देश के मौजूदा घटनाक्रम से विपक्षी पार्टियों को सबक लेने की ज़रूरत

ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस का ताश के पत्तों की तरह भरभरा कर गिर जाना भारतीय राजनीति में एक बड़े अपशकुन का इशारा है। कहने को यह सिर्फ एक पार्टी का मिटना है, एक नेता का गिरना है, हकीकत में यह भारत की बड़ी तेज़ी से बदलती राजनीति का संकेत है। यह इस बात का संकेत है कि सत्ता किसी बहुत बड़े बदलाव का इशारा कर रही है और लोग उसे बस राजनीति के एक तिकड़म की नज़र से ही देख रहे हैं। यह बदलाव भारत की राजनीति में कायरों की जमा होती फौज की ओर इशारा है। यह भारत की राजनीति से नैतिकता का हवा में गायब होने का इशारा है। यह राजनीति के पूरी तरह शक्ति आधारित होने का भी इशारा है। 
भारत की राजनीति में पहले भी बदलाव हुये हैं। पहले भी लोकतंत्र पर खतरे के बादल मंडराए हैं, राजनीति नाउम्मीद हुई थी, आशंकाओं ने पूरे समाज को हलकान कर दिया था लेकिन तब सत्ता इस कदर शक्ति आधारित नहीं हुई थी। आपातकाल लगा था, लेकिन लोकतंत्र को लेकर आवाज़ें पूरी तरह से खामोश नहीं हुई थीं। चुनाव के बाद जब इंदिरा गांधी हारी थी, तो उनको हराने वाले असली नायक जयप्रकाश नारायण इंदिरा से मिलकर रोये थे। वो चिट्ठियां अपनी इंदू को देने गये थे जिनके बारे में जयप्रकाश नारायण को ये डर था कि कहीं वो सरकार के हाथ न लग जाये और वो उसका बेजा इस्तेमाल न करें। आज राजनीति में ये दस्तूर खत्म हो गया है। सत्ता और विपक्ष के बीच लोकतंत्र का जो पुल था वो टूट चुका है। आज दोनों ही सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष नहीं है, वे एक-दूसरे के शत्रु हैं, उफनती नदी के दो किनारे जो कभी नहीं मिलेंगे जब कि लोकतंत्र आपसी मिलन का नाम है। 
तृणमूल वही पार्टी थी जिसे 4 मई को विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के पहले एक ऐसी नेता चला रही थी जो संघर्ष की प्रतीक थी, जिसने लेफ़्ट फ्रंट के 34 साल के शासन को ध्वस्त किया था, जो 15 साल की मुख्यमंत्री थी और जिसे एक समय प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर भी देखा जाता था। आज वो ममता बनर्जी एक असहाय नेता हैं जिनके अपने साथियों ने पीठ पर छुरा घोपा है। ममता के गिरने का अर्थ है विपक्ष की एक बेहद मज़बूत दीवार का ढह जाना और ये संदेश फैलना कि अगर ममता की पार्टी खत्म हो सकती है तो फिर कोई भी क्षेत्रीय पार्टी बचेगी नहीं। और अब सबसे बड़ा खतरा समाजवादी पार्टी पर मंडरा रहा है। 
यूपी में अगले कुछ महीनों में चुनाव है। ये वो प्रदेश है जहां लोकसभा चुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा था, खुद प्रधानमंत्री मोदी के लिये जीत का मार्जिन इतना कम हो गया था कि वो हार लगने लगी थी। भाजपा का सबसे बड़ा गुरूर तब टूटा जब वो अयोध्या यानी फैजाबाद में भी लोकसभा का चुनाव हार गई। ऐसे में अटकलों का दौर है कि भाजपा समाजवादी पार्टी को वो सबक सिखायेगी कि फिर वो कभी भाजपा के सामने खड़ा होने की जुर्रत न करें। ये अकारण नहीं है कि अखिलेश यादव ये कह रहे हैं कि अगर भाजपा यूपी में जीती तो फिर इसके बाद कोई चुनाव नहीं होगा। ये डर, ये अहसास इस ओर इशारा है कि लोगों का भरोसा अब चुनाव आयोग में नहीं रह गया है। उन्हें लगने लगा है कि चुनाव अब सिर्फ भाजपा को जिताने के लिये हो रहे हैं और विपक्ष कोई उम्मीद न पाले। कमोबेश ज्यादा मजबूती से यही बात राहुल गांधी काफी दिनों से कह रहे हैं। वो साफ दो टूक कह रहे हैं कि वोटचोरी हो रही है