एशिया के किसी देश ने अब तक क्यों नहीं जीता फीफा विश्व कप ?

भारत में फुटबॉल के प्रति दीवानगी बहुत पुरानी है कलकत्ता फुटबॉल क्लब की स्थापना 1872 में हुई थी और मोहन बागान एथलेटिक क्लब, जो आज तक चल रहा है की स्थापना 1889 में हुई थी। भारत में पश्चिम बंगाल, केरलम, गोवा आदि ऐसे राज्य हैं कि आज जब फीफा विश्व कप 2026 (11 जून से 19 जुलाई) संयुक्त रूप से अमरीका, मेक्सिको व कनाडा में खेला जा रहा है तो इन राज्यों में फुटबॉल के अतिरिक्त कोई चर्चा ही नहीं है। लाइव स्क्रीनिंग के लिए बड़े बड़े स्क्रीन जगह-जगह लगे हुए हैं और खेल प्रेमी अपनी पसंद के खिलाड़ी व टीम के लिए दिलो-जान से चीयर व प्रार्थनाएं कर रहे हैं। यह हाल तो तब है जब भारत आज तक किसी फुटबॉल विश्व कप में नहीं खेला है, अगर वह भी 48 प्रतियोगी टीमों में शामिल होता तो मंज़र क्या होता? कल्पना करना कठिन है। गौरतलब है कि 1950 में जब एशिया के क्षेत्रीय क्वालीफाइंग समूह से सभी टीमों ने ब्राज़ील में आयोजित फीफा विश्व कप से अपना नाम वापस ले लिया था तो भारत ने यह प्रतियोगिता खेलने के लिए स्वत: ही क्वालीफाई कर लिया था, लेकिन अपर्याप्त प्रैक्टिस समय के कारण भारत ने अपनी टीम नहीं भेजी थी। 
इस बार एशियन फुटबॉल कॉन्फेंडरेशन (एएफसी) से जिन टीमों ने विश्व कप के लिए क्वालीफाई किया है उनमें ऑस्ट्रेलिया, ईरान, इराक, जापान, जॉर्डन, कोरिया रिपब्लिक (दक्षिण कोरिया), कतर, सऊदी अरब और उज्बेकिस्तान हैं। अतीत में चीन (2002) ने भी विश्व कप के लिए क्वालीफाई किया था, लेकिन वह एक भी गोल करने में सफल न हो सका, जबकि कोस्टारीका ने उस पर 2, ब्राज़ील ने 4 व तुर्की ने 3 गोल दागे। चीन जैसा विशाल व विकसित देश जो एथलेटिक्स में अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कामयाबी के झंडे गाड़ता है, इस बार विश्व कप के लिए क्वालीफाई भी न कर सका। इससे फुटबॉल में प्रतिस्पर्धा का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज तक कोई एशियन टीम फीफा विश्व कप क्यों न जीत सकी, जबकि एशिया के लगभग हर देश में फुटबॉल खेला जाता है? यहां यह बताना भी आवश्यक है दक्षिण कोरिया एकमात्र एशियाई टीम है जो विश्व कप के सेमीफाइनल तक पहुंची, 2002 में जब उसने जापान के साथ संयुक्त रूप से इस प्रतियोगिता का आयोजन किया था। उससे पहले उत्तर कोरिया 1966 में क्वार्टर फाइनल तक पहुंची थी, जब उसने विश्व कप इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर करते हुए पॉवर हाउस इटली को ग्रुप स्तर पर पराजित करके आगे बढ़ने का श्रेय प्राप्त किया था। 
यह सोचने की बात है कि 1930 में स्थापित होकर हर चार साल के अंतराल (विश्व युद्ध के कारण 1942 व 1946 अपवाद रहे) पर आयोजित होने वाले फीफा विश्व कप के इतिहास में केवल एक एशियाई टीम ही सेमीफाइनल तक क्यों पहुंच सकी? विश्व कप तो तभी जीता जा सकता है जब टीम पहले प्रतियोगिता के लिए क्वालीफाई करे और फिर अच्छे खेल का प्रदर्शन करते हुए फाइनल तक पहुंचे। यह सब न कर पाने के कुछ तो कारण अवश्य होंगे।
