पश्चिम बंगाल में वामपंथ के लिए नई शुरुआत का अवसर
2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया है। भारतीय जनता पार्टी को पश्चिम बंगाल में पहली बार स्पष्ट बहुमत मिला है, जबकि लम्बे समय तक सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बेहद कमज़ोर स्थिति में पहुंच गई है। इस परिणाम को केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसाल भय और प्रशासनिक अव्यवस्था के खिलाफ मतदाताओं की तीखी प्रतिक्रिया के रूप में भी देखा गया है। चुनाव के बाद जिस तेजी से टीएमसी में टूट-फूट और राजनीतिक अस्थिरता दिखाई दी है, उसने पार्टी की संगठनात्मक कमज़ोरी को भी उजागर कर दिया है।
यह स्थिति भाजपा के लिए निश्चित रूप से राजनीतिक बढ़त लेकर आई है, लेकिन इससे सबसे बड़ा अवसर वामपंथ के सामने भी पैदा हुआ है। पिछले डेढ़ दशक में टीएमसी ने वामपंथ को अपना प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानते हुए उसे हाशिए पर धकेलने की लगातार कोशिश की। अब जब टीएमसी का प्रभाव तेज़ी से घटा है और उसके विभाजित समूह प्रभावी विपक्ष बनने की स्थिति में नहीं हैंए तब वामपंथ स्वयं को भाजपा के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर सकता है। हाल के दिनों में वाम दलों की रैलियां, बंद पड़े पार्टी कार्यालयों का फिर सक्रिय होना और सार्वजनिक जीवन में उनकी बढ़ती मौजूदगी इसी संभावना का संकेत देती है।
यह अवसर जितना महत्वपूर्ण है, चुनौती भी उतनी ही बड़ी है। भाजपा को व्यापक जनादेश मिला है, इसलिए केवल वैचारिक विरोध या उसे प्रतिक्रियावादी अथवा फासीवादी कह कर राजनीतिक जड़मीन तैयार नहीं की जा सकती। लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक ज़िम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभाते हुए वामपंथ को सरकार के सामने विकास के ऐसे वैकल्पिक मॉडल रखने होंगे, जिनमें गरीबों, श्रमिकों, किसानों और वंचित वर्गों के हितों को प्राथमिकता मिले। साथ ही उसे यह मांग भी करनी चाहिए कि टीएमसी शासन के दौरान राजनीतिक दमन के शिकार सभी लोगों को न्याय मिले, चाहे उनकी राजनीतिक पहचान कुछ भी रही हो। इससे वामपंथ की लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता अधिक विश्वसनीय रूप में सामने आएगी।
इसी के साथ सरकार की उन कार्रवाइयों का भी विरोध ज़रूरी होगा जो लोकतांत्रिक अधिकारों, अल्पसंख्यकों या कमज़ोर वर्गों के हितों के विरुद्ध हों। यदि इतिहास लेखन को वैचारिक दृष्टि से बदला जाता है, धार्मिक आधार पर भेदभाव होता है, पुनर्वास के बिना अतिक्रमण हटाने जैसी कार्रवाई की जाती है या साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिलता है तो वामपंथ को इन मुद्दों पर स्पष्ट और सुसंगत राजनीतिक हस्तक्षेप करना होगा।
वामपंथ के सामने सबसे कठिन चुनौती भाजपा की उस रणनीति को समझने की है, जिसके माध्यम से उसने बड़ी संख्या में हिंदू मतदाताओं का समर्थन हासिल किया। लम्बे समय तक यह मान लिया गया था कि बंगाल का समाज स्वाभाविक रूप से धर्म-निरपेक्ष है और साम्प्रदायिक राजनीति यहां गहरी जड़ें नहीं जमा सकती। लेकिन हाल की राजनीतिक घटनाओं ने इस धारणा को चुनौती दी है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बने इस नए राजनीतिक रिक्त स्थान ने वामपंथ को एक अवसर दिया है, लेकिन केवल टीएमसी के पतन से उसकी वापसी सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए उसे लोकतांत्रिक विपक्ष की विश्वसनीय भूमिका निभानी होगी, विकास का व्यावहारिक वैकल्पिक एजेंडा प्रस्तुत करना होगा और सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर भी नई दृष्टि के साथ सक्रिय हस्तक्षेप करना होगा। यदि वामपंथ इन चुनौतियों का उत्तर देने में सफल होता है, तभी वह राज्य की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता दोबारा स्थापित कर सकेगा। (संवाद)



