प्रत्येक क्षेत्र में अहम भूमिका निभा रहा ड्रोन
साल 2020 के बाद भारत में जिस तकनीक ने सबसे तेज़ी से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, उसमें ड्रोन प्रमुख है। कभी सेना और सुरक्षा एजेंसियों तक सीमित रहने वाली यह तकनीक आज खेतों, गांवों, शहरों, अस्पतालों, निर्माण स्थलों और सरकारी कार्यालयों तक पहुंच चुकी है। ड्रोन अब केवल उड़ने वाला कैमरा नहीं, बल्कि विकास, सुशासन, उत्पादकता और नवाचार का नया औज़ार बन चुका है। भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। ऐसे समय में ड्रोन तकनीक देश के विकास को नई गति देने वाली शक्ति के रूप में उभर रही है। यह तकनीक न केवल समय और लागत बचा रही है बल्कि उन क्षेत्रों तक पहुंच बना रही है जहां पारम्परिक व्यवस्थाएं अक्सर सीमित साबित होती थीं।
भारत सरकार ने 2021 में ड्रोन नियमों को सरल बनाकर इस क्षेत्र के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोले। इसका असर यह हुआ कि देश में ड्रोन स्टार्टअप्स और निर्माण इकाइयों की संख्या तेज़ी से बढ़ी। वर्तमान में देश में 400 से अधिक ड्रोन स्टार्टअप सक्रिय हैं। उद्योग विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत का ड्रोन उद्योग 30 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक का बाज़ार बन सकता है। इसके साथ ही लगभग 5 लाख नए रोज़गार सृजित होने की संभावना है। ड्रोन पायलट, डेटा एनालिस्ट, सर्वे विशेषज्ञ, भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) तकनीशियन और सॉफ्टवेयर इंजीनियर जैसे नए व्यवसाय तेज़ी से उभर रहे हैं। दरअसल, ड्रोन केवल तकनीक नहीं है बल्कि यह एक संपूर्ण इकोसिस्टम है जो निर्माण, सॉफ्टवेयर, डेटा प्रोसेसिंग और सेवा क्षेत्र को एक साथ जोड़ता है।
भारत की लगभग 46 प्रतिशत कार्यशील आबादी कृषि पर निर्भर है। ऐसे में यदि किसी तकनीक का सबसे अधिक प्रभाव दिख रहा है तो वह कृषि क्षेत्र है। ड्रोन की मदद से खेतों में कीटनाशकों और उर्वरकों का छिड़काव तेज़ी से किया जा रहा है। कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के परीक्षण बताते हैं कि ड्रोन के माध्यम से छिड़काव करने पर 75 से 90 प्रतिशत तक समय की बचत होती है। पानी की खपत 30 से 40 प्रतिशत तक कम होती है जबकि रसायनों का उपयोग भी 20 से 30 प्रतिशत तक घट जाता है। एक सामान्य कृषि ड्रोन मात्र 15 से 20 मिनट में लगभग 10 एकड़ क्षेत्र में छिड़काव कर सकता है। यही काम पारम्परिक तरीके से करने में कई घंटे लगते हैं। इसके अलावा मल्टीस्पेक्ट्रल कैमरों से लैस ड्रोन किसानों को यह भी बताते हैं कि खेत के किस हिस्से में नमी कम है, कहां पौधे बीमार हैं और किस क्षेत्र में अतिरिक्त पोषण की ज़रूरत है। यानी खेती अब अनुभव आधारित नहीं बल्कि डेटा आधारित होती जा रही है। ड्रोन तकनीक ने राजस्व और भूमि प्रबंधन व्यवस्था में भी बड़ा बदलाव किया है। केंद्र सरकार की स्वामित्व योजना के तहत देश के 3.18 लाख से अधिक गांवों का ड्रोन सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है। इसके आधार पर 2 करोड़ से अधिक सम्पत्ति कार्ड जारी किए गए हैं।
ग्रामीण भारत में भूमि विवाद लम्बे समय से सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती रहे हैं। ड्रोन सर्वेक्षण से पहली बार गांवों की सम्पत्तियों का सटीक डिजिटल रिकॉर्ड तैयार हुआ है। भारत हर वर्ष बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन और जंगल की आग जैसी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित होता है। ऐसी परिस्थितियों में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक होता है। ड्रोन आपदा प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक तस्वीर कुछ ही मिनटों में उपलब्ध करा देते हैं।
इससे राहत एजेंसियों को यह समझने में मदद मिलती है कि सबसे ज्यादा नुकसान कहां हुआ है और सहायता पहले किस क्षेत्र तक पहुंचनी चाहिए। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार हाल के वर्षों में बाढ़ और भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों की मैपिंग, राहत कार्यों की निगरानी और क्षति आकलन में ड्रोन का व्यापक उपयोग किया गया है। जहां पहले कई दिनों में जानकारी एकत्रित होती थी, वहीं अब कुछ घंटों में विस्तृत रिपोर्ट तैयार हो जाती है।
भारत के दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच आज भी चुनौती बनी हुई है। कई स्थानों पर सड़क सम्पर्क कमज़ोर होने के कारण दवाइयों और रक्त की आपूर्ति समय पर नहीं हो पाती। ड्रोन इस समस्या का समाधान बन सकते हैं। पूर्वोत्तर राज्यों, तेलंगाना और अन्य क्षेत्रों में हुए प्रयोगों ने साबित किया है कि ड्रोन के माध्यम से दवाइयां, वैक्सीन, रक्त और लैब सैंपल तज़ी से पहुंचाए जा सकते हैं। भविष्य में यह तकनीक ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा दे सकती है।
हालांकि ड्रोन तकनीक जितनी संभावनाएं लेकर आई है, उतनी ही चुनौतियां भी इसके साथ जुड़ी हैं। निजता का अधिकार, डेटा सुरक्षा, साइबर हमले, हवाई यातायात प्रबंधन और अवैध उपयोग जैसे मुद्दे लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। यदि मज़बूत नियामक व्यवस्था विकसित नहीं की गई तो तकनीक का दुरुपयोग भी संभव है। इसके अलावा छोटे किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों तक इस तकनीक की पहुंच सुनिश्चित करना भी एक बड़ी चुनौती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगले दस वर्षों में ड्रोन तकनीक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मशीन लर्निंग और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) के साथ मिलकर और अधिक प्रभावशाली होगी। खेती, शहरी नियोजन, पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य सेवाएं, रक्षा, लॉजिस्टिक्स और ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में ड्रोन की भूमिका लगातार बढ़ेगी। संभव है कि आने वाले वर्षों में दवाइयों से लेकर दैनिक उपयोग की वस्तुओं तक की डिलीवरी ड्रोन के माध्यम से होने लगे। (युवराज)

