कांग्रेस की मुश्किलें
पिछले 12 वर्ष में भारतीय राजनीति में जो फर्क नज़र आने लगा है, वह फर्क है मोदी फैक्टर। यह लगने लगा है कि यह वह भारत है ही नहीं, जिसे हमारी पीढ़ी जानती थी, पहचानती थी। भारतीय जनता पार्टी ने समाज को इतना बदल दिया है कि लोग अपने पुराने दोस्तों को भी मुश्किल से पहचानते हैं। समाज और राजनीति का यह नया विमर्श है। इस नये विमर्श के सामने नये भारत को देखना, संरचना को समझना, कैसे निपटा जाएं, का प्रश्न मानीखेज हो गया है। लेनिन ने लिखा था कि साम्राज्यवाद कोई स्वतंत्र व्यवस्था या नीति नहीं है। यह प्रकृति में एकाधिकार है जहां बैैंकिंग और वित्तीय पूंजी का वर्चस्व हो जाता है। औद्योगिक और बैंकिंग पूंजी का विलय वित्तीय क्लीनतंत्र कहलाता है। विपक्ष मौजूदा हालात में काफी भ्रमित नज़र आता रहा है। ऐसे में बौद्धिक और व्यवहारिक खीझ कांग्रेस पर उतरती है।
एक प्रगतिशील स्वस्थ जनतंत्र में विपक्ष का मज़बूत होना अनिवार्य है, परन्तु अगर वही आलोचना के लिए आलोचना करने लगे और जन-पक्षीय अपने कार्यक्रम से ठीक से परिचित न करवा पाये तो नुकसान विपक्ष का और जनता का दोनों का होता है। समझा यह जा रहा है कि इस देश में तथाकथित बुद्धिजीवियों और उदारवादियों का एक ऐसा वर्ग है जो भारत के वर्तमान और भविष्य के प्रति आशंकित है और वर्तमान में अपने आप को एडजस्ट नहीं कर पा रहा। इसे जिस बेचैनी के रूप में देखा जा रहा है, जेन जी का गुस्सा उससे अलग नहीं है। पढ़ाई, परीक्षा और नौकरी की व्यवस्था को देखते हुए उसका तनाव और गुस्सा गलत नहीं ठहराया जा सकता। यदि कांग्रेस में कमियां और गलतियां न होती तो भाजपा का उभार असम्भव था। पंडित नेहरू के बाद विचारधारा पर टिकने और विचारधारा के साथ चलने वाले नेताओं का लगभग अभाव ही रहा। पार्टी का लक्ष्य नज़र आता रहा-जैसे भी हो सत्ता हासिल करो और उस पर बने रहो। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस भाजपा के हिन्दुत्व का सामना नहीं कर पाई। मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप का भी कोई माकूल जवाब नहीं था लिहाज़ा 2014 में कांग्रेस की बनी बनाई इमारत ढह गई।
इंदिरा गांधी ईमानदार कांग्रेस लीडरशिप का सम्मान कर पाने में विफल रही और प्रशंसा करने वालों को आगे बढ़ाती रही। सत्ता के भूखों के लिए यह एक अवसर था, जिनमें विचारधारा का नितांत अभाव था। ऐसे लोगों को ऊंचे पद मिले जो उतने योग्य नहीं थे। नेहरू गांधी की विचारधारा पर चलने वाले लोग गायब होते गए, जो जन-जीवन को समझते थे, जनता में जिनका सम्मान था। अस्सी के दशक तक आते-आते मजबूत दिखने वाली कांग्रेस भीतर ही भीतर से खोखली होती जा रही थी। नब्बे का दशक और भी चोट पहुंचाने वाला था। मंडल कमीशन सामाजिक न्याय की पुकार पर टिका था, वहीं राम मंदिर की आस्था की घंटियां कानों को बहरा कर रही थीं। 2014 की हार करारी हार थी। कांग्रेस की कल्पना से परे। पार्टी की कोई सफल रणनीति न बन पाई। नेताओं के घोटालों ने रही-सही कसर पूरी कर दी। लिहाज़ा पार्टी जर्जर होती चली गई।



