अमरीका द्वारा भारतीय जहाज़ों पर हमले क्यों ?
उत्तर प्रदेश में ज़िला देवरिया के गांव सुरौली के 31 वर्षीय शिवानंद चौरसिया (इंजन फि टर) उन तीन भारतीय नाविकों में शामिल था, जिनकी मौत इस वजह से हुई थी, क्योंकि अमरीकी सेना ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के निकट ओमान तट पर खड़े पलाऊ-झंडे वाले आयल टैंकर एमटी सेटिबेलो पर मिसाइल स्ट्राइक की थी। उस समय टैंकर में 24 भारतीय क्रू सदस्य थे, जिनमें से 21 को बचा लिया गया था। अन्य दो मृतकों की पहचान आदित्य शर्मा (डेक कैडेट) व पतनाला सुरेश (चीफ इंजीनियर) के रूप में की गई है। पश्चिम एशिया में 28 फरवरी, 2026 को युद्ध शुरू होने के बाद से, इन तीन नाविकों सहित भारतीय मृतकों की संख्या 7 हो गई है।
गौरतलब है कि पिछले चार दिन के दौरान अमरीकी सेना ने तीन मर्चेंट शिप्स पर हमला किया है, जिनमें भारतीय क्रू सदस्य सवार थे। दो पलाऊ-झंडे वाले आयल टैंकरों मारीवेज़ व सेटिबेलो पर अमरीकी हमला 8 व 10 जून, 2026 को हुआ था, जबकि गिनी-बिसाऊ-झंडे वाले बिटुमेन टैंकर एमटी जयवीर, जिसमें 20 भारतीय सवार थे, पर हमला 11 जून 2026 को हुआ था। भारत ने पहली बार स्वीकार किया है कि अमरीकी नौसेना जहाज़ों पर हमले कर रही है। जहाज़ों पर निरन्तर हमले निश्चितरूप से चिंताजनक हैं और इसी को मद्देनज़र रखते हुए नई दिल्ली ने अब अमरीका से ज़बरदस्त विरोध दर्ज करते हुए इस बात पर बल दिया है कि यह हमले रुकने चाहिएं। दरअसल, अमरीका या ईरान में से किसी को भी होर्मुज़ में फंसे हमारे लोगों की कोई चिंता नहीं है, इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि भारत न सिर्फ इनके लिए अधिक बोले, बल्कि हो सके तो इनकी सुरक्षा की स्वयं व्यवस्था करे और इन्हें सुरक्षित वापस घर भी लाये।
अमरीका व ईरान में एक बार फिर से बमबारी आरंभ होने से होर्मुज़ में फंसे व्यापारिक जहाज़ों पर हमले का खतरा बढ़ गया है। सेटिबेलो, जिसमें तीन भारतीय नाविक मारे गये, पर अमरीकी नौसेना द्वारा हमले का कारण यह बताया गया है कि वह ईरानी बंदरगाहों की अमरीकी नाकाबंदी को पार करने का प्रयास कर रहा था। यह समुंद्र में कार्य करने वालों के लिए नई, गंभीर व भयावह वास्तविकता है। नई दिल्ली ने एकदम सही किया कि ज़बरदस्त कूटनीतिक विरोध दर्ज किया और व्यापारिक जहाज़ों पर तुरंत हमले रोकने की मांग की। विरोध दर्ज करने के अगले दिन यानी 11 जून, 2026 को जयवीर पर हमला किया गया, जिसमें 20 भारतीय नाविक सवार थे। इससे मालूम होता है कि खतरा निरंतर बढ़ता जा रहा है। किस्मत अच्छी थी कि जयवीर के सभी क्रू सदस्य बच गये।
जब से अमरीका व इज़राइल ने ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू किया है, तब से लगभग 20,000 नाविक, जिनमें भारतीयों की भी बड़ी संख्या है, इस वैश्विक व्यापार के महत्वपूर्ण गलियारे में फंसे हुए हैं। कुछ तो विशाल जहाज़ों पर अटके हुए हैं, जहां भोजन व पानी की तो अत्यधिक कमी है ही, हौसले भी तेज़ी से पस्त होते जा रहे हैं। कब किधर से कोई मिसाइल आ जाये, कोई नहीं जानता। ईरान की नाकाबंदी और अमरीका की जवाबी नाकाबंदी की वजह से इस क्षेत्र में तकरीबन 1,600 मालवाहक जहाज़ों के फंसने से स्थिति बेहद जटिल हो गई है। अगर जहाज़ों को निकालने के लिए ईरान से सहयोग लिया जाता है तो अमरीकी हमले का खतरा रहता है। अगर अमरीका से अनुमति मिल जाती है तो यह आईआरजीसी के हमले का खतरा बढ़ जाता है। सबसे अधिक बोझ क्रू पर पड़ रहा है। बहुत से नाविक अपने कॉन्ट्रैक्ट के अंतिम चरण में हैं और कर्मचारियों की शिफ्ट या ड्यूटी का समय भी निकल चुका है। इसके बावजूद मुआवज़ा कहीं दिखायी नहीं दे रहा है। यह समाचार भी चिंताजनक हैं कि कुछ मालिक नाविकों पर जहाज़ में रहने का दबाव बना रहे हैं, उनका वेतन रोक कर या साइन-ऑफ (काम पूरा होने पर दी जाने वाली अंतिम मंजूरी) में विलम्ब करके। मुआवज़ा एहसान नहीं है।
इस पेचिदा समस्या का एकमात्र समाधान यह है कि वैश्विक समुदाय मिलकर होर्मुज़ से जहाज़ों व क्रू को बाहर निकाले। लेकिन मुश्किल यह है कि जब तक वाशिंगटन व तेहरान पानी के रास्ते को युद्ध के हथियार के रूप में प्रयोग करते रहेंगे। इसलिए हल यह है कि दुनिया अमरीका, इज़राइल व ईरान पर दबाव बनाये कि वह युद्ध पर विराम लगायें, वैश्विक व्यापार को 28 फरवरी से पहले जैसा होने दें और खुद भी चैन से रहें व दूसरों को भी चैन की सांस लेने दें। यह इसलिए भी ज़रूरी है, क्योंकि इस युद्ध के कुप्रभाव खाड़ी तक सीमित नहीं हैं, पूरी दुनिया आर्थिक परेशानियों व महंगाई से जूझ रही है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



