भारत का पहला पुस्तकालय गांव मणिगुह

उत्तराखंड में ज़िला रुद्रप्रयाग के अगस्त्य मुनि ब्लॉक में 1,664 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक छोटे से गांव मनिगुह ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया। गांव से दिखायी देने वाले प्राकृतिक नज़ारे तो ़गज़ब के हैं ही, जिनमें चोटियां चौखम्बा, सतोपंथ और थाले सागर शामिल हैं, लेकिन मनिगुह को जो बात देवभूमि के अन्य अनेक सुंदर पहाड़ी गांवों से अलग खड़ा करती है, वह उसकी ऊंचाई या खूबसूरत नज़ारे ही नहीं हैं बल्कि यह भी है कि आप इसके जिस भी पहाड़ी रास्ते पर, जिस दिन भी जायेंगे, आपको कोई बच्चा किताब पढ़ते हुए मिल जायेगा। जी, आपने सही पढ़ा, मोबाइल फोन नहीं, किताब पढ़ते हुए।
मनिगुह को यह श्रेय प्राप्त है कि वह उत्तराखंड का पहला ‘पुस्तकालय गांव’ है। यह सम्मान उसे वर्षों की सामुदायिक मेहनत व कार्य से हासिल हुआ है, जिसमें गैर-मुनाफे वाली संस्था ‘हमारा गांव घर फाउंडेशन’ का योगदान भी विशेष रहा है, जिसने पढ़ने के इस इकोसिस्टम को ज़मीनी स्तर से विकसित करने में मदद की। पुस्तकालय गांव का मुख्य आकर्षण मनिगुह सेंट्रल लाइब्रेरी है, जो स्थानीय तौर पर पुस्तक तीर्थ के नाम से विख्यात है और जिसमें 20,000 से भी अधिक किताबें हैं। एक ग्रामीण पहाड़ी समुदाय के लिए यह रेंज दिलचस्प है- शेल्फों पर हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत, कश्मीरी और पंजाबी भाषाओं में किताबें हैं और उनके विषय विज्ञान से लेकर साहित्य, इतिहास, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और बाल फिक्शन तक हैं। नवल किशोर प्रेस की दुर्लभ पुस्तकें भी हैं, 1800 से 1905 तक की। इन दुर्लभ पुस्तकों को अच्छे से संभालकर रखा गया है, जिससे इस संग्रह को आर्काइवल आयाम मिल जाता है, जोकि सामुदायिक रीडिंग रूम से बहुत आगे बढ़ जाता है।
पुस्तकालय साल के सभी कार्य दिवसों पर खुला रहता है और इसके लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं है। यह स्कूली छात्रों, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वालों, शिक्षा की ओर पुन: लौट रहीं महिलाओं और जिज्ञासु पर्यटकों की सेवा में लगा हुआ है। जो बात इस पुस्तकालय गांव मॉडल को विशिष्ट बनाती है, वह यह है कि यह किताब पढ़ने के अनुभव को एक बिल्डिंग तक सीमित नहीं रखता है। प्रतापनगर, खमोली, बंदी व खलयु सहित आसपास की आठ जगहों पर पढ़ने के लिए स्थान बनाये गये हैं, जिन्हें ‘पुस्तक मंदिर’ कहा जाता है। यह खुली-हवा के रीडिंग स्पॉट्स पुस्तकों को सीधे वहां तक ले गये हैं जहां लोग एकत्र होते हैं- ट्रेकिंग ट्रेल्स, मंदिरों के निकट, आदि। इससे किताबें पढ़ना न सिर्फ पर्यटकों, ट्रेकर्स व मंदिरों के दर्शन करने वाले तीर्थयात्रियों के लिए डेस्टिनेशन गतिविधि बन गई है बल्कि स्थानीय लोगों के लिए पढ़ना दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया है। इस विचार का विस्तार कार्तिक स्वामी मंदिर के ट्रेकिंग रूट पर भी किया गया है, जिससे यह अधिक विख्यात कनकचौरी पथ का विकल्प बन गया है और पर्यटक इस ट्रेक को प्राथमिकता देने लगे हैं।
प्रयास यह है कि इस रूट को ‘ज्ञान मार्ग’ के रूप में विकसित किया जाये, जिसमें थोड़े-थोड़े फासले पर पुस्तक मंदिर हों ताकि तीर्थयात्री व ट्रेकर्स अपनी यात्रा के दौरान दोनों प्रकृति व साहित्य का आनंद ले सकें। यह एक खामोश क्रांतिकारी विचार है- पवित्र स्थलों की यात्रा विचारों की यात्रा भी हो सकती है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि केवल किताबें पढ़ने की आदत डालने से स्थायी सामुदायिक विकास नहीं हो सकता। मनिगुह में मैंने देखा कि साक्षरता, जीविकापार्जन, पर्यटन व सांस्कृतिक कार्यक्रमों को एक लड़ी में पिरोकर एक मज़बूत मॉडल बनाने की कोशिश की गई है। इन प्रयासों में पाइन नीडल क्राफ्ट वर्कशॉप्स सबसे अधिक कल्पनाशील हैं। उत्तराखंड के पहाड़ों में लम्बे समय से पाइन नीडल्स को पर्यावरण के लिए समस्या और जंगल की आग का कारण समझा जाता रहा है, लेकिन इन वर्कशॉप्स में पाइन नीडल्स को दस्तकारी के उत्पादों में परिवर्तित किया जा रहा है, जिनमें सुंदर डिज़ाइन की गई राखी भी हैं, जिनके खरीदार अन्य राज्यों के अतिरिक्त विदेशों में भी हैं। वर्कशॉप्स में मुख्यत: गांव की महिलाएं काम करती है। उन्होंने इकोलॉजिकल समस्या को पूरक आय के स्रोत में बदल दिया है। वर्कशॉप्स में मधुमक्खी पालन पर भी बल दिया जाता है।
पिछले तीन साल से मनिगुह में हर वर्ष दो दिन का सांर्स्कतिक फेस्टिवल ‘गांव-घर महोत्सव’ का भी आयोजन किया जा रहा है, जिसमें हिस्सा लेने के लिए देश विदेश से प्रोफेसर, लेखक, कवि, शायर, थिएटर कलाकार, नृत्यांगना, गायक, स्कॉलर आते हैं। इसमें स्थानीय आवाजों व परम्पराओं का जश्न तो मनाया ही जाता है, लेकिन साथ ही ग्रामीण श्रोताओं को सीधे स्कॉलर्स व कलाकारों से सम्पर्क करने का अवसर मिलता है। उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या यह है कि पहाड़ी गांव खाली होते जा रहे हैं क्योंकि रोज़गार की तलाश में लोग बाहर निकल जाते हैं लेकिन मनिगुह का सफल प्रयोग ग्रामीणों को प्रेरित कर रहा है कि वह अपने गांव लौटें और अपने गांवों को अच्छे पर्यटक स्थलों में विकसित करें, वैसे भी पहाड़ी गांवों में प्राकृतिक सौंदर्य व स्वच्छ वातावरण की कोई कमी नहीं है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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