पाकिस्तान-एक और नया मोर्चा
पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में विगत लम्बी अवधि से गड़बड़ वाले हालात बने हुए हैं, जो अब और भी बिगड़ गए हैं। पहले ही बेहद उलझन में फंसे और अलग-अलग मोर्चों पर गम्भीर स्थिति का सामना कर रहे इस देश के लिए एक और मोर्चा खुल गया है। भारत की सीमाओं पर लगातार ज़बरदस्त तनाव बना हुआ है। इसके सबसे बड़े प्रांत बलोचिस्तान में आग की लपटें मच रही हैं। दूसरे प्रांत पख्तूनख्वा में प्रतिदिन गोलियां-बम चल रहे हैं। अ़फगानिस्तान के साथ इसकी सीमा लगने के कारण यहां के विद्रोही पाकिस्तानी तालिबानों ने अ़फगानिस्तान में शरण ली हुई है और ये अपनी हिंसक और कड़ी कार्रवाइयों को वहां से अंजाम दे रहे हैं, जिस कारण पाकिस्तान अ़फगानिस्तान के साथ भी पूरी तरह से उलझ गया है।
दोनों देशों की सीमाओं पर युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, जिसने उनके समक्ष बेहद चिंताजनक स्थिति पैदा कर दी है। अधिकृत कश्मीर का ज्यादातर भाग पाकिस्तान ने 1947 में पश्तून कबाइलियों के साथ अपनी सेना भेज कर हथिया लिया था, उस समय कश्मीर में महाराजा हरी सिंह की सरकार थी। यह क्षेत्र आज तक पाकिस्तान के कब्ज़े में है। पाकिस्तान ने इस संबंध में एक गहरी साजिश रचते हुए अपने कब्ज़े वाले कश्मीर का एक बड़ा क्षेत्र चीन के साथ 1963 में एक समझौता करके उसके हवाले कर दिया था। अपने कब्ज़े वाले गिलगित और बाल्टिस्तान में भी वह चीन के साथ समझौता करके व्यापारिक मार्ग बनवा रहा है। ऐसा उसने भारत के विरुद्ध चीन को अपने पक्ष में करने के लिए किया है परन्तु पाक-अधिकृत कश्मीर में आज लाखों ही लोग वहां के प्रशासन के विरुद्ध उठ खड़े हुए हैं। लगभग पिछले एक सप्ताह से वहां रोष प्रदर्शन हो रहे हैं। विगत दिवस रावलकोट शहर में लाखों ही लोग इस विरोध-प्रदर्शन में शामिल हुए जिससे घबरा कर पाकिस्तानी सेना ने इन निहत्थे लोगों पर गोलीबारी की, जिसमें दर्जनों ही लोग मारे गए और सैकड़ों ही घायल हो गए। स्थानीय लोगों ने ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी का गठन भी किया हुआ है, जो प्रतिदिन पाकिस्तानी प्रशासन को चुनौतियां दे रही है। गत कई वर्ष से बेहद गरीब ये लोग आटा और चावल सस्ती दरों में मांग रहे हैं। बिजली भी यह कम दरों पर चाहते हैं। इसके अतिरिक्त उनकी मौलिक अधिकारों की भी मांग है। उनकी यह शिकायत भी है कि यहां मंगला बांध बनाने के लिए ज्यादातर लोगों को उजाड़ा गया, परन्तु यहां पैदा होती बिजली पंजाब और सिंध सूबे को सस्ते दाम पर भेजी जाती है, जबकि पाक-अधिकृत कश्मीर में लोगों को बिजली के महंगे दाम देने पड़ते हैं।
अब वहां विद्रोह का एक कारण यह भी है कि यहां विधानसभा के लिए स्थानीय चुनाव होने हैं। इसकी 53 सीटें हैं जिनमें लगभग 20 सीटें यहां पर रहते लोगों के स्थान पर अलग-अलग प्रांतों में बसते कश्मीरी शरणार्थियों को दी जाती हैं। स्थानीय लोगों में इसके प्रति लगातार रोष बढ़ता रहा है। पाकिस्तान में सेना का अधिक प्रभाव होने के कारण उनके द्वारा उठाई जाती मांगों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। इसलिए यह बेहद ज्वलंत मुद्दा अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर भी उठना शुरू हो गया है। विशेष रूप से विदेशों में कश्मीरी शरणार्थी लगातार पाकिस्तान की दमनकारी नीतियों का विरोध करते दिखाई दे रहे हैं। इन प्रदर्शनों में कई बार लोगों द्वारा भारत के साथ विलय की बात भी की जाती है और भारत के पक्ष में नारे भी लगाए जाते हैं। इस लगातार बिगड़ रही स्थिति ने पाकिस्तान के प्रशासन के लिए एक ऐसी और गम्भीर चुनौती खड़ी कर दी है, जो शीघ्र कहीं हल होने वाली प्रतीत नहीं होती। इसने एक बार फिर पाकिस्तान के भविष्य संबंधी भी बड़ा प्रश्न-चिन्ह लगा दिया है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

