अस्तित्व खो रहे क्षेत्रीय दलों में तृणमूल कांग्रेस भी !
तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1 जनवरी, 1998 को तत्कालीन केन्द्रीय रेल मंत्री ममता बनर्जी ने की थी। उन्होंने पश्चिम बंगाल की कांग्रेस शाखा से विद्रोह कर इस दल की स्थापना की थी। 2009 के लोकसभा चुनावों में बंगाल से 19 सीटें जीतकर यह देश की छठी सबसे बड़ी पार्टी बनी जबकि 2019 में 22 सीटें जीतकर देश की चौथी सबसे बड़ी पार्टी बन गयी थी। 2024 में भी तृणमूल कांग्रेस ने 29 सीटें जीतीं, परन्तु मात्र 28 वर्षों की राजनीतिक यात्रा तय कर पिछले दिनों विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस ताश के पत्तों की तरह ढहती दिखाई दी है। इसके लगभग 20 लोकसभा सांसदों, 3 राज्यसभा सांसदों व 58 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी है। यह तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास में सबसे गंभीर राजनीतिक संकट है। अब समाचार यहां तक आ रहे हैं कि जिस कांग्रेस से विद्रोह करते हुये ममता बनर्जी ने अपना अलग राजनीतिक दल बनाया था, संभवत: वही ममता अब पुन: अपने बचे-खुचे दल व साथियों सहित कांग्रेस की शरण में जाने का सम्मानजनक रास्ता तलाश कर रही हैं। तृणमूल कांग्रेस के अवसान का प्रमुख कारण ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के प्रति पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं की नाराज़गी बताया जा रहा है। तो क्या अब तृणमूल कांग्रेस भी परिवारवाद की भेंट चढ़े देश के अनेक क्षेत्रीय दलों की सूची में शामिल हो गया है?
तृणमूल कांग्रेस की ही तरह भारतीय राजनीति में अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक दल परिवारवाद (वंशवाद) या विरासत की दावेदारी के चलते समाप्त हो गये, टूट गये या उनमें मतभेद सामने आये। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र की शिवसेना में उद्धव ठाकरे व राज ठाकरे के बीच में 2005-2006 गहरी राजनीतिक दरार पड़ी। जिसका मुख्य कारण शिवसेना के भीतर सत्ता संघर्ष और उत्तराधिकारी की लड़ाई था। उद्धव, बाल ठाकरे के बेटे हैं जबकि राज ठाकरे बाल ठाकरे के भाई के बेटे यानी सगे भतीजे। चूंकि राज बाल ठाकरे के सबसे करीबी सहयोगी थे, इसलिये उन्हीं को बाल ठाकरे के राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाता था, लेकिन अंतिम दिनों में बाल ठाकरे ने अपने बेटे उद्धव को आगे बढ़ाया और राज ठाकरे को उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया जाना नहीं भाया और शिवसेना में पहला बड़ा विघटन हो गया। फिर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना (मनसे) के नाम से राज ठाकरे का नया दल अस्तित्व में आया जिसने शिवसेना को भारी नुकसान पहुंचाया। इसी तरह इंडियन नेशनल लोक दल जिसके संस्थापक चौधरी देवी लाल थे, की विरासत उनके पुत्र ओम प्रकाश चौटाला ने संभाली आगे चल कर उनके दोनों पुत्रों अजय चौटाला व अभय सिंह चौटाला के बीच विरासत संभालने को लेकर हुये मतभेद में पार्टी दो हिस्सों बंट कर कमज़ोर गयी। इसी तरह उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव द्वारा गठित समाजवादी पार्टी (सपा) में पहले तो 2016-17 के बीच मुलायम सिंह यादव (पिता) और अखिलेश यादव (पुत्र) के बीच मुख्यमंत्री के पद व टिकट वितरण को लेकर गहरे मतभेद उभरे। बाद में अखिलेश के चचेरे भाई शिवपाल यादव ने राष्ट्रीय समाजवादी पार्टी नामक एक नई पार्टी बना ली। एक समय तो सपा में तीन गुट बन गए थे। गोया, सपा को भी परिवारवाद की आंच झेलनी पड़ी। उधर पंजाब में प्रकाश सिंह बादल के पुत्र सुखबीर बादल के शिरोमणि अकाली दल का अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी में अवसान शुरू हो गया। इसी तरह आरजे डी संस्थापक लालू यादव अपने पुत्र तेजस्वी यादव के मोह में कई वरिष्ठ सहयोगी खो बैठे। तेजस्वी यादव के भाई तेज प्रताप यादव के बीच तथा और आगे चल कर सभी बहनों के बीच विरासत का घमासान देखने को मिला। निश्चित रूप से इन सब से पार्टी कमज़ोर हुई और लोगों में इस पारिवारिक मतभेदों का गलत सन्देश गया।
इसी तरह एन.टी. रामाराव द्वारा स्थापित तेलगू देशम पार्टी पर कभी उनकी दूसरी पत्नी लक्ष्मी पर्वती ने अपना अधिकार जमाना चाहा तो कभी दामाद चंद्रबाबू नायडू ने दल पर अधिकार जमाने की सफल कवायद की। महाराष्ट्र में ही शरद पवार के परिवार में उनकी बेटी व भतीजे के बीच पार्टी विरासत को लेकर चले घमासान और पार्टी विघटन के कारण सभी वाकिफ हैं। मायावती भी पार्टी को वन मैन शो की तरह चला रही हैं और परिवारवाद की भावनाओं का शिकार होकर अपने भाई आनंद कुमार के बेटे यानी अपने भतीजे आकाश आनंद को आगे कर रही हैं। उत्तराधिकार के विवाद की चपेट में आरएलडी, डीएमके व एआईडीएमके भी आ चुकी है। गोया, देश के अधिकांश राजनीतिक दल परिवारवाद या विरासत के कारण उठे मतभेदों के कारण अवसान की ओर जा चुके हैं। यह सब जानने के बावजूद दूसरे दलों पर परिवारवाद का ठप्पा लगाने वाले नेता भी परिवारवाद से मुक्त नहीं पाते। जैसे अभी नितीश कुमार को ही देख लीजिये। बिहार की सत्ता छोड़ते समय अपने ऐसे बेटे को स्वास्थ मंत्री बनवा गये। इसी तरह भाजपा के दर्जनों नेता जिन्होंने जीवन कांग्रेस पार्टी पर परिवारवादी होने का आरोप लगाया, वे अपने बेटों-पोतों या भाई-भतीजों को अपनी राजनीतिक विरासत सौंप चुके हैं। परिवारवाद के कारण या विरासत की जंग में अनेक क्षेत्रीय दलों का पतन होता जा रहा है। अस्तित्व खो रहे क्षेत्रीय दलों में अब तृणमूल कांग्रेस का नाम भी शामिल हो गया है।
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