पारम्परिक शिक्षा से बर्बाद हो रहा युवाओं का भविष्य
भारत को युवा शक्ति का देश कहा जाता है और यह माना जाता है कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी के हाथों में होता है किन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि जिस शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से युवाओं को बदलते समय की चुनौतियों के लिए तैयार किया जाना चाहिए, वही व्यवस्था आज अनेक स्तरों पर उनकी संभावनाओं को सीमित करने का कार्य कर रही है। लम्बे समय से चली आ रही पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था आज भी मुख्य रूप से पुस्तकीय ज्ञान और परीक्षा केंद्रित सोच पर आधारित है। इस व्यवस्था का निर्माण उस समय की आवश्यकताओं के अनुरूप हुआ था, जब समाज और अर्थव्यवस्था की प्रकृति वर्तमान समय से पूरी तरह भिन्न थी। आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तीव्र परिवर्तन हो रहे हैं तथा रोज़गार की प्रकृति भी निरन्तर बदल रही है किन्तु शिक्षा व्यवस्था की गति अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है। परिणामस्वरूप लाखों युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी रोज़गार के लिए आवश्यक दक्षताओं से वंचित रह जाते हैं और उनके सामने भविष्य को लेकर अनिश्चितता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों को मुख्य रूप से पाठ्य पुस्तकों तक सीमित कर दिया गया है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन से अधिक परीक्षा में अधिक अंक प्राप्त करना बन गया है। विद्यार्थी तथ्यों को समझने के बजाय उन्हें याद करने का प्रयास करते हैं क्योंकि मूल्यांकन की पूरी प्रक्रिया इसी आधार पर संचालित होती है। इस प्रकार शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाता है और प्रमाण-पत्र प्राप्त करना ही सफलता का मानक बन जाता है। इसका परिणाम यह होता है कि विद्यार्थी डिग्रियां तो प्राप्त कर लेते हैं किन्तु उनमें जीवन की वास्तविक परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती। वे अपने विषय से संबंधित सैद्धांतिक जानकारी रखते हैं किन्तु व्यावहारिक अनुभव तथा कार्यकुशलता के अभाव के कारण रोज़गार प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करते हैं।
आज देश में बड़ी संख्या में ऐसे युवा दिखाई देते हैं जिनके पास स्नातक और परास्नातक स्तर की उपाधियां हैं, किन्तु उनके सामने रोज़गार का संकट बना हुआ है। यह स्थिति केवल रोज़गार के अवसरों की कमी के कारण नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा कारण शिक्षा और रोज़गार की आवश्यकताओं के बीच बढ़ती हुई दूरी भी है। उद्योग जगत और विभिन्न संस्थानों को ऐसे युवाओं की आवश्यकता होती है जिनमें समस्याओं का समाधान करने की क्षमता हो जो नई परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढाल सकें और जो व्यवहारिक ज्ञान तथा कार्यकुशलता से सम्पन्न हों किन्तु पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था इस दिशा में अपेक्षित योगदान नहीं दे पा रही है। परिणामस्वरूप एक ओर शिक्षित बेरोज़गारों की संख्या बढ़ रही है तो दूसरी ओर विभिन्न क्षेत्रों में योग्य और प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी महसूस की जा रही है।
पारम्परिक शिक्षा प्रणाली का एक प्रमुख खामी यह भी है कि यह विद्यार्थियों की रचनात्मकता और स्वतंत्र चिंतन को पर्याप्त महत्व नहीं देती। आधुनिक युग में सफलता उन्हीं लोगों को प्राप्त हो रही है जो नवीनता को स्वीकार करते हैं और बदलती परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को विकसित करते रहते हैं। किन्तु हमारी शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने और नए प्रयोग करने के लिए पर्याप्त रूप से प्रोत्साहित नहीं करती। परिणामस्वरूप उनमें आत्मविश्वास और सृजनात्मक क्षमता का विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं हो पाता।
वर्तमान समय में विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन हो रहे हैं। अनेक ऐसे व्यवसाय सामने आ चुके हैं जिनकी कल्पना कुछ दशक पहले तक नहीं की जा सकती थी। शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन की गति धीमी होने के कारण विद्यार्थी उस ज्ञान से लैस होकर बाहर निकलते हैं जिसकी उपयोगिता रोज़गार बाज़ार में कम होती जा रही है। इस प्रकार शिक्षा और वास्तविक जीवन के बीच का अंतर निरन्तर बढ़ता जा रहा है।
पारम्परिक शिक्षा की एक और खामी यह सामने आई है कि अधिकांश विद्यार्थी शिक्षा का उद्देश्य केवल सरकारी नौकरी प्राप्त करना मान लेते हैं। समाज में यह धारणा गहराई से स्थापित हो चुकी है कि सफलता का अर्थ केवल किसी सरकारी पद पर नियुक्ति प्राप्त करना है। परिणामस्वरूप लाखों युवा कई वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे रहते हैं और सीमित अवसरों के कारण उनमें से अधिकांश को सफलता प्राप्त नहीं हो पाती। इससे उनके भीतर निराशा और असुरक्षा की भावना उत्पन्न होने लगती है। यदि शिक्षा व्यवस्था युवाओं में आत्म-निर्भरता और नवाचार की भावना विकसित करे तथा उन्हें नए अवसरों की पहचान करने के लिए प्रेरित करे तो वे केवल नौकरी प्राप्त करने वाले व्यक्ति न बनकर रोज़गार सृजित करने वाले नागरिक भी बन सकते हैं। समय की मांग यह है कि शिक्षा को रोज़गार और कौशल से जोड़कर देखा जाए। आज केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं माना जाता बल्कि विभिन्न प्रकार की व्यावहारिक दक्षताओं का होना भी आवश्यक है।
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि वर्तमान पारम्परिक शिक्षा व्यवस्था अनेक मामलों में बदलते समय की आवश्यकताओं को पूरा करने में पीछे रह गई है। केवल डिग्री और परीक्षा आधारित व्यवस्था के कारण बड़ी संख्या में युवा रोज़गार की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं और उनकी क्षमताओं का पूर्ण विकास नहीं हो पा रहा है। यदि भारत को विकसित और आत्म-निर्भर राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ना है तो शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन करना अनिवार्य होगा। शिक्षा को आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाते हुए उसे कौशल आधारित रोजगारोन्मुख और व्यवहारिक स्वरूप प्रदान करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। जब शिक्षा जीवन और समाज की वास्तविक आवश्यकताओं से जुड़ जाएगी तब युवा केवल रोज़गार की तलाश करने वाले नागरिक नहीं रहेंगे बल्कि वे राष्ट्र के विकास और समृद्धि के सशक्त आधार बन सकेंगे। (युवराज फीचर्स)



