आखिर समझौते पर पहुंच ही गए अमरीका और ईरान

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में एक प्रचलित प्राचीन कहावत है कि जाट मरा तब जानो जब तेहरवीं हो जाये। इसी प्रकार अमरीका व ईरान के बीच जो शांति के एमओयू पर सहमति बनी है, वार्ता के लिए 60 दिन की खिड़की खोली है और जिस पर 19 जून 2026 को स्विट्ज़रलैंड में हस्ताक्षर होने तय हुए हैं, इसे तब तक एक ‘ठोस समझौते’ के रूप में देखना बड़ी भूल होगी, जब तक कि शब्दश: व भावना के मुताबिक यह डील लागू न हो जाए। यह निष्कर्ष अकारण नहीं। इससे पहले दोनों अमरीका व ईरान दो बार ऐसी ही सहमति बनाने के कगार पर पहुंच चुके थे, हस्ताक्षर भी होने को तैयार थे, लेकिन अमरीका व इज़रायल ने पहले 12 जुलाई 2025 को और फिर 28 फरवरी 2026 को हमले कर दिये। 
युद्ध फिर शुरू नहीं होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है विशेषकर इसलिए कि इज़रायल ने कहा है कि उसकी सेना लेबनान, सीरिया व गाज़ा के कब्ज़े किये हुए क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बनाये रखेगी और यही मध्य पूर्व में विवाद व जंग की असल जड़ है। बहरहाल अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की इस घोषणा को कि वाशिंगटन व तेहरान ने ‘महान समझौता’ पूर्ण कर लिया है, उस क्षेत्र में शांति लाने के लिए जो तीन माह से अधिक युद्ध में फंसा हुआ था, भले ही सार्वभौमिक प्रशंसा न मिली हो, लेकिन फिलहाल के लिए वैश्विक राहत अवश्य मिली है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने समझौते का स्वागत करते हुए पुन: शांति बहाली की उम्मीद व्यक्त की है। इस बीच 15 जून 2026 को भारत आने वाले एलएनजी कैरियर दिशा ने सुरक्षित स्ट्रेट ऑ़फ होर्मुज पार किया, जिससे यह आशा मज़बूत हुई है कि जो अन्य 34 भारतीय व विदेशी झंडों वाले जहाज फारस की खाड़ी में फंसे हुए हैं, वह भी जल्द व सुरक्षित भारतीय बंदरगाहों पर आ जायेंगे। लेकिन चिंता का विषय यह है कि समझौते की घोषणा के बाद भी भारतीय क्रू वाली चौथी शिप (एमटी बोकएम जिस पर हांगकांग का झंडा था) को टारगेट किया गया, हालांकि किसी नाविक को कोई नुकसान नहीं पहुंचा। 
समझौते की घोषणा के बाद ब्रेंट आयल के दाम गिरकर 83 डॉलर प्रति बैरल हो गये, जोकि पिछले तीन माह के दौरान सबसे कम हैं, लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि इस युद्ध से अमरीका को हासिल क्या हुआ? जवाब से पहले समझौते की बुनियादी शर्तों को संक्षेप में जान लेते हैं, जिनकी विस्तृत जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई हैं और जिन पर दोनों पक्षों ने अभी सिर्फ डिजिटल हस्ताक्षर किये हैं। कहने का अर्थ यह है कि अमरीका व ईरान ने युद्ध को समाप्त करने के लिए समझौते के फ्रेमवर्क पर अभी तक सहमति व्यक्त की है, लेकिन मेमोरेंडम की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है। मध्यस्थता कर रहे पाकिस्तान का कहना है कि दोनों पक्ष तुरंत प्रभाव से सभी सैन्य ऑपरेशनों को बंद करने पर सहमत हो गये हैं और मेमोरेंडम पर 19 जून 2026 को स्विट्ज़रलैंड में हस्ताक्षर किये जायेंगे। मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर होते ही स्ट्रेट ऑ़फ होर्मुज को खोल दिया जायेगा और अमरीका भी ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी को हटा लेगा। 
