मुन्ना सो गया है

(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)
‘फिर?’‘फिर ममता ने मिट्ठू से कहा कि वह टिंकू को साथ ले जाए और बाथरूम में कपड़े खोलें। पापा आकर तुम्हें नहला देंगे और वह खुद टब में पानी डाल कर छोटे को नहलाने लगी। तभी बाथरूम से एक दर्दनाक चीख आई। हम भागकर गए तो देखा, बाथरूम में नीचे लेटा टिंकू तड़प रहा था, उसके पेट से खून फव्वारे की तरह निकल कर दीवारों को भिगो रहा था। मेरे शेव करके रखे ब्लेड से मिट्ठू ने टिंकू का पेट चीर दिया था। हमारे होश उड़ गए। झटपट टिंकू के पेट पर पट्टी बांधकर मैं अस्पताल दौड़ा पर अस्पताल पहुंचने से पहले ही...’ डा. रंजन का गला रुंध गया था। वृद्ध ने उसकी पीठ पर हाथ से सहलाते हुए कहा,  ‘धीरज रखो बेटा। धीरज।’
‘जब तक मैं हारा थका वापस घर लौटा तो घर सूना पड़ा था, पड़ोसियों ने बताया कि छ: मास का मुन्ना टब के पानी में डूब कर मर गया और बड़ा बेटा मिट्ठू जो मारे डर के पड़ोसी की गाड़ी के नीचे जा छिपा था, अनजाने में गाड़ी स्टार्ट करते ही...’
‘हे ईश्वर!’ वृद्ध के मुंह से निकल गया, ‘बस करो बेटा! बस करो। अब मैं तुम्हारी पत्नी की दशा को समझ सकता हूँ।’ आस-पास बैठी सारी सवारियों की आंखें भी भीगी हुई थीं। सब की सांसें रुकी हुई थीं। सारी बातों से लापरवाह ममता बदस्तूर अपने कंधे से लगे गुड्डे को थपक रही थी। डा. रंजन ने चुपके से आंसू पोंछ लिए। 
‘ममता, मुन्ना सो गया है। लाओ इसे मुझे दे दो।’
‘सो गया है? हां! पर तुम्हें क्यों दे दूँ? तुम इसे ले जाओगे। नहीं मैं इसे अपनी गोद में ही सुलाऊंगी।’
‘अच्छा ठीक है। अपनी गोद में ही सुला लो और तुम भी आंखें बंद कर लो न! सो जाओ थोड़ी देर।’
‘हां!’ कहकर ममता किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह बस की सीट पर ही पैर ऊपर करके पालथी मार कर बैठ गई। उसने सिर रंजन के कंधे पर टिका दिया।
‘फिर बेटा नौकरी...?’ 
‘जी, सारे अधिकारी मेरे साथ सहानुभूति रखते हैं, ममता को इलाज के लिए सहायता भी मिल रही है और मुझे छुट्टियां भी लेकिन इस के बाद भी पैसे की तंगी तो आ ही जाती है न?’
‘हां..., सो तो है। पर अब मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ यदि तुम मेरे कहे अनुसार करो तो शायद ममता बिटिया ठीक हो जाए। हो सकता है नियति ने हमें इसीलिए मिलाया हो? मैं तो यह कह रहा हूँ कि एक प्रयास तो किया ही जा सकता है। मेरा नाम करम सिंह है। याद रखना।’
‘जी अंकल, वश लगे तो कोशिश करनी ही चाहिए और वही मैं कर भी रहा हूँ। आप बताएं, मुझे क्या करना होगा?’
‘कुछ नहीं, कल तुम ममता को लेकर इस पते पर आ जाना, बाकी बात वहीं करेंगे। ठीक? ग्यारह बजे आ सकते हो?’ कहकर करम सिंह ने डा. रंजन को एक कार्ड दिया। रंजन ने कार्ड लेकर जेब में रखा और हां में सिर हिलाया। उनका स्टाप आ गया था, करम सिंह उतर गए।
दूसरे दिन रंजन ने अपने साथ चलने के लिए अपनी बहन कामिनी को भी बुला लिया था। कामिनी अपनी गाड़ी ले आई थी। दोनों ने बहला-फुसला कर ममता को गाड़ी में बैठा दिया और थोड़ी ही देर बाद वे उस अनाथ आश्रम में थे जिसका पता कल वृद्ध सज्जन करम सिंह ने डा. रंजन को दिया था। करम सिंह वहां पहले से मौजूद थे और डा. रंजन की प्रतीक्षा कर रहे थे।
वहां पहुँचकर डा. रंजन को पता चला कि करम सिंह उस अनाथालय में अपना खाली समय दिया करते थे इसलिए वहां के अधिकारी उनका खासा सम्मान करते थे। करम सिंह ने पहले से ही सारी बात अनाथ आश्रम के अध्यक्ष को बता दी थी। थोड़ी ही देर बाद एक महिला चार-पांच महीने के बालक के साथ प्रकट हुई। ममता आंखें बंद किए गोद में रखे गुड्डे को थपक रही थी। आंखों ही आंखों में हुए संकेतों के कारण अत्याधिक फुर्ती से बच्चा ममता की गोद में रखकर गुड्डा वहां से हटा लिया गया। 
ममता बदस्तूर बच्चे को थपक रही थी। तभी अबोध बालक ने ममता के सीने को टटोलना शुरू कर दिया, ममता ने बच्चे के हिलते हाथों पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की। बालक गोद में मचलता रहा किन्तु वह यथावत बच्चे को थपक रही थी। अचानक बच्चा रो उठा, ममता ने चैंक कर देखा तो करम सिंह की आंखें चमकने लगीं। बच्चे ने ममता के कपड़े गीले कर दिए थे। 
‘अरे....!’ कहकर ममता झटके से उठी, बच्चा गिरता इस से पहले ही रंजन ने उसे लपक लिया तो ममता ने झट बच्चा रंजन से छीनकर सीने से लगा लिया, ‘कहां ले जा रहे हो मुन्ने को?’ ममता की आंखों में चमक देखकर सब के चेहरे खिल उठे।
‘अंकल, क्या मैं इस बच्चे को गोद ले सकता हूँ?’ रंजन ने पूछा, तो अनाथालय के अधिकारियों के साथ ही करम सिंह का भी सिर हां में हिलने लगा।
‘हां बेटा। मुझे खुशी है कि हम अपने मिशन में सफल हुए। अब ममता बिटिया ठीक हो जाएगी।’ रंजन ने झुककर करम सिंह के पांव छू लिए। (समाप्त)
 

-इन्दिरा नगर-2, लालकुंआं,
ज़िला नैनीताल-262402

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