मुन्ना सो गया है
कभी-कभी जीवन ऐसे करिश्मे दिखाता है कि आंखें बस देखती ही रह जाती हैं और अक्ल दंग। डा. रंजन की परिस्थिति भी कुछ ऐसी ही हो गई थी। वह जीवन के रंगमंच पर नियति के मदारी के हाथों का खिलौना बना ताक-धिनाधिन नाच रहा था।
आज भी वह रोहतक के मानसिक चिकित्सक डा. राजीव डोगरा से ममता का चैकअप करवा कर वापस लौट रहा था। डा. डोगरा उसका क्लासमेट था और बरसों से ममता का इलाज कर रहा था लेकिन प्रगति बहुत धीमी गति से हो रही थी। बस इतना हुआ कि जो ममता पहले एकदम गुमसुम हो गई थी, अब सभी का कहना मान लेती थी।
इस समय भी रंजन बड़ी मुश्किल से ममता को बहला-फुसला कर बस पर चढ़ाता पर वह बार-बार बस से उतर जाती और बस के कण्डक्टर से बिनती करती कि उसके बच्चे खो गए हैं, उन्हें ढूंढ़ने दे। फिर वह बस के नीचे घुस जाती और टिंकू... मुन्ना...मिट्ठू को पुकारने लगती। बस में बैठे लोग समझ चुके थे कि औरत पागल है अत: सब सहानुभूति का व्यवहार कर रहे थे। अलबत्ता इस बस के चालक और परिचालक उन दोनों को जानते थे। वे रोहतक उन्हीं के साथ जो आते-जाते थे।
जब ममता बार-बार बस से उतरने लगी और बस को चलने में देर होने लगी तो शेष यात्री भी परेशान होने लगे। कुछ बेहूदा किस्म के छोकरे जब बाकायदा फब्तियां कसने लगे तो कण्डक्टर ने कहा ‘दीदी, मुझे पता है आपके बच्चे कहां हैं। मैं आपको ले चलता हूँ बच्चों के पास। चलिए तो सही।’
‘तुम्हें पता है? हां चलो-चलो...’ कहती ममता कण्डक्टर के इशारे पर बस में बैठ गई। कण्डक्टर ने बस का दरवाजा बंद करके सीटी बजा दी। डा. रंजन ने नज़रों से ही उसे धन्यवाद दिया और ममता के साथ वाली सीट पर बैठ गए।
ममता के लम्बे बालों को कटवाते हुए उस समय रंजन को बहुत दु:ख हुआ था, लेकिन वह करता भी क्या? कौन सी रिश्तेदार उनके पास बैठी रहती जो ममता के बालों की देखभाल करती। सलवार-सूट में कटे बालों वाली ममता के हाथ में एक बड़ा-सा गुड्डा था, जिसे कभी वह चूमने लगती। कभी कंधे से लगाकर थपकी देती और सुलाने का अभिनय करती। पूरी बस के यात्रियों की आंखों में एक विचित्र सी जिज्ञासा थी जो उसके इर्द-गिर्द प्रश्नों के घेरे बना रही थी। हालांकि रंजन इस बात से अनभिज्ञ तो नहीं था पर वह कर भी क्या सकता था?
एक ओर तो पत्नी का पागलपन और दूसरी ओर लोगों की घूरती निगाहें। रंजन परेशान होते हुए भी शान्ति का अनुभव कर रहा था। अब तो उसे इन बातों की आदत भी पड़ चुकी थी, पर तभी वह हुआ जिससे रंजन बचना चाह रहा था। उसके पास बैठे एक सम्भ्रांत से वृद्ध ने पूछ ही लिया, ‘बेटा, क्या लगती है यह लड़की तुम्हारी?’
‘जी, पत्नी है, मेरी।’ रंजन बड़ी घुटन का अनुभव कर रहा था।
‘बेटा, इस हालत में तुम्हें इसे बस में नहीं लाना चाहिए था। क्या दूर रहते हो?’
‘जी अंकल, दिल्ली में रहता हूँ और सालों के लम्बे इलाज के बाद अब मेरे लिए बस में यात्रा करना ही सम्भव रह गया है क्योंकि आपने देखा, कि कण्डक्टर ने इसे कैसे सम्भाला था। मैं अकेला नहीं सम्भाल पाता। थोड़ी सुविधा रहती है। इन लोगों से परिचय हो गया है इसलिए फोन करके इनकी ड्यूटी पूछ लेता हूँ। उसी हिसाब से डाक्टर से दिन तय कर लेता हूँ।’
‘ओह! क्या हुआ था? मेरा मतलब है, तुम्हारी पत्नी की हालत देख कर ही पता यह चल रहा है कि इसे किसी बात का भारी सदमा लगा है। कहां हैं तुम्हारे बच्चे?’
‘वे अब इस दुनिया में नहीं हैं।’ रंजन की आंखें भर आईं।
‘मतलब?’
‘तीनों परमात्मा को प्यारे हो गए।’
‘बेटा, छेड़ने से घाव दुखते तो हैं, लेकिन यह भी कहा जाता है कि दु:ख बांटने से हल्का हो जाता है। शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं। अगर कोई हर्ज न हो तो मैं जानना चाहूँगा कि ऐसा क्या हुआ कि तुम्हारी पत्नी मानसिक रोग की शिकार हो गई और तुम्हारे बच्चे...?’ वृद्ध ने बात अधूरी छोड़ दी।
‘आप ठीक कहते हैं अंकल, दरअसल हम दोनों पति-पत्नी डॉक्टर हैं। मेरे तीन बेटे थे और हम दोनों की सफदरजंग में अच्छी खासी नौकरी भी थी, बड़ा बेटा पांच साल का, दूसरा तीन का और सब से छोटा छ: महीने का था।’ वह दम लेने के लिए रुका तो उसने देखा, पूरी बस के लोग बड़े ध्यान से उसकी बात सुन रहे थे। ममता बाकायदा अपने कंधे से लगे गुड्डे को सुला रही थी।
वह फिर बोलने लगा, ‘उस दिन हम दोनों को ही एक आप्रेशन में हिस्सा लेना था, सहायक के रूप में। हम दोनों आपस में इस बात की चर्चा भी कर रहे थे। मैं ममता को आप्रेशन की प्रक्रिया भी समझा रहा था। बच्चे पास बैठे बड़े ध्यान से सुन रहे थे। उन्हें मैंने डांट कर भगा दिया और ममता से कहा था कि जल्दी तैयार हो जाए ताकि अस्पताल समय पर पहुँच सकें।’ वह सांस लेने के लिए रुका।
(क्रमश:)



