एकाकी मकान

गांव के बीचों-बीच एक बड़ा-सा कच्चा मकान था। मिट्टी की दीवारें, खपरैलों की छत और आंगन में लगा हुआ तुलसी का पौधा और चौपर में बैठे हुए बजरंग बली। घर के बाहर बंधे हुए जानवर जो चारा-भूसा खाने में मस्त रहते थे। 
उसी मकान में एक पिता के छह बेटे अपनी-अपनी बीबी तथा बच्चों के साथ रहते थे। घर बड़ा था पर उसमें रहने वाले लोगों के दिल उससे भी बड़े थे। सुबह होते ही आंगन में चूल्हों का धुआं उठ रहा होता। बहुएं हंसते-खिलखिलाते बच्चों को संभालती हुईं रोटियां सेंकतीं। बच्चे पढ़ने के लिए अपने-अपने स्कूल चले जाते एवं भाई लोग अपने-अपने काम में लग जाते थे। जिनमें से कुछ खेतों में काम पर जाते और कुछ लोग बाहर के कामों में लग जाते। शाम को लौटकर आंगन में बैठकर गपशप करते या पूरे दिन के कामों की चर्चा करते थे। बच्चे खेलते-खेलते कभी झगड़ते और कभी हंसने लगते। पर सबका खाना एक साथ बनता, दिये एक साथ जलते और तरक्की के सपने भी एक साथ देखे जाते थे।
वक्त बदला। किसी को शहर का मोह सताया, किसी को रोज़गार की तलाश ने, किसी को अलग पक्के मकान के लालच ने दूर कर दिया। धीरे-धीरे कच्चे मकान की दरो-दीवारें वीरान हो गईं। एक-एक कर सबने अपने-अपने घर बनवा लिए। अब न वो सामूहिक रसोई की खुशबू रही, न शाम को आंगन में गूंजती बच्चों की किलकारियां।
कच्चा मकान अब भी है परन्तु दीवारों में वो रौनक नहीं रह गई। तुलसी का पौधा भी जैसे चुप हो गया है। घर का पिछला हिस्सा खंडहर बन चुका है और आंगन में अब घास-फूस ने अपना स्थायी निवास बना लिया है। कभी-कभी कोई त्यौहार आता है तो सब भाई मिलते हैं, वो भी पुराने मकान में नहीं बल्कि, गाँव में बने हुए अपने-अपने मकानों में, पर जल्दी-जल्दी अपनी-अपनी दुनिया में लौटकर व्यस्त हो जाते हैं। वह मकान जो अब सिर्फ मिट्टी और खपरैल का नहीं है। उसमें बीते हुए दिनों की कितनी यादें, बेशुमार प्यार, हंसी-ठिठोली और रिश्तों की पर्तें बसी हैं। वह चीख-चीख के गवाही दे रहा है कि, साथ रहने की ताकत क्या होती है और अलग हो जाने के बाद का अकेलापन, एकल परिवार के बच्चों की परवरिश में आने वाली समस्याएं और दर्द कितना गहरा होता है। 
(सुमन सागर)

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