डुबोया जा रहा है एल.आई.सी. का पैसा !

भारतीय जीवन बीमा निगम (एल.आई.सी.) देश की बड़ी सरकारी कंपनियों में से एक है। इसके पास देश के करोड़ों लोगों का पैसा है। लोग बड़ी मुश्किल से बीमा कराते हैं, फिर भी एल.आई.सी. को संदिग्ध कंपनियों में पैसा लगाने के लिए बाध्य किया जा रहा है। पहले दबे स्वर में समाचार आते थे कि सरकार एल.आई.सी. जैसे सार्वजनिक उपक्रमों के पैसे से शेयर बाज़ार को नियंत्रित करती है, लेकिन एक के बाद एक ऐसी खबरें अब सामने आ रही हैं। एलआईसी ने राजेश एक्सपोर्ट के 10.8 फीसदी शेयर खरीदे हैं। पिछले 10 साल में इस कंपनी में एल.आई.सी. का निवेश पांच गुना बढ़ा है। दूसरी ओर इस 10 साल की अवधि में म्युचुअल फंड कंपनियों ने राजेश एक्सपोर्ट में अपना निवेश लगभग ज़ीरो कर दिया है। यानी जो कंपनियां पेशेवर लोगों की सलाह से काम करती हैं, उन्होंने राजेश एक्सपोर्ट में पैसा नहीं लगाया, लेकिन एल.आई.सी. का निवेश पांच गुना हो गया। अब घोटाला सामने आया है कि गुजरात निवासी राजेश मेहता की इस कंपनी ने 15 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की गड़बड़ी की थी। जिस दिन यह खबर आई, उस दिन राजेश एक्सपोर्ट का शेयर 5 फीसदी और एल.आई.सी. का शेयर एक फीसदी गिर गया। उल्लेखनीय है कि पहले एल.आई.सी. ने लगातार अडानी की कंपनी मे अपना निवेश बढ़ाया था। हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट आने के बाद अडानी के शेयरों में तेज़ी से गिरावट आईर् जिससे लाखों एल.आई.सी. पालिसीधारकों तथा निवेशकों को वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा था।
बहुत बुरे समय का संकेत
पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के बाद वह सब हो रहा है जो लोकतंत्र में कतई नहीं होता है। पिछले हफ्ते 9 जून को ममता बनर्जी तथा उनका भतीजा और तृणमूल कांग्रेस के महासचिव अभिषेक बनर्जी दिल्ली में थे। पश्चिम बंगाल पुलिस व प्रशासन को यह बात मालूम थी। फिर भी उस दिन सीआईडी की टीम ममता बनर्जी के पैतृक आवास पर पहुंच गई। जब ममता के परिवार तथा पार्टी कार्यकर्ताओं ने उन्हें रोका तो जब भारी संख्या में पुलिस बुला ली गई। अब सवाल है कि ममता के आवास और उससे सटे पार्टी के केंद्रीय कार्यालय में सीआईडी की टीम क्या खोजने गई थी? बताया गया कि मामला विधायकों के जाली दस्तखत का है। ऋ तब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने आरोप लगाया है कि शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता विपक्ष चुने जाने के जिस प्रस्ताव की कॉपी स्पीकर को दी गई है, उस पर उनके जाली दस्तखत हैं। अगर ऐसा है तो सीआईडी को दोनों के असली दस्तखत लेकर हस्त-लिखित विशेषज्ञों से इसकी तस्दीक करवा कर आगे की कार्रवाई करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा करने के बजाय पुलिस ममता के घर और केंद्रीय कार्यालय पर छापा मारने चली गई। वहां पुलिस को क्या मिलेगा? क्या वहां जाली दस्तखतों का कोई रिकार्ड रखा गया होगा? नि:संदेह  पुलिस वहां कुछ और गी खोजने गई होगी। विपक्षी नेताओं के घरों में इस तरह की तलाशियां लोकतंत्र के लिए बहुत बुरे समय का संकेत है।
नितीश के ‘लेख’ की सच्चाई
