मॉनसून में कमी और देरी से खाद्य सुरक्षा पर संकट की आशंका
जून लगभग खत्म होने को है, लेकिन अभी तक इस साल जून माह में होने वाली मानसूनी बारिश का महज 42 से 43 फीसदी ही हुई है। इसके कारण आम किसानों से लेकर नीति-निर्माताओं तक की पेशानी बढ़ने लगी है। क्योंकि अगर जैसे कि आशंका है, बारिश अगले एक पखवाड़े तक और न हुई या बेहद कम हुई तो देश के 315 ज़िलों में कृषि संबंधी आकस्मिक योजनाएं लागू करनी पड़ेंगी, क्योंकि कम बारिश से न केवल शहरों के लिए पेय जल का संकट मंडराने लगा है बल्कि खरीफ फसल के भी बेहद कमज़ोर होने की आशंका पैदा हो गई हैं। इसका साझा नतीजा देश की खाद्यन्न सुरक्षा पर पड़ता लगा रहा है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने गत 23 जून, 2026 को कहा था कि मानसून में देरी के कारण खरीफ फसलों की बुआई पर बेहद प्रतिकूल असर पड़ रहा है। उनके मुताबिक देश के 111 ज़िले में तो स्थिति बहुत ही खराब है, क्योंकि यहां अभी तक इस साल 25 फीसदी बारिश भी नहीं हुई और यहां सिंचाई के साधनों की भी बेहद कमी है। भारतीय मौसम विभाग के पूर्वानुमान के मुताबिक अभी तक 2 जुलाई, 2026 को समाप्त होने वाले सप्ताह तक मानसून के कमज़ोर रहने की आशंका है, इसके बाद बेहतर होने की उम्मीद है।
जहां तक खरीफ की फसल बोने का सवाल है, तो 22 जून, 2026 तक खरीफ फसल के रकबे में से 10 प्रतिशत की बुआई हो चुकी थी। हालांकि अभी तक इस 10 प्रतिशत रकबे में पिछले साल के मुकाबले ज्यादा बुआई हुई है। 2025 में जहां अब तक 1.13 करोड़ हेक्टेयर में बुआई हुई थी, वहीं इस साल अब तक 1.17 करोड़ हेक्टेयर की बुआई हो चुकी है। लेकिन अगर बारिश न हुई तो न केवल बोई हुई फसलों का नुकसान होगा बल्कि किसानों को अच्छी खासी आर्थिक चपत भी लग सकती है। गौरतलब है कि खरीफ फसलों की बुआई मुख्यत: जून के मध्य से जुलाई पहले सप्ताह तक हो जाती है। लेकिन इस साल जून के आखिरी हफ्ते में अभी तक महज 10 फीसदी क्षेत्र पर ही बुआई हुई है, जिससे आशंका है कि इस साल काफी कम बुआई हो सकती है। खरीफ की फसलों में मुख्यत: धान, मक्का, बाजरा, ज्वार, कपास, सोयाबीन, अरहर और मूंगफली आती हैं। अब चूंकि देश की आधी से ज्यादा कृषि भूमि आज भी सिंचाई की सुविधाओं से वंचित है, यह सीधे मानसून की वर्षा पर ही आधारित है और इस साल जिस तरह से मानसून डरा रहा है, उससे तो यही लग रहा है कि खरीफ की फसल पर बड़े स्तर पर असर पड़ने जा रहा है।
कृषि मंत्रालय के मुताबिक जून 2026 के मध्य तक खरीफ बुआई का क्षेत्र पिछले साल की तुलना में कम तो मामूली ही रहा, लेकिन कुछ फसलें बुआई से बहुत पिछड़ गई हैं, जिनमें कपास, सोयाबीन और दलहन विशेष रूप से हैं। क्योंकि बारिश कम हुई है तो ज़मीन में पर्याप्त नमी नहीं है। ऐसे में जहां बुआई हो भी रही है, वहां आशंका यह है कि कहीं बीज ही खराब न हो जाएं, क्योंकि अगर ज़मीन में नमी कम होती है तो बीज अंकुरित नहीं होते और अगर किसान बुआई जल्दी कर दे और बाद में वर्षा काफी देर तक न हो, अगर हो जाए तो भी ज़रूरी नहीं है कि फसल अच्छी तरह से उग आयेगी, क्योंकि बेहद गर्म मिट्टी में हफ्तों पड़े रहने के बाद कई बीज अंकुरण की अपनी क्षमता खो देते हैं।
