चीफ खालसा दीवान का शैक्षिक पक्ष
इस महीने की बड़ी शैक्षिक खबर चीफ खालसा दीवान के शैक्षिक विभाग का पुनर्गठन है। डॉ. सरबजीत सिंह छीना को दूसरी बार ऑनरेरी सचिव की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। यह फैसला दीवान के प्रमुखों ने सर्वसम्मति से लिया है।
1902 में स्थापित हुआ चीफ खालसा के कई शैक्षिक संस्थान और अनाथालय आदि लोगों की भलाई के कार्यों को समर्पित है। शहीद उधम सिंह 12 साल तक यहीं रहे और शिक्षा प्राप्त करते रहे।
चीफ खालसा दीवान अनाथालय के अतिरिक्त कई अस्पतालों, होम्योपैथिक संस्थाओं और दांतों के मरीज़ों की भी सहायता करता है। गुरु अमरदास वृद्ध आश्रम और सूरमा सिंह आश्रम भी इसकी सहायता से चल रहे हैं। याद रहे कि दीवान की स्थापना के शुरुआती वर्षों में सुंदर सिंह मजीठिया और सुरजीत सिंह मजीठिया का योगदान भी अहम था।
पिछले कुछ वर्षों में भाग सिंह अणखी, मनजीत तरनतारनी, डॉ. महिंदर सिंह ढिल्लों, डॉ. जसविंदर सिंह ढिल्लों, सरबजीत सिंह छीना और डॉ. अमरजीत सिंह दूआ इसकी शैक्षिक समिति के ऑनरेरी सचिव रह चुके हैं। डॉ. छीना एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें दूसरी बार ऑनरेरी सचिव चुना गया है।
डॉ. (प्रोफेसर) सरबजीत सिंह छीना के पास कृषि आर्थिकता में डॉक्टरेट डिग्री है और खालसा कॉलेज, अमृतसर से सेवा-निवृत्ति के बाद समाज विज्ञान संस्था, नई दिल्ली के फेलो सम्मानित हैं। वह गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के सिंडिकेट और सीनेट के सदस्य भी रह चुके हैं। चीफ खालसा दीवान द्वारा उन्हें दूसरी बार ऑनरेरी सचिव नियुक्त किए जाने से उनका शैक्षणिक कद और बड़ा हुआ है।
चीफ खालसा दीवान विश्व स्तरीय कांफ्रैंसें आयोजित करने के लिए भी जाना जाता है। इन कॉन्फ्रैंसों में भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजिंदर प्रसाद, जाकिर हुसैन, फखर उल-दीन अली अहमद, ज्ञानी जैल सिंह मुख्यातिथि के तौर पर शामिल होते रहे हैं। उनके अलावा देश-प्रदेश के अन्य गणमान्य भी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे हैं। अपने आंगन को अधिक से अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए चीफ खालसा दीवान की प्रमुख संस्था ही नहीं, बल्कि इसकी शैक्षिक शाखा भी अपनी कार्यकारिणी में संशोधन करती रही है। 1907 में हरबंस सिंह अटारी समेत कई पदाधिकारी मुस्लिम एजुकेशन इंस्टिट्यूट की कार्यकारिणी का जायज़ा लेने कराची गए और वहां इतने प्रभावित हुए कि अपनी संस्था में भी आवश्यक सुधार किए। वर्तमान में डा. छीना को अपने शैक्षिक पक्ष की ज़िम्मेदारी पुन: सौंपना भी अहम घटनाक्रम है।
अंतिका
मैं अकेला ही चला था,
जानिब-ए-मंज़िल मगर,
लोग साथ आते गए
और ेकारवां बनता गया।
ई-मेल : sandhugulzar@yahoo.com



