अमरनाथ यात्रा को सुरक्षित बनाने की चुनौती
आगामी 3 जुलाई, 2026 से शुरु होने जा रही इस साल की 57 दिवसीय अमरनाथ यात्रा को लेकर देश के गृह मंत्री से लेकर जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल, मुख्यमंत्री तक इसके सकुशल हो जाने को लेकर चिंतित है। सुरक्षा की व्यवस्था इतनी जबदस्त है कि यात्रा आरंभ होने के एक महीना पहले ही जम्मू से लेकर पहलगाम तक और बालटाल के रास्ते की पहाड़ियां तक सीआरपीएफ तथा सेना की निगरानी में आ गई हैं। पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को इस यात्रा के लिए कितना बड़ा खतरा माना जा रहा है, यह इसी से समझा जा सकता है कि गत 12 जून, 2026 को जब नई दिल्ली में उच्चस्तरीय सुरक्षा समीक्षा की बैठक हुई, तो उसमें गृह मंत्री के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी मौजूद थे। अजीत डोभाल का होना,मतलब मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ चुका है।
पाक अधिकृत कश्मीर में जिस तरह से आंदोलन हो रहा है, वहां पर पाकिस्तान सेना दमन कर रही है, उसके पीछे किसी बड़ी साजिश की शंका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही राजौरी जिले के मंजाकोट सेक्टर में गंभीर मुगलान क्षेत्र के डोरीमल जंगल में आतंकवादियों के खिलाफ सेना का आपरेशन शेरुवाली को चलते हुए लगभग इतना समय हो चुका है कि इसे अब तक के आतंकविरोधी अभियानों में सबसे अधिक समय तक चलने वाला अभियान कहा जाने लगा है। अमरनाथ यात्रा पर आतंकवादियों का खतरा इतना अधिक है कि राज्य सरकार ने विभिन्न विभागों के 63 जेकेएएस अधिकारियों को प्रतिनियुक्त किया है। यह यात्रा मार्ग पर कैंप निदेशक तथा एडिशनल निदेशक के रुप में होंगे। हज़ारों की तादाद में अर्धसैनिक बलों के जवान लगाए गए हैं। सेना भी अपने घुड़सवार दस्तों के साथ मौजूद रहेगी। बताया जा रहा है कि यात्रा के लिए 670 अर्धसैनिक बलों की कंपनियों की तैनाती की गई हैं। पहलगाम तथा बालटाल के जिस रास्ते से यात्रा गुजरेगी वहां पर हर आने जाने वाले पर सुरक्षा कर्मियों की नज़र होगी।
इसके बाद भी खुफिया रिपोर्टों में कहा गया है कि यात्रा के दौरान ड्रोन, लिक्विड बम और आईईडी का भी इस्तेमाल हो सकता है। जैश-ए-मोहम्मद की तर्ज पर आतंक फैलाने वाले संगठनों पर विशेष नज़र रखी जा रही है। माना जा रहा है कि ये बेस कैंपों को निशाना बना सकते हैं। जम्मू-कश्मीर के उन स्थानों पर विशेष नज़र रखी जा रही है, जहां पर सेना की हलचल है और कैमरे लगे हैं। इसके पीछे आतंक के उस माड्यूल को माना जा रहा है, जो सैन्य गतिविधियों को रिकॉर्ड कर पाकिस्तान को भेज सकता है या आतंकवादी इनसे मदद ले सकते हैं। श्रीनगर, पहलगाम, सोनमर्ग, गुलमर्ग, दूधपत्री, यूसमर्ग, गांदरबल जैसे पयर्टन क्षेत्रों के अधिकांश पर्यटनस्थल बंद कर दिए गए हैं, जहां पर ट्रैकिंग या वैली टूरिज़्म है। सुरक्षा कारण के नाम पर सड़क से पचास मीटर दूर तक के पर्यटन स्थल बंद हैं। एक तरह से यह कहा जा सकता है कि अमरनाथ यात्रा के एक माह पहले ही से यहां के पर्यटन सेक्टर पर सुरक्षाबलों ने बैन लगा दिया है।
