों तक ही सीमित है। दूसरे स्थान पर अमरूद हैं। आम के बाग बहुत कम हैं। हालांकि आम की बौनी किस्में जैसे अम्रपाली, मलिका, पूसा श्रेष्ठ, पूसा प्रतिभा, पूसा लालिमा, पूसा पतंबर, पूसा सूर्या और पूसा अरुणिमा के बाग लगाकर अच्छा मुनाफा लिया जा सकता है। प्रत्येक वर्ष फल देने वाली अम्रपाली किस्म के बाग से 2.50 लाख रुपये प्रति एकड़ तक का मुनाफा हो जाता है। अम्रपाली किस्म का आम बाज़ार में 50 रुपये प्रति किलो आसानी से बिक जाता है। इस किस्म के पौधे अधिक लगते हैं। बाग और ट्यूबवेल पर लगाने के लिए उत्पादकों की ओर से पूसा अरुणिमा और पूसा मलिका किस्मों की अधिक मांग है। आईएआरआई दिल्ली में आयोजित मैंगो शो में एक साल पूसा अरुणिमा किस्म प्रथम आई थी और पूसा मलिका का आकार और स्वाद उपभोक्ताओं को बहुत पसंद है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और बंगाल में तो ये निर्यात करने योग्य किस्में हैं। बागवानों को अभी से इन किस्मों के पौधों की बुकिंग इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीच्यूट, नई दिल्ली में करवा लेनी चाहिए। पंजाब में आम का उत्पादन अपने राज्य के उपभोक्ताओं के लिए भी पर्याप्त नहीं है। इसलिए पंजाब में आम की काश्त बढ़ाने की बहुत गुंजाइश है।
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