इस संदर्भ में विशेषज्ञ अनेक वजह बताते हैं। उनके अनुसार एशिया में फुटबॉल संस्कृति की जड़ें गहरी नहीं हैं, कुलीन युवा विकास पाइपलाइन नहीं हैं और अति प्रतिस्पर्धी घरेलू लीग नहीं हैं, जैसा कि ऐतिहासिक दृष्टि से यूरोप व दक्षिण अमरीका में स्थापित हैं। दरअसल, जो परम्परागत रूप से फुटबाल पॉवर हाउस हैं उन्हें पीढ़ियों के फुटबॉल इतिहास, प्रोफेशनल अकादमी संरचना और टॉप-टियर कोचिंग का लाभ मिलता है। एशियाई देश तो अभी भी यह ग्रासरूट्स व स्काउटिंग सिस्टम्स विकसित कर रहे हैं, यानी फिलहाल उनमें इकोसिस्टम व इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव है। एशियाई खिलाड़ियों को कुलीन एक्सपोज़र भी कमी के साथ मिला है। एशिया के गिनती के खिलाड़ी ही यूरोप की टॉप लीगों में खेल सके हैं, जिससे उन्हें वह दैनिक टैक्टिकल व फिजिकल रूटीन न मिल सका जिसकी विश्व कप जीतने के लिए आवश्यकता होती है। हालांकि इसमें तेज़ी से परिवर्तन आ रहा है, लेकिन वैश्विक प्रतिस्पर्धा के उच्चतम स्तरों पर अब भी यूरोप का ही दबदबा है। समझने की बात यह भी है कि आपकी प्राथमिकताएं क्या हैं? एशिया के अधिकतर समाजों में खेलों की बजाये अकादमिक सफलता पर गहन सांस्कृतिक फोकस है, जिससे से प्रतिभा पूल और संभावित फुटबॉलर्स के लिए प्रोफेशनल रास्ते सिकुड़ जाते हैं।
भारत में अगर आप दस माता-पिताओं से बात करेंगे तो उनमें से 9 का जवाब यह होगा कि वह अपने बेटे को फुटबॉलर की जगह डॉक्टर या इंजीनियर बनाने को प्राथमिकता देंगे। लड़कियों के लिए तो ज्यादातर पैरेंट्स की सोच, उन्हें स्पोर्ट्स स्टेडियम में भेजने की बजाये, यह है कि बस किसी अच्छे घर में उनका ब्याह हो जाये। यह प्राचीन नज़रिया आज भी हावी है कि महिलाओं के लिए एकमात्र संस्कार विवाह है, जबकि तथ्य यह है कि अवसर मिलने पर लड़कियां हर क्षेत्र में नये कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। अब तो महिलाओं के लिए भी विश्व कप के आयोजन होने लगे हैं।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि फुटबॉल विकास के जो कुछ परम्परागत मॉडल्स एशिया के देशों में हैं वह दूरगामी नहीं हैं- त्वरित नतीजों के लिए भारी खर्च पर फोकस करते हैं बजाये सस्टेनेबल, दीर्घकालीन सिस्टम सुधार के। जापान को इस संदर्भ में अपवाद माना जा सकता है। जापान ने 2022 के विश्व कप में पूर्व चैंपियनों जर्मनी और स्पेन को पराजित किया। उसने विश्व कप जीतने का दीर्घकालीन लक्ष्य अपने लिए निर्धारित किया है और वह इसके लिए प्रयासरत है। भारत सहित एशिया के अन्य देशों को भी अपनी कमियों को दूर करते हुए ठोस दीर्घकालीन योजना बनानी होगी, तभी विश्व कप की ट्राफी एशिया में आ सकेगी। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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