देश भर से आने वाले पर्यटक, इस तरह पर्यटन स्थलों के बंद होने से निराश हैं। पहलगाम के आधार शिविर पर पूरी तरह से रेलिंग लगाकर उसे सुरक्षित किया गया है और उससे लगते राजमार्ग पर इतना सुरक्षाबल है कि वहां से गुजरने पर कम से कम आधा घंटा तो लग ही जाता है।
जम्मू से श्रीनगर तक तथा पहलगाम तक के हाइवे पर सुरक्षा की व्यवस्था का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सेना या अर्धसैनिक बलों के दस्तों में चाहे चार वाहन ही क्यों न हों, गुजरने पर आम आदमी का रास्ता रोक दिया जाता है। समझा जा सकता है कि अमरनाथ यात्रा को लेकर केन्द्र व राज्य सरकार कितनी गंभीरता से काम कर रही हैं। आखिर इस बार इतनी सुरक्षा व्यवस्था क्यों है? दरअसल, पाकिस्तान में खासकर कश्मीर के उस हिस्से में जो पाक के अनधिकृत कब्जे में है, वहां के हालत बहुत अधिक संवेदनशील हैं। गत वर्ष 22 अप्रैल को पहलगाम के बैसरन में आतंकवादियों ने जिस तरह से 26 भारतीयों की हत्या की और उसके बाद पाकिस्तान को ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से सबक दिया गया, उस रंजिश के कारण पाकिस्तान अपने आतंकवादियों के माध्यम से अमरनाथ यात्रा को टारगेट कर सकता है। पाकिस्तान की टारगेट लिस्ट में अमरनाथ यात्रा हमेशा से रही है। वर्ष 2000 में 2 अगस्त को आतंकवादियों ने पहलगाम बेस कैंप पर अंधाधुंध फायरिंग की थी जिसमें 32 लोगों की जान गई थी। वर्ष 2017 में 10 जुलाई को अनंतनाग जिले के पास यात्रियों की बस पर हमला हुआ,यहां पर सात भक्तों की मौत हुई थी। इसके अतिरिक्त 1993-1996 के बीच भी पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा यात्रियों को हमला करके घायल किया जा चुका है। इन घटनाओं को देखते हुए न सिर्फ यहां के आतंकवादियों के छिपने की संभावना वाले स्थानों पर प्रतिबंध लगाया गया है, बल्कि पूरा हवाई क्षेत्र नो फ्लाई ज़ोन में बदला जा चुका है। एंटी ड्रोन सिस्टम तथा मल्टी डाइमेंशलन कैमरे तो हर क्षेत्र पर नज़र रखने के लिए हैं ही। इस बार हैलीकॉप्टर सुविधा बंद है। सिर्फ अकास्मिक घटना में मदद के लिए हैलीपैड तैयार किए गए हैं। सुरक्षा के जानकार बताते हैं कि राजौरी में जिस तरह से आतंकवादियों को खोज पाना मुश्किल हो रहा है, वह भी एक बड़ी चुनौती है। अमरनाथ यात्रा के लिए राज्य में एक विशेष अभियान भी तेज़ कर दिया गया है। इसमें उन कर्मचारियों को पकड़ा जा रहा है, जो आतंकवादियों के मददगार हो सकते हैं। अब तक इस वर्ष दस कर्मचारियों की, वर्ष 2025 में भी लगभग इतने ही सरकारी कर्मचारियों को सेवा से निकाला गया था।
गत पांच वर्ष का आंकड़ा देखें तो यह एक सैकड़े के आसपास हो सकता है। हाल में इसमें तेज़ी की वजह यही है कि गत वर्ष जब बैसरन में हमला हुआ तो स्थानीय मददगारों की भूमिका सामने आयी थी। सेना तथा अर्ध-सैनिक बलों के लिए यहां एक परेशानी स्थानीय भाषा से आती है। यहां पर अधिकतर सुरक्षा बल दूसरे प्रदेशों के हैं और वे यहां पर अधिकांशत: बोली जाने वाली भाषा कश्मीरी को नहीं समझते।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



