परदेसी हुए बुज़ुर्गों की रौणक से सजते कनाडा के पार्क
‘मुड़-मुड़ याद सताऊंदी पिंड दीआं गलियां दी।’ पंजाबी गायक गुरदास मान के गीत की यह पंक्ति कनाडा के अधिकांश बुजुर्गों की मनोदशा और दैनिक जीवन पर चरितार्थ होती दिखाई देती है, जो अपनी खुशी या किसी मजबूरी के कारण अपनी पितृभूमि से दूर आकर यहां बस गए हैं।
कनाडा के अन्य शहरों की तरह वैन्कूवर और मिनी पंजाब के नाम से जाने जाने वाले सरी शहर के दर्जनों हरे-भरे पार्कों में फैली गुनगुनी धूप के बीच समय की परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढाल चुके हज़ारों पंजाबी बुजुर्गों की प्रतिदिन सजने वाली महफिलें किसी न किसी रूप में पंजाब के गांवों की पुरानी चौपालों की झलक प्रस्तुत करती दिखाई देती हैं।
सुबह होते ही पंजाबी बुजुर्गों के समूह पार्कों में एकत्र होने लगते हैं, जहां दिन भर चलने वाली बातचीत, हंसी-मज़ाक, शतरंज और ताश के खेल का दौर पंजाब की पारम्परिक विरासत की तस्वीर पेश करता है। इन चौपालों में चलने वाली ‘खुंड चर्चा’ का मुख्य केंद्र स्थानीय विषयों के साथ-साथ पंजाब की मौजूदा राजनीति भी होता है। कई बार इन चर्चाओं से उपजी तीखी बहस आसपास के माहौल को और अधिक रोचक बना देती है। इनमें से अधिकांश बुजुर्ग 1970, 1980 और 1990 के दशक के दौरान अपनी आर्थिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए पंजाब से कनाडा आए थे और फिर यहीं के होकर रह गए। शुरुआती वर्षों में उन्होंने लकड़ी मिलों, कारखानों, निर्माण कार्यों और पहाड़ी क्षेत्रों में पौधारोपण जैसे कठिन काम करके अपना तथा अपने परिवार का भविष्य संवारा और आज वही पीढ़ी पेंशन तथा सेवानिवृत्ति पाकर अपेक्षाकृत सुखद जीवन व्यतीत कर रही है।
वर्ष 2021 की जनगणना के समय वैन्कूवर, डेल्टा, सरी और रिचमंड क्षेत्रों में 65 वर्ष से अधिक आयु के पंजाबी बुजुर्गों की संख्या लगभग 30 हज़ार आंकी गई थी, जबकि अब यह संख्या इससे कहीं अधिक होने का अनुमान लगाया जा रहा है।
कई बुज़ुर्ग सुबह गुरुद्वारों में माथा टेकने और सेवा करने के बाद सीधे पार्कों में बैठी अपनी मंडलियों में पहुंच जाते हैं। कई लोगों ने आपसी सहमति से अपनी पसंदीदा बैंचों और बैठने की जगह को मानो आरक्षित कर रखा है। माझा, मालवा और दोआबा क्षेत्रों के मेलों की झलक प्रस्तुत करतीं इन चौपालों में कई बुज़ुर्ग अपने मोबाइल फोन पर पंजाब की ताज़ा खबरें पढ़ कर दूसरों को सुनाते हैं। शाम को घर लौटते समय कुछ बुजुर्गों को गले की तरावट के लिए किसी करीबी साथी के घर के एकांत कोने में ‘दो-घूंट’ लगाते भी देखा जा सकता है।
सरी से संबंधित युवा कंज़र्वेटिव नेता होनवीर रंधावा का कहना है कि पार्कों में बुज़ुर्गों की रौनक और दिनभर बनी रहने वाली चहल-पहल के कारण पंजाब के गांवों जैसा माहौल महसूस होता है। हालांकि कुछ सार्वजनिक स्थानों और बस स्टैंडों के निकट बुज़ुर्गों के लिए शौचालयों की कमी एक समस्या है, जिसके समाधान के लिए वे अपने साथियों के साथ मिल कर आवाज़ बुलंद करेंगे। बुज़ुर्गों का कहना है कि कनाडा में उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं, सामाजिक सुरक्षा और सेवानिवृत्ति संबंधी अनेक लाभ तो प्राप्त हैं, लेकिन पंजाब से दूर होने का दर्द उनके दिलों में हमेशा बना रहता है और जीवन के अंतिम क्षण तक पंजाब उनकी स्मृतियों में बसा रहेगा। यही कारण है कि वे मानते हैं कि पार्कों में लगने वाली ये चौपालें उनके लिए अकेलेपन और मानसिक तनाव का सबसे अच्छा उपचार हैं।
पार्कों में लगने वाली इन चौपालों का हिस्सा पंजाबी मूल की बुज़ुर्ग महिलाएं भी बनती हैं। कुछ महिलाएं परिवार के बच्चों का मन बहलाने, घर की सीमित जगह से निकल कर खुली हवा में समय बिताने तथा अपनी सहेलियों के साथ दिल की बातें साझा करने के लिए पार्कों में पहुंचती हैं। उनकी बातचीत का दायरा अक्सर घरेलू परिस्थितियों, नए व्यंजनों की विधियों तथा पारिवारिक सुख-दुख के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। इनमें से कई महिलाएं अपने गांवों की पुरानी रस्मों, विवाह-शादियों और बीते समय की यादों को भी साझा करती हैं। इस बातचीत के माध्यम से न केवल उनका समय आनंदपूर्वक व्यतीत होता है, बल्कि इससे परदेस की धरती पर आपसी प्रेम, अपनापन और सामाजिक जुड़ाव भी और अधिक मज़बूत होता है।
वैन्कूवर और सरी सहित कनाडा के अन्य पार्कों में सजने वाली ये चौपालें केवल मनोरंजन का साधन ही नहीं हैं, बल्कि पंजाबी प्रवासियों के संघर्ष, मेहनत, यादों और सफलता की जीवंत मिसाल भी हैं। इन चौपालों में बैठे बुज़ुर्गों की बातें सुन कर आज भी पंजाब की मिट्टी की ़खुशबू महसूस की जा सकती है। (वैन्कूवर)
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