पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए क्या है भाजपा की रणनीति ?

तस्वीर के दो ऱुख हैं जां और ़गम-ए-जानां,
एक नक्श छुपाना है, एक नक्श दिखाना है।
—जिगर मुरादाबादी 

पंजाब विधानसभा चुनाव संबंधी भाजपा तथा आरएसएस में गहन मंथन चल रहा है। सबसे ताज़ा बैठक 17 जून, 2026 को चंडीगढ़ में हुई, जिसमें आरएसएस की ओर से संयुक्त महासचिव अरुण कुमार, भाजपा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बी.एल. संतोष संघ की ओर से पंजाब भाजपा के संगठन महासचिव मंथरी श्रीनिवासलू तथा सौदान सिंह आदि जबकि भाजपा की ओर से राष्ट्रीय महासचिव तथा सांसद तरुण चुघ, पंजाब भाजपा के अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों, पूर्व अध्यक्ष सुनील जाखड़, कार्यवाहक अध्यक्ष अश्विनी शर्मा तथा अन्य कई नेता भी शामिल हुए। इस बैठक की जानकारी बेशक अभी सामने नहीं आई, परन्तु ‘सरगोशियां’ हैं कि इस बैठक में पंजाब विधानसभा चुनाव ही मुख्य मुद्दा था। हालांकि वैब मीडिया पर काफी समाचार हैं कि केन्द्र सरकार पंजाब में भाजपा को जिताने के लिए चंडीगढ़ को छोड़ कर सिखों तथा पंजाब के कई बड़े मामलों के बारे में कोई घोषणा कर सकती है, परन्तु हमारी जानकारी के अनुसार केन्द्र सरकार चंडीगढ़ तथा पंजाबी भाषी क्षेत्रों के अतिरिक्त सिख पंथ की अधिकतर परम्परागत मांगों बारे कोई भी बड़ी घोषणा नहीं करेगी। हां, पंजाब को सिंधु जल समझौता रद्द होने के कारण मिलने वाले पानी को लेकर कुछ राहत अवश्य दे सकती है, परन्तु पंजाब के रिपेरियन कानूनों के अनुसार पानी की मालिकी तथा नदियों के बेसिन के हिसाब से उसके अधिकारों की रक्षा के लिए किसी घोषणा की कोई सम्भावना नहीं, पंजाब को किसी आर्थिक पैकेज या सीमांत प्रदेश होने के कारण विशेष पैकेज के आसार भी कम ही हैं। पंजाब के किसानों के ऋण माफी की सम्भावना भी बहुत कम है। चाहे इस बारे में भाजपा के चुनाव घोषणा-पत्र में ऐसा कोई वायदा किए जाने की सम्भावना अवश्य है। भाजपा अधिक ज़ोर नशा मुक्त पंजाब, केन्द्रीय योजनाओं, डबल इंजन सरकार के लाभ, बंदी सिंहों में से कुछ की रिहाई की घोषणा अवश्य कर सकती है जबकि भाजपा का मास्टर स्ट्रोक पंजाब के अधिकतर डेरों को साथ लेकर चलने की रणनीति होगा और अन्य पार्टियों के नेताओं को पार्टी में शामिल करना तथा सिख एवं पंजाब के प्रतीकों का इस्तेमाल करना भी उसकी रणनीति का हिस्सा होगा। 
नि:संदेह भाजपा के चाणक्य गृह मंत्री अमित शाह अकाली दल बादल के साथ समझौते के पक्ष में नहीं हैं, परन्तु हालात जो इशारा कर रहे हैं और जो ‘सरगोशियां’ सुनाई दे रही हैं, उसके अनुसार भाजपा पंजाब में कांग्रेस को पुन: उठने देने से रोकने के लिए अंत में चुनाव के नज़दीक जाकर अकाली दल बादल के साथ समझौता करने को मजबूर होगी, नहीं तो एक ओर कांग्रेस मज़बूत होगी तथा दूसरी ओर गर्म विचारधार वाले गुट भी ज़ोर पकड़ेंगे। एक आश्चर्यजनक जानकारी है कि ‘आप’ के कई नेता समझते हैं कि भाजपा तथा अकाली दल का समझौता उनके फायदे में है। वे समझते हैं कि यदि अकाली दल तथा भाजपा अलग-अलग चुनाव लड़े तो वे दोनों इतने कमज़ोर हो जाएंगे कि ‘आप’ विरोधी सारे वोट कांग्रेस के पीछे इकट्ठा हो जाएंगे तथा 2022 में गर्म विचारधारा वाले जिस