धान के लिए तो इस साल उत्तर और मध्य भारत में विशेष तौर पर संकट खड़ा होता लग रहा है, क्योंकि ज्वार, बाजरा और मक्के के अनुकूल तो बारिश फिर भी हुई है या आगे हो सकती है। लेकिन जिस तरह का अभी तक सूखा दिख रहा है, वह वैसा ही अगर जारी रहा, तो इस साल धान की फसल को गहरा धक्का लगेगा। हालांकि अभी भी जानकारों को उम्मीद है कि अगर जुलाई में अच्छी बारिश हो जाए तो जून के नुकसान की भरपायी न भी हो तो घाटा कम हो सकता है। अगर जुलाई का पहला पखवाड़ा बेहद कमज़ोर बारिश का रहा तो धान, कपास, सोयाबीन, मूंगफली और अरहर की फसलों पर जबरदस्त संकट मंडराता दिखेगा। अभी तक तो खाद्यन्न उत्पादन में तो 3 से 8 फीसदी तक की ही गिरावट का अनुमान है, लेकिन जिस तरह से लगातार परिस्थितियां कृषि के प्रतिकूल हो रही हैं, उससे यह संकट बड़ा भी हो सकता है, जिसका सबसे बड़ा असर किसानों पर ही पड़ेगा, क्योंकि एक तरफ तो उनकी फसल कम होगी, दूसरी तरफ बुआई के नुकसान के कारण अच्छा-खासा आर्थिक नुकसान भी होगा। इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इस साल का मानसून भारी दबाव बनाता दिख रहा है।
सरकार पर इसका असर इसलिए भी भारी पड़ सकता है, क्योंकि करीब 80 करोड़ लोगों को खाद्य सुरक्षा के तहत जो मुफ्त का राशन दिया जा रहा है, उससे देश की जीडीपी किसी हद तक कम हो सकती है। हालांकि सरकार अभी तक ऐसा नहीं मानती। लेकिन सरकार माने या न माने, खुले बाज़ार से राशन खरीदने वालों को पिछले एक महीने में 15 से 20 फीसदी तक की राशन में बढ़ी कीमतों का एहसास हुआ है। खासकर दालों, खाद्य तेलों, सब्ज़ियों और पशुओं के लिए चारा-आहार पर बढ़ी कीमतें किसान का बजट बिगाड़ रही हैं। हालांकि सरकार कई आपातकालीन योजनाएं लागू कर रही हैं। मसलन वह लगातार किसानों को प्रोत्साहित कर रही है कि कम अवधि वाली और कम पानी लेने वाली फसलें बोएं। इसके अलावा सरकार लगातार जल संरक्षण, तालाबों और चेक डैमों की मरम्मत, साथ ही वैकल्पिक बीज उत्पादन जैसी संकट से निपटने की योजनाओं को लागू कर रही है, लेकिन कोई नहीं जानता कि आने वाले 20 से 22 दिन कैसे होंगे?
अगर निर्धारित मात्रा की 80 फीसदी तक भी बारिश हो जाती है तो संकट काफी हद तक काबू में रहेगा, लेकिन यदि 50 फीसदी तक ही बारिश होती है, तो देश के 315 जिलों में आपातकालीन स्थितियों का सहारा लेना पड़ेगा। हालांकि तात्कालिक रूप से खाद्यन्न की समस्या नहीं होगी, लेकिन अन्य चीज़ों में जो महंगाई बढ़ेगी, वह आम और मध्यवर्ग को तोड़कर रख देगी। यही कारण है कि किसानों से लेकर सरकार और वैज्ञानिकों तक की इन दिनों नजरें बादलों पर टिकी हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



