भारत पर भारी टैरिफ का आधार था ट्रम्प का फज़र्ी डाटा
भारत पर टैरिफ थोपने के लिए ट्रम्प ने अपनी ही सरकार के डाटा को मानने से इंकार कर दिया था। ट्रम्प का भारत के प्रति विकृत दृष्टिकोण केवल व्यापार तक सीमित नहीं है बल्कि इसका विस्तार अंतर्राष्ट्रीय शांति स्थपाना तक है। अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान ट्रम्प को व्हाइट हाउस में पहुंचे हुए दस दिन ही बीते थे कि 30 जनवरी, 2024 को ‘कमांडर का इरादा’ स्थापित करने हेतु बैठक बुलायी गई, विशेषकर इसलिए कि रूस-यूक्रेन युद्ध पर विराम लगाया जा सके। बैठक में लेफ्टिनेंट जनरल कीथ केलोग ने ‘अमेरिका फर्स्ट प्लान’ पेश किया।
प्रस्ताव में सुझाव था कि फ्रांस, ब्रिटेन व नीदरलैंड्स के सैनिकों को शांति सेना के तौर पर तैनात किया जाये युद्ध-विराम लागू करने के लिए। इस प्रस्ताव पर उप-राष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि नाटो के बूट्स ज़मीन पर उतारने से रूस अत्यधिक भड़क जायेगा (क्योंकि असल विवाद तो यूक्रेन को नाटो में शामिल करने के इरादे पर ही है)। वेंस ने सवाल किया कि क्या गैर-यूरोपीय देशों की सेना को इस काम पर लगाया जा सकता है, खासकर सऊदी अरब या भारत की? ट्रम्प ने मुंह दबाकर हंसते हुए कहा, ‘भारतीय यह काम नहीं करने के, वह इस किस्म की चीज़ के लिए पैसा नहीं देने के। ... पीएम मोदी वास्तव में मुझे पसंद करते हैं और व्हाइट हाउस आने के भी इच्छुक हैं ... लेकिन भारतीय किसी भी चीज़ के लिए पैसा नहीं देते हैं ... अगर ब्रिटेन या फ्रांस अपनी सेना बूचड़खाने में भेजना चाहते हैं तो मुझे कोई समस्या नहीं, जब तक कि अमेरिका को बिल न भरना पड़े।’ ये बातें न्यूयॉर्क टाइम्स के रिपोर्टरों मैगी हेबरमैन व जोनाथन स्वैन की नवीनतम पुस्तक ‘रेजीम चेंज: इनसाइड द इम्पीरियल प्रेसीडेंसी ऑफ डोनाल्ड ट्रम्प’ से प्रकाश में आयी हैं।
बैठक में वाणिज्य सचिव हावर्ड लुटनिक ने यूएसटीआर (ऑफिस ऑफ द यूएस ट्रेड रेप्रिजेंटिव) का डाटा पेश करते हुए बताया कि अमरीकी गुड्स पर भारतीय टैरिफ ट्रम्प के अनुमान से बहुत कम है। डाटा इस बात के समर्थन में नहीं था कि ट्रम्प भारत पर अत्यधिक टैरिफ लगायें। ट्रम्प ने अपनी ही सरकार के डाटा को ‘बकवास’ बताया। सभी अधिकारियों ने चाटुकारिता करते हुए ट्रम्प की ‘हां में हां’ मिलायी। लुटनिक के समर्थन में सिर्फ हाउस स्पीकर माइक जॉनसन थे, जिन्होंने कहा कि बेलगाम टैरिफ लगाने से अमरीकी ऑटोमोटिव सेक्टर बर्बाद हो जायेगा, तो इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा? ट्रम्प ने कहा कि वह ज़िम्मेदारी लेंगे और आखिरकार नतीजा यह हुआ कि नई दिल्ली पर 50 प्रतिशत टैरिफ थोप दिया गया, जोकि अमरीका के सभी ट्रेडिंग पार्टनर्स में सबसे अधिक था और जिसकी वजह से अमरीका व भारत के संबंध बिगड़े।