सिख वोट ने ‘आप’ का साथ दिया था, वह इस बार ‘आप’ को छोड़ कर गर्म विचारधारा वालों की ओर लौट सकता है, परन्तु यदि अकाली-भाजपा समझौता होता है तो भाजपा पक्षीय वोट कांग्रेस की ओर नहीं झुकेगी। इसलिए यदि भाजपा ने कांग्रेस मुक्त भारत के लक्ष्य पर चलना है तो अंत में वह अकाली दल बादल के साथ समझौता करेगी और अकाली दल (पुनर्सुरजीत) के 15-20 प्रमुख नेताओं को व्यवस्थित करने पर मजबूर होगी, परन्तु जानकारों का कहना है कि यदि यह समझौता बिल्कुल चुनावों के निकट जाकर हुआ तो इसका भाजपा तथा अकाली दल बादल दोनों को अधिक लाभ नहीं हो सकेगा, क्योंकि तब तक दोनों पक्ष अपने-अपने काडर के मन में एक-दूसरे के प्रति इतना ज़हर भर चुके होंगे कि वोट ट्रांस्फर करना कठिन हो जाएगा। 
कितने चेहरे लगे हैं चेहरों पर,
क्या ह़कीकत है और सियासत क्या।
—सागर ़ख्यामी 
अमित शाह जी कुछ सोचें, अन्याय न करें 
हक मेरा मुझको मेरे यार नहीं देते, 
धूप में साया-ए-दीवार नहीं देते।
—अब्दुल सकूर ‘आगी’ 
एक तरफ भाजपा पंजाब के चुनाव अकेले लड़ कर सरकार बनाने की बात करती है और दूसरी तरफ पंजाब के हितों के लिए किसी भी स्तर पर पंजाब के साथ न्याय करते दिखाई नहीं देती। 15 जून, 2026 को ‘किशाओ बहु-उद्देश्यीय डैम प्रोजैक्ट’ संबंधी समझौता बैठक में अमित शाह की अध्यक्षता में बैठक हुई जिसमें संबंधित केन्द्रीय मंत्री, कुछ मुख्यमंत्री तथा 6 राज्यों हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान के प्रतिनिधि शामिल हुए। 15 हज़ार करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इस पीने वाले पानी के प्रोजैक्ट में 13,500 करोड़ रुपये केन्द्र ने खर्च करने हैं। 6 राज्यों ने मिल कर सिर्फ 1500 करोड़ रुपये देने हैं। इसमें 2000 करोड़ की लागत से जो 660 मैगावाट का बिजली प्रोजैक्ट निर्मित होना है, उसमें हिमाचल ने इसके लिए कोई पैसा नहीं देना, क्योंकि उसने अपने हिस्से का पानी दिल्ली तथा राजस्थान को देना है अर्थात उसे पानी की अप्रत्यक्ष रूप में कीमत मिलेगी। कहा गया है कि यह फैसला यमुना के बेसिन (बहाव क्षेत्र) के आधार पर किया गया है। आश्चर्य है कि जब पंजाब की बात आती है तो रिपेरियन कानून तथा बेसिन का सिद्धांत ताक पर रख दिया जाता है। वैसे अमित शाह जी, पंजाब घग्गर-हाकड़ा बेसिन के लिहाज़ से यमुना बेसिन का हिस्सेदार भी है, और पंजाब हरियाणा, हिमाचल के विभाजन के लिहाज़ से यदि हरियाणा पंजाब के पानी की हिस्सेदार है तो पंजाब यमुना के पानी की हिस्सेदार क्यों नहीं? इसलिए कृपा करके पंजाब के साथ एक और बड़ा अन्याय होने से रोकें। पंजाब को इस स्थिति में तो यह डर भी सताने लग पड़ा है कि चिनाब का पानी चन्द्रा नदी से ब्यास सुरंग के माध्यम से डाले जाने के बाद किसी अन्य राज्य को ही न भेज दिया जाए, जबकि इन नदियों का बेसिन तथा रिपेरियन अधिकार पंजाब का भी है। उल्लेखनीय है कि मामला सिर्फ पानी का नहीं, यह कृषि, आर्थिकता, राजनीति तथा राज्यों के साथ न्याय का भी मामला है। आगामी दिनों में इराडी ट्रिब्यूनल की रिपोर्ट, यमुना जल समझौता तथा केन्द्र से बातचीत विवाद की दिशा तथा दशा तय करेगी। पंजाब को इस बारे में अधिक सचेत होने की ज़रूरत है और अमित शाह जी को हमारा परामर्श है कि यदि वह पंजाब तथा सिखों को साथ लेना चाहते हैं तो पंजाब के हितों के बारे में भी सोचें। 
