कारगुज़ारी के कारण ही याद रखे जाते हैं शासक
अब तक भारत के जितने भी प्रधानमंत्री हुए हैं, उन्होंने कुछ न कुछ सराहनीय योगदान दिया, लेकिन एक भूल सभी ने की कि आधारभूत संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) का निर्माण तो किया लेकिन उसे ढंग से चलाना या उसकी पूरी व्यवस्था नहीं की। उपलब्धियों के लिए संबंधित व्यक्तियों को सम्मानित तो किया, लेकिन लक्ष्य अधूरे रहने, प्रोजेक्ट में बहुत अधिक देरी होने या पद का अनुचित लाभ उठाने वालों को दंडित करना तो दूर, उनके खिलाफ कोई कार्यवाई नहीं की। विवरण मांग कर फाइल बंद कर दी या केवल तबादला कर दिया। परिणामस्वरूप कुशल, जवाबदेह और भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण न हो सका।
इतिहास पर एक नज़र : पंडित नेहरू ने आधुनिक भारत की आधारशिला रखी। बड़े बांध, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योग, वैज्ञानिक संस्थान और उच्च शिक्षा केंद्र स्थापित किए। इंदिरा गांधी ने हरित क्रांति, बैंक राष्ट्रीयकरण और राष्ट्रीय एकीकरण को मज़बूत किया। मनमोहन सिंह ने उदारीकरण की गति को आगे बढ़ाया और भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा। नरेंद्र मोदी ने सड़क, रेलए हवाई अड्डों, डिजिटल नेटवर्क और सार्वजनिक अवसंरचना के विस्तार को अभूतपूर्व गति दी। इन सभी दौरों में एक साझा कमज़ोरी दिखाई देती है कि आधारभूत संरचना का निर्माण तो हुआ, परन्तु संचालन और जवाबदेही की व्यवस्था नहीं की गई। सड़कें बनीं, लेकिन गड्ढों से भर गईं। सरकारी अस्पताल बने, लेकिन डॉक्टर नहीं मिले और उनकी शिक्षा विवादों में घिरी रही। स्कूल खुले, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता नहीं बढ़ी। विद्यार्थी और शिक्षक अक्सर आंदोलन करते रहे कि पढ़ाई लिखाई ऐसी हो जिससे तुरंत रोज़गार मिले। नगर निगम बने, लेकिन शहर अव्यवस्थित रहे। अवैध निर्माण ने सुंदरता को बदसूरती में बदल दिया। रेल नेटवर्क बढ़ा, लेकिन परियोजनाएं वर्षों तक लटकी रहीं। तेज़ गति वाली ट्रेन अभी तक आरंभिक दौर में है। यहां तक कि वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा विकसित टेक्नोलॉजी बिना उपयोग के बेकार होती गई और सरकारी उपक्रम घाटे की भेंट चढ़ते गए, परन्तु वे चलते रहे। बिडम्बना यह है कि निजी क्षेत्र में आते ही उनमें लाभ होने लगा जिसका अर्थ संसाधनों की कमी नहीं बल्कि शासन प्रणाली की कमज़ोरी है।
आंकड़े बताते हैं कि 2924 तक केंद्र सरकार की निगरानी वाली लगभग दो हज़ार परियोजनाएं समय और लागत दोनों में पीछे चल रही थीं। पांच सौ से अधिक परियोजनाओं में पांच लाख करोड़ से अधिक की लागत बढ़ी और औसत देरी तीन साल से अधिक रही। केंद्र की बड़ी परियोजनाओं का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा समय-सीमा से पीछे चलता रहा है। क्या इसके लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई हुई, नहीं हुई। नौकरशाही में देसी अंग्रेज़ों और राजनीति में अधिकतर सत्ता और धन के लोभी नेताओं ने ऐसे कायदे कानून बनाए कि जनता को बेबस कर लूटने की निरंकुश छूट मिल गई। रिश्वत या सिफारिश के बिना किसी काम का होना असंभव है। आमूलचूल परिवर्तन के दावे किए गए, परन्तु नये बने प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के कार्यकाल में बदलाव नहीं बल्कि स्थिति लगभग पहले जैसी ही रही।
प्रगति का मूल्यांकन ज़रूरी : भारत आज विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। विशाल राजमार्ग, आधुनिक हवाई अड्डे, मेट्रो रेल, डिजिटल भुगतान प्रणाली, अंतरिक्ष उपलब्धियां, परमाणु क्षमता, आईटी उद्योग और वैश्विक मंच पर बढ़ता प्रभाव—इन सबने भारत की छवि को बदल दिया है। यदि भारत ने इतना विकास किया है, तो आम नागरिक आज भी व्यवस्था से असंतुष्ट क्यों दिखाई देता है? ऐसा महसूस होता है कि सरकारी कार्यालय सेवा का केंद्र नहीं बल्कि अनुमति और नियंत्रण का केंद्र है।
भारत के साथ या उसके बाद स्वतंत्र हुए अनेक देशों ने सीमित संसाधनों के बावजूद हम से अधिक प्रगति की। दक्षिण कोरिया 1950 के दशक में युद्ध से तबाह हो गया था। आज वह इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, जहाज़ निर्माण और तकनीक में वैश्विक शक्ति है। सिंगापुर के पास न विशाल भूमि थी, न खनिज संसाधन लेकिन उसने विश्व की सबसे कुशल प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की। चीन 1970 के दशक तक व्यापक गरीबी से जूझ रहा था। आज वह विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। वियतनाम युद्ध से तबाह राष्ट्र था। आज वह वैश्विक विनिर्माण केंद्रों में गिना जाता है। भारत उनसे क्यों पीछे रहा, इसके कारण आर्थिक नहीं थे, इसकी वजह थी अत्यधिक नौकरशाही नियंत्रण, धीमी न्यायिक प्रक्रिया, स्थानीय निकायों की कमज़ोरी, प्रशासनिक जवाबदेही का अभाव और शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता पर अपर्याप्त ध्यान।
क्रांति का आगाज़ : भारत की अगली क्रांति जवाबदेही, पारदर्शिता, दक्षता और नागरिक सम्मान की होगी। इसका आधार प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का योगदान होगा। आज उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि भारत का नागरिक सरकारी कार्यालय में स्वयं को याचक के स्थान पर अधिकारयुक्त नागरिक क्यों नहीं महसूस करता, विश्वस्तरीय सड़कें बना दीं, लेकिन उन पर चलने वाले वाहनों के चालक नियमों का पालन क्यों नहीं करते, विश्वस्तरीय संस्थाएं भी बना लीं, लेकिन उनमें काम करने वालों की मानसिकता क्यों नहीं बदली और क्या उनके पास इस प्रश्न का उत्तर है कि जिस गुजरात मॉडल की दुहाई देकर सत्ता में आए थे, वह पूरे देश में लागू क्यों नहीं कर सके जबकि पूर्ण बहुमत की सरकार थी और है।
मंत्री से लेकर संतरी तक यदि काम में कोताही, लापरवाही और भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाते हैं तो उन्हें संरक्षण मिलता है और वे तीव्र गति से जनता की कमाई अपनी जेबों में डाल कर अपनी पीढ़ियों की आर्थिक सुरक्षा कर लेते हैं और जैसे ही किसी कार्रवाई की भनक लगती है, विदेश भाग जाते हैं जहां से वापिस लाना नामुमकिन होता है और मुमकिन होने का दावा धूल चाटने लगता है। दावों की कलई खुलने में देर नहीं लगेगी यदि आम आदमी के आक्रोश को समझा नहीं गया।

