फूफा अर्थात् बिना नियुक्ति का सर्वे अधिकारी 

आज का जो नीरस, सिर पर चांद लिए मुंह बनाकर घुमने वाला फूफा होता है। वह वही एक जमाने का बांका-सजीला जीजा होता है। जो अपने जमाने में उस घर में किसी सुपरस्टार से कम नहीं होता है। जिसको देखने के लिए आस पड़ोस से लोग बहुत प्रेम से आते हैं। जिस की हरेक अदा पर उस घर की सारी लड़कियां जान छिड़कती थी। और यदि थोड़ा हंसमुख, मिलनसार, दरियादिल स्वभाव का जीजा रहता है। तब तो उसकी इज्जत पूछिए ही मत, उस घर की भाभियां भी जीजा के ऊपर सदके जाती, मुरीद हो जाती हैं। उसके बिगड़े बाल भी स्टाइल बन जाते हैं। यह रुतबा होता है। और फटा हुआ जींस भी फैशन बन जाता है। और जब फूफा जीजा होता है तब उसकी बड़ी आव भगत रहती है। और सांलिया भाग-भाग कर उसके लिए तमाम वह काम करती हैं। जिसमें उसे खुशी मिले। उसका रुतबा किसी कलेक्टर से कम नहीं होता है। हर काम में उसकी मर्जी बड़ी मायने रखती है।
उसके लिए तमाम तरी वाले, लज्जतदार व्यंजन बनते हैं। जो उस घर की महिलाओं को आते हैं। और यदि कुछ नहीं आते हैं तो अगल-बगल से भी सीख कर जीजा जी की खातिरदारी में पेश किया जाता है। अब बताइए जहां इतनी खातिरदारी हो तो इंसान का फुल कर कुप्पा होना तो बन ही जाता है। इसीलिए तो हर इंसान एक बार जीजा बनने का ख्वाहिश ज़रुर रखता है। इसीलिए तो मर्द प्रजाति चाहे कितनी भी बूढी हो जाए लेकिन जीजा बनने का मोह उससे नहीं जाता है। 
चाहे आप दुनिया में कुछ भी बन जाइए, लेकिन यदि जीजा नहीं बने हैं तो आप एक अदभुत सुख से वंचित है। और उस पर से यदि जीजा सरकारी नौकरी वाला हो तब तो पूछिए ही मत, उसकी एक छींक पर पूरा घर रुमाल लिए खड़ा मिलता है। 
घर वाले तो घर वाले पड़ोस वाले भी नौकरी वाले जीजा को हाथों पर रखते हैं। और वैसे भी आपने देखा होगा नौकरी वाले लड़कों का रेट इसी कारण हाई रहता है। लेकिन परिवर्तन इस दुनिया का नियम है। कुछ भी यहां पर सदा के लिए नहीं है। ना सुख और ना ही दुख। और जो आज सुख है वही कल दुख भी बन जाता है। यह भी इस सृष्टि का एक बहुत ही कठोर नियम है। एक समय के बाद सालिया अपने घर को चली जाती है। सासु मां परलोक सिधार जाती है। ससुर भी साथ में निकल लेते हैं। मतलब कि जितने भी जीजा के आने से खुश हो सकते थे। एक समय के बाद वह सभी लापतागंज हो चुके होते हैं। बचते हैं साले और सरहज और फिर उनकी बेमुरव्वत, नामुराद, औलादे जिनके लिए अपना जीजा महत्वपूर्ण होता है। ना कि अपने बाप का जीजा महत्वपूर्ण होता है। इन औलादों को फूफा कांटे जैसा लगता है और अपना जीजा आंखों का तारा लगता है। बस यही चीज फूफा को फूफा करने पर मजबूत करती है। आखिर वह करें तो क्या करें जिस घर में उसे पलकों पर बिठाया गया। उसी घर में बैठने के लिए एक ढंग की कुर्सी भी मयस्सर ना हो तो इंसान का भड़कना तो बनता है।
चाहे परिवार में शादी-विवाह हो तो सभी लोग आ जाए एक फूफा के नहीं आने से महफिल कम मसालेदार लगती है। क्योंकि रूठने की जिम्मेदारी फूफा की होती है। हर महफिल को एक फूफा की ज़रूरत होती है। ताकि बाकी रिश्तेदार शांतिपूर्ण ढंग से एकजुट रह सके। 
भले ही फूफा साल में एक बार आता हो और पूरे परिवार का ऑडिट करके जाता हो, लेकिन घर में कदम रखने के साथ ही पहला सवाल यह करना नहीं भूलता है कि ‘अरे अब तक यह आपने नहीं बदला’ या ‘यह आपने बदल दिया?’ जैसे पूरे घर का ठेका उनके पास हो। 
भले ही कोई इस बात को गंभीरता से ले या ना ले लेकिन फूफा यह बात कहता ज़रूर है। मतलब फूफा बिना नियुक्ति का सरकारी सर्वे अधिकारी होता है। जिसके अधिकार न जाने कब के चले गए होते हैं। और बस वह उनके होने के झूठे भ्रम में जीता रहता है। अब जहां इतने दिल में दुख है वहां इंसान कहने से भी क्यों जाए।
अगर आप कोई काम धंधा कर रहे हैं। तो उसमें दो-चार मुफ्त के सलाह तो फूफा बिना मांगे भी दे डालता है। और अगर यदि आप बेरोज़गार हैं तो आपको ऐसे देखता है। जैसे आपने उनकी निजी जिंदगी बेकार कर दी। इससे आप उनकी जिम्मेदारी वाली भावना को समझ सकते हैं।
और शादी ब्याह में तो फूफा जी घर के सबसे अनुभवी विशेषज्ञ होते हैं। क्योंकि बहुत सारी शादियां उन्होंने निपटाया होता है। और हर शादी में सबसे मुख्य दूल्हा और उसके बाद फूफा ही होता है।
हर फूफा का व्यवहार ट्रम्प के जैसा होता है जैसे ट्रम्प जगत फूफा है। और जब तब अपने साले सरहज रूपी सारे अन्य देश पर बिगड़ता रहता है। और सारे देशों को धौंस पट्टी देते रहता हैं। वैसे ही फूफा भी ससुराल को धौंस पट्टी देते रहता है। बीच-बीच में बिगड़ कर अपनी अहमियत जताने से फूफा बिल्कुल नहीं चूकते हैं। यह अलग बात है कि कोई उनका मनावन बड़े ही बेमन से करता है।
फूफा जी वह रिश्तेदार हैं जो कम बोले तो रहस्यमय, ज्यादा बोले तो समस्या। आए तो चर्चा ना आए तो और भी चर्चा एहर हाल में उनका चर्चा होना तय है।


-गिरिजा इलेक्ट्रॉनिक्स काशीपुर बलिया
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