राजनीतिक नेताओं के नाम से लेख प्रकाशित करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इन दिनों यह रूझान थोड़ा ज्यादा ही बढ़ गया है। अक्सर राजनीतिज्ञों के नाम से लिखे जाते लेख उनकी पार्टी की नीतियों के प्रचार के लिए या फिर अपने वरिष्ठ नेताओं को खुश करने के लिए होते हैं। कुछ नेता ही अपने लेख खुद लिखते हैं। प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी के 12 वर्ष पूरे होने पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के नाम से अखबारों में एक लेख प्रकाशित हुआ है। लेकिन अंग्रेज़ी के अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नितीश कुमार के नाम से लेख छपा, जिसमें नरेंद्र मोदी के शासन और राजनीति नेतृत्व की प्रशंसा की गई थी। हकीकत यह है कि नितीश कुमार की मानसिक अवस्था ऐसी जानकारी साझा करने के योग्य नहीं है। उनके करीबियों के अनुसार नितीश को यदि कोई दो दिन के बाद मिलने आता है तो उसका चेहरा या नाम याद नहीं आता। यह स्च्चाई ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के पटना के ब्यूरो चीफ से लेकर नई दिल्ली में प्रधान सम्पादक तक सभी को मालूम है। फिर भी नितीश कुमार का लेख छपा है। नितीश के किसी करीबी नेता ने उक्त लेख पढ़ने के बाद क्या सोचा होगा, तो ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की क्या विश्वसनीयता रही होगी। 
बिहार के मंत्री का अनोखा रिकॉर्ड
बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश के नाम एक अनोखा रिकॉर्ड दर्ज हो गया है। वह दो बार मंत्री तो बने, परन्तु किसी सदन के सदस्य नहीं बन सके। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद नवम्बर 2025 में एनडीए की सरकार बनी तो राष्ट्रीय लोक मोर्चा के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे को मंत्री बनवा कर सभी को हैरान कर दिया, क्योंकि वह किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे। तब आश्वासन दिया गया था कि मंगल पांडेय विधान परिषद की सीट दीपक प्रकाश के लिए  खाली कर देंगे, परन्तु भाजपा ने अपने कोटे की यह सीट राष्ट्रीय लोक मोर्चा को नहीं दी। नितीश कुमार ने 14 अप्रैल को इस्तीफा दिया। उसके बाद पूरे मंत्रिमंडल ने इस्तीफा दे दिया। 7 मई को जब सम्राट चौधरी के मंत्रिमंडल का गठन हुआ तो फिर दीपक प्रकाश को पुन: मंत्री बना दिया गया। इस बार कहा गया कि विधानसभा सदस्यों द्वारा 9 विधान पार्षद चुने जाने हैं उनमें से एक सीट दीपक प्रकाश को मिलेगी, लेकिन उन 9 उम्मीदवारों में भी उनको जगह नहीं मिली। हालांकि दीपक 7 नवम्बर तक मंत्री रह सकते है, यदि उस समय तक कोई सीट खाली नहीं हुई तो उनको इस्तीफा देना पड़ेगा। दीपक प्रकाश के अनोखे रिकॉर्ड का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच गया है।
हिटलर से प्रेरणा लेते हैं रेवंत रेड्डी! 
राहुल गांधी केंद्र की भाजपा सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगातार तानाशाही और फासीवाद के आरोप लगाते रहते हैं, लेकिन उनके अपने चहेते मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा है कि वह हिटलर से प्रेरणा लेते हैं। हैरानी की बात है कि कोई भी व्यक्ति हिटलर से कैसे प्रेरणा ले सकता है? इतिहास में इंसानियत के सबसे बड़े दुश्मनों में हिटलर का नाम आता है। उसने अपने पूरे शासन में कुछ भी प्रेरणादायक कार्य नहीं किया। इसीलिए जर्मनी में हिटलर का नाम लेना भी गुनाह माना जाता है, लेकिन लोकतांत्रिक भारत में एक मुख्यमंत्री को हिटलर से प्रेरणा मिलती है! रेवंत रेड्डी ने हैदराबाद के जल प्रोजेक्ट का नाम ‘हाईड्रा’ रखा है। उल्लेखनीय है कि हिटलर ने हाईड्रा प्रोजेक्ट मासूम लोगों के मनमाने ढंग से मारने के लिए तैयार किया था। गौरतलब है कि रेवंत रेड्डी आरएसएस के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े रहे हैं। हालांकि आरएसएस भी सार्वजनिक रूप से कभी भी हिटलर या मुसोलिनी की विचारधारा से कोई प्रेरणा लेने का ज़िक्र नहीं करता है। परन्तु हिन्दू महासभा के नेता बी.एस. मुंजे ने इटली में मुसोलिनी के संगठन का अध्ययन करके आरएसएस के संस्थापक तथा अपने गुरु हेडगेवार को इसके बारे में बताया था।

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