मुझे दोस्त कहने वाले ज़रा दोस्ती निभा दे,
या मुतालबा है ह़क का कोई इल्तिज़ा नहीं है।
—शकील बदायूनी  
यह शख्सियत भी याद करने के योग्य  
प्रसिद्ध शायर ़फैज़ अहमद ़फैज़ का एक शे’अर,
जिस धज से कोई म़कतल में गया, 
वो शान सलामत रहती है।
ये जान तो आनी जानी है,
इस जां की कोई बात नहीं।
यह कुर्बानी देने के लिए अपनी मज़र्ी से कत्लगाह की ओर जाने वालों की शान में लिखा गया शे’अर है। मैं समझता हूं कि ज़ुल्म की काली बहरी रात के समय ज़ालिम के खिलाफ बोलने तथा विरोध करने वाले चाहे शहीद न ही किये जाएं, परन्तु क्रियात्मक रूप में वे ज़िंदा शहीदों से कम नहीं होते। हम हर बार जून में ऑपरेशन ब्लू स्टार के शहीदों तथा 1984 के कत्लेआम के पीड़ितों को सामूहिक रूप में याद करते हैं। वैसे तो हमें अपने भीतर भी दृष्टिपात करने की ज़रूरत है कि क्या हम सरकार को अत्याचार करने का अवसर और बहाना स्वयं ही तो नहीं दे बैठे। इस मामले में हमारे नेतृत्व की क्या गलतियां थीं, इस संबंधी भी विचार-विमर्श होना चाहिए? खैर, हम शहीदों को याद करते हैं, परन्तु अफसोस, हम उन शख्सियतों को इस अवसर पर सिराज-ए-अ़कीदत भेंट करना भूल जाते हैं, जिन्होंने इस ऑपरेशन के विरोध में एक खतरनाक अवसर पर सरकार को यह कहने का साहस किया कि हम आपके अत्याचार के विरोध में आपकी ओर से प्रदत्त पदवियों और अवार्डों को वापस करते हैं। चाहे बाद में वे फायदे में रहे या नुकसान में, परन्तु उस समय उनका यह कदम किसी कुर्बानी के कम नहीं था। इनमें पद्म भूषण वापस करने वालों में प्रसिद्ध पत्रकार तथा लेखक खुशवंत सिंह तथा इतिहासकार डा. गंडा सिंह, पद्मश्री वापस करने वालों में ‘अजीत’ के संस्थापक सम्पादक तथा प्रसिद्ध ़गज़लगो डा. साधु सिंह हमदर्द, पिंगलवाड़ा के संस्थापक भगत पूरन सिंह तथा डा. खुशदेव सिंह शामिल थे जबकि कांग्रेस तथा लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने वाले कैप्टन अमरिन्दर सिंह, डी.आई.जी. का पद छोड़ने वाले सिमरनजीत सिंह मान, अध्यक्ष अकाली दल (अमृतसर), राजदूत का पद ठुकराने वाले हरिन्दर सिंह खालसा, 4 आई.ए.एस. अधिकारी हरदयाल सिंह, सरवण सिंह बोपाराय, राजिन्द्र सिंह तथा गुरप्रताप सिंह शाही जिन्होंने श्री अकाल तख्त साहिब की कारसेवा के लिए छुट्टी ली तथा आई.ए.एस. संतोख सिंह भुपाल तथा कर्नाटक के एडीशनल चीफ सैक्रेटरी चिरंजीव सिंह जिन्होंने विरोध में निकले रोष प्रदर्शन का नेतृत्व किया, आदि शामिल थे। यहां एक और आवश्यक बात भी है कि इस ऑपरेशन के विरोध में बगावत करने वाले धर्मी फौजियों की कोई सूची आज तक ऑन-लाइन कहीं भी नहीं मिल रही जबकि उनकी कुर्बानी भी जान कुर्बान कर देने वालों से कम नहीं थी। यदि हमारे पास उनकी एक सूची तक नहीं तो हम उनकी कद्र क्या पाएंगे। मैं समझता हूं कि हमें शहीदों के साथ-साथ ऑपरेशन ब्लू स्टार का, उच्च पदवियां छोड़ कर, अवार्ड लौटा कर विरोध करने वालों का सम्मान भी प्रत्येक वर्ष करना चाहिए। नि:संदेह उनमें से किसी को बाद में राजनीतिक लाभ भी मिला हो, परन्तु उस समय के उनके साहस को सलाम करना ही बनता है।
 
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