यह पहला अवसर नहीं था जब फेक डाटा, जिसका स्रोत कोई नहीं जानता, से भारत को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया गया। रूजवेल्ट रूम में टेक्नोलॉजी सीईओ काउंसिल की बैठक में ट्रम्प ने आईबीएम, डेल व इंटेल के प्रतिनिधियों पर दबाव डाला कि वह अपनी फैक्ट्रियां अमरीका में ही लगायें, क्योंकि अमरीका के ट्रेडिंग पार्टनर्स उसके साथ सौतेला व्यवहार करते हैं कि चीन अनुचित ढंग से 150 से 200 प्रतिशत का टैरिफ लगाता है और भारत 175 प्रतिशत। ज़ाहिर है यह झूठ है। वास्तविकता यह है कि भारत की औसत लागू टैरिफ दर 175 प्रतिशत के आसपास भी नहीं है। वर्ल्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन के अनुसार भारत की मानक औसत टैरिफ दर आमतौर से 10 से 12 प्रतिशत के करीब रहता है। हालांकि भारत कुछ अति विशिष्ट, एकल लग्ज़री चीज़ों (जैसे आयतित शराब पर 150 प्रतिशत टैरिफ) पर उच्च टैरिफ लगाता है, लेकिन ट्रम्प का यह दावा पूर्णत: निराधार था कि भारत ने अमरीकी सामान पर एकमुश्त 175 प्रतिशत टैरिफ लगाया हुआ है। इसके बावजूद अमरीकी ट्रेड डाटा के अधिकारियों सहित कोई भी ट्रम्प को यह न समझा सका कि वह फर्जी डाटा प्रस्तुत कर रहे हैं।
अमरीका में अर्थशास्त्री अक्सर अपने प्रकाशित पेपर्स में सरकारी डाटा को चुनौती देते हैं, थिंक टैंक्स सरकारी डाटा की आलोचना करते हुए रिपोर्ट्स जारी करते हैं और सांसद इन्हें समझने के लिए अध्ययन कमीशन करते हैं। लेकिन ट्रम्प चौथे विकल्प का चयन करते हैं—डाटा पर इतना चिल्लाओ कि वह बदल जाये। ट्रम्प ने दावा किया था कि उनकी नीतियों ने दवाओं की कीमत 600, 700 या 800 प्रतिशत कम की, जोकि असंभव है बशर्ते कि फार्मा कम्पनियां रोगियों को दवा सेवन के लिए स्वयं पैसे दें। ट्रम्प के बड़बोलेपन और फर्जी दावों की सूची बहुत लम्बी हैं।
ट्रम्प के बड़बोलेपन, विकृत दृष्टिकोण और फर्जी दावों का ही नतीजा है कि उनकी वैश्विक छवि निरन्तर निचले पायदान की ओर गिरती जा रही है। दो दशक से भी अधिक से अमरीका के बारे में वैश्विक राय को ट्रैक करने वाले पिउ रिसर्च सेंटर के 2026 ग्लोबल एटीट्यूड सर्वे में ट्रम्प के बारे में ज़बरदस्त नकारात्मक राय सामने आयी है कि मात्र 23 प्रतिशत वयस्कों को ही वर्ल्ड अफेयर्स के नेतृत्व में ट्रम्प पर विश्वास है। मागा सुप्रीमो को सभी प्रमुख विदेशी नीतियों में खराब अंक मिले हैं, मसलन 36 देशों के 74 प्रतिशत वयस्क ट्रम्प की ईरान नीति से सहमत नहीं हैं। ट्रम्प की टैरिफ नीतियां भी लोगों को पसंद नहीं हैं, खासकर उन देशों में जिनसे अमरीका का व्यापार है, भारत में तो 82 प्रतिशत लोग इनके विरोध में हैं। दो दिन की मंत्री स्तर की बैठक में भारत व अमरीका ने अंतरिम द्विपक्षीय व्यापार समझौते की समीक्षा, जिसमें मार्किट एक्सेस, डिजिटल ट्रेड आदि पर चर्चा हुई, लेकिन इस बात के कोई संकेत नहीं दिये कि अगले महीने की महत्वपूर्ण टैरिफ डेडलाइन से पहले सभी मतभेद दूर हुए हैं या नहीं। यह अनिश्चितता ट्रम्प के मूड की वजह से है, न जाने कब बदल जाये।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