स्ट्रेट ऑ़फ होर्मुज में समुद्री ट्रैफिक को ईरान व ओमान विनियमित करेंगे। अमरीका का कहना है कि वह होर्मुज में ‘टोल-फ्री’ समुद्री ट्रैफिक के लिए प्रयास करेगा, जबकि ईरान का कहना है कि वह ‘समुद्री सेवा फीस’ चार्ज करेगा, जिसे टोल नहीं कहना चाहिए। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर तकनीकी वार्ता के लिए 60-दिन की खिड़की खोली गई है। तेहरान इस बात पर सहमत हो गया है कि वह न तो परमाणु हथियारों का उत्पादन करेगा और न ही उन्हें हासिल करेगा। पूर्ण समझौता होने तक ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों को फ्रीज़ कर देगा। अमरीका ईरान के फ्रोज़ेन एसेट्स (25 बिलियन डॉलर) को रिलीज़ करेगा और ईरान पर कोई नई पाबंदी नहीं लगायेगा (यूरोपीय देशों ने भी ईरान से अपनी पाबंदी हटाने की घोषणा की है)। एक निश्चित अवधि के लिए अमरीका ईरान पर से तेल पाबंदी को हटायेगा। वाशिंगटन ईरान के लिए एक पुनर्निर्माण योजना तैयार करेगा, जिस पर 60-दिन के भीतर समझौता होगा। जहां तक लेबनान की समस्या है तो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने कहा है कि सभी सैन्य ऑपरेशन बंद करने में लेबनान भी शामिल है, जिससे इज़रायल सहमत नहीं है, जबकि ईरान का कहना है कि मेमोरेंडम को लागू करने की ज़िम्मेदारी अमरीका की है। समझौते की जितनी बातें सार्वजनिक की गई हैं, उनमें सिर्फ तीन बातें ही महत्वपूर्ण हैं। एक, होर्मुज को खोला जायेगा। दो, ईरान न परमाणु हथियारों का उत्पादन करेगा और न उन्हें किसी अन्य देश से हासिल करेगा। तीन, ईरान पर कोई नई पाबंदी नहीं लगायी जायेगी, पुरानी पाबंदियां हटायी जायेंगी और उसके 25 बिलियन डॉलर के फ्रोज़ेन एसेट्स रिलीज़ किये जायेंगे। 
इसलिए यह सवाल है कि इस बेमतलब के युद्ध से हासिल क्या हुआ? होर्मुज तो 28 फरवरी 2026 से पहले सबके लिए खुला ही हुआ था और वह भी बिना किसी निगरानी व फीस के। अब उसका संचालन ईरान व ओमान करेंगे और वह ‘सर्विस फीस’ भी लेंगे। इससे अमरीका को तो कुछ हासिल नहीं हुआ, ईरान व ओमान दरोगा ज़रूर बन गये और अन्य देशों का व्यापार खर्च बढ़ गया। जहां तक ईरान द्वारा परमाणु हथियार बनाने की बात है तो वह अपने दिवंगत नेता आयतुल्ला अली खामेनेई (जिनका 9 जुलाई 2026 को अंतिम संस्कार किया जायेगा) के फतवे को मद्देनज़र रखते हुए पहले से ही कहता आ रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम अपनी ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए शांतिपूर्ण है, वह परमाणु बम नहीं बनायेगा। 
अरब देशों में जो अमरीकी बेसों को ज़बरदस्त नुकसान पहुंचा है, उससे अरब में भी वाशिंगटन का प्रभाव कम हुआ है और सऊदी अरब, ओमान, कतर आदि अब अपनी सुरक्षा के लिए तुर्की, पाकिस्तान व ईरान की तरफ झुकते जा रहे हैं। बहरहाल, पश्चिम एशिया में दशकों से जो विस्फोटक स्थिति बनी हुई है, उसको मद्देनज़र रखते हुए कहा जा सकता है कि समझौते पर हस्ताक्षर के बाद भी खतरा कम नहीं हुआ है, इसलिए अभी से अपने तेल के बैरल गिनना शुरू मत कीजिये।      
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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