घटती स्वास्थ्य सुविधाएं बन रही हैं मृत्यु का कारण

राजस्थान में दवाओं के कारण एक दर्जन के करीब प्रसूताओं की किडनियां फेल हो जाने से तहलका मच गया है। यहां गत दो माह में कम से कम आधा दर्जन से अधिक प्रसूताओं की मौत हो चुकी है तथा कई की किडनियां इतनी खराब हो चुकी हैं कि वे ‘लाइफ सपोर्ट’ पर ज़िंदा हैं। इनके नवजात मासूम बच्चे अब दादी-नानी के भरोसे पल रहे हैं। गत माह कोटा के एक मैडीकल कॉलेज में सिजेरियन के बाद अचानक तबीयत बिगड़ी और एक-एक कर पांच महिलाओं की मौत हो गई। अब जून माह में बीकानेर के एक अस्पताल में यही कहानी दोहराई गई और सिजेरियन प्रसव के बाद यहां पर आधा दर्जन प्रसूताओं की तबीयत खराब होने पर उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया। उनकी भी किडनियां खराब होना बताया जा रहा है। प्राथमिक तौर पर कहा जा रहा है कि जिन इंजेक्शनों में दवा होनी चाहिए थी, उनमें पानी था। ये वह मामले हैं, जो सामने आ गए हैं और न जाने ऐसे कितने मामले हैं जो दूसरे बहाने बनाकर बंद कर दिए जाते हैं। 
जिस तेजी से वैज्ञानिक और चिकित्सा संस्थान बीमारियों से बचाव के लिए नित नए रास्ते तलाश रहे हैं, ठीक उसी तरह से अस्पतालों में हो रही मरीजों की मौत के लिए जिम्मेदार खुद के बचाव के रास्ते तलाश रहे हैं। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि खुद मुख्यमंत्री तथा चिकित्सा मंत्री परेशान हैं। मरीजों को बेहतर उपचार मिले, इसके लिए भारी भरकम स्टाफ होने के बाद भी मुख्यमंत्री को खुद कार्रवाई करनी पड़ रही है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे प्रदेशों में दवाओं की स्थिति से कहीं गंभीर हालत एंबुलेंस की भी है। घटिया दवाओं के सप्लायरों ने इतना बड़ा मकड़जाल फैला रखा है कि मरीजों की मौत के बाद उन पर कोई कार्रवाई तब तक नहीं होती, जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि मरीज की मौत अमुक दवा से हुई है और यह सिद्ध होने में वर्षों गुजर जाते हैं। 
ऑपरेशन थियेटर में डॉक्टरों के लिए मरीज इंतजार करते हैं। इमरजेंसी में पट्टियां तक मरीजों से मंगाई जाती हैं। जिन ऑपरेशन थियेटरों में उपचार होता है, वह अधूरी तैयारी से चल रहे हैं। मामले को कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है, इसका एक उदाहरण देखिए। राज्य के चिकित्सा मंत्री गजेन्द्र सिंह खीमसर कहते हैं कि डिलिवरी के बाद महिलाओं को जो इंजेक्शन लगाया जाता है, उसमें दवा थी ही नहीं। इसके विपरीत ड्रग कंट्रोलर कमिश्नर टी सुमंगला कही हैं कि इंजेक्शन के बाद जो दवाएं उन्हें दी जानी चाहिए थीं, वे नहीं दी गईं। दोनों बातें सामान्य तौर पर भी सही मानी जाएं तो इसके लिए पूरा विभाग और जिम्मेदार चिकित्सक पूरी तरह से दोषी हैं। 
संभवत: यही कारण है कि जब मुख्यमंत्री खुद अस्पताल में जाते हैं, तो उन्हें मरीजों की लाइनें देखकर अचम्भा नहीं होता। वह समझ जाते हैं कि मामला कहां गड़बड़ है। डॉक्टरों को कारण बताओ नोटिस दिलवाने के लिए जब मुख्यमंत्री को आदेश देना पड़े तो समझ में आ जाता है कि किस तरह से उपचार के नाम पर मरीजों का शोषण हो रहा है। इस समय भारत के अधिकांश मैडीकल कॉलेज या बड़े सरकारी अस्पतालों की इमारतें कम से कम 100 साल पुरानी हैं।
अस्पतालों की खराब स्थिति का आलम यह है कि कब कहां की छत का प्लास्टर गिर जाएगा, पता ही नहीं होता। कितनी बार तो ऑपरेशन के दौरान ही फॉल सीलिंग या छत से सीमेंट गिर गया है। कई मामले सीलिंग फैन के गिरने से मरीज के गम्भीर घायल होने तक के मामले सामने आ चुके हैं। सवाई माधोपुर में सरकारी अस्पताल में छत का एक हिस्सा गिरने से महिला और दो बच्चियां घायल हो गईं, लखनऊ में वीआईपी अस्पताल का दर्जा पाए सिविल अस्पताल में फॉल सीलिंग गिरने से खुद मुख्यमंत्री नाराज़ हुए थे। चूहे तो वार्डों में ऐसे घूमते हैं जैसे वह भी मरीज हों और यहां पर उपचार के लिए आए हुए हों? मासूम बच्चों को काट लेना आम घटनाएं हैं, जिन्हें अस्पताल प्रशासन यह कहकट टाल देता है कि जहां पर खाने-पीने की वस्तुएं होंगी, वहां पर यह आम बात है। जोधपुर के मैडीकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग में मरीजों को चूहों ने काट लिया, तो उसके लिए एक कमेटी बना दी गई।
सीनियर सिटिजन्स को उपचार के लिए अलग से लाइन की सुविधा, फिजियोथैरेपी के लिए प्राथमिकता मिलना दूर की बात है। छोटे बच्चों की बात करना बेमानी है; क्योंकि अभी अधिक दिन नहीं हुए हैं जब उनको पिलाये जाने वाले सीरप ने मृत्यु की घंटी बजा दी थी। दवा और अस्पतालों के साथ ही एम्बूलैंसों की दशा भी उतनी ही खराब है, जितनी की अस्पतालों में दी जाने वाली दवाओं की। कभी इनमें ऑक्सीजन नहीं रहती तो कभी इनका सिलेंडर ही नहीं खुलता। विश्वास कीजिए मुरादाबाद में कुछ समय पहले सिलेंडर को खोलने के लिए हथौड़े का प्रयोग करना पड़ा था। समझिए कि जब ऑक्सीजन सिलेंडर की स्थिति यह है तो शेष एंबुलेंस की हालत क्या होगी? मनमाना किराया लेना, समय पर नहीं पहुंचना सामान्य मामले हैं। जब हालात ऐसे हैं, तो तय है कि अस्पताल जो मदद के लिए बनाए गए हैं, वे मौत का परवाना तो बनेंगे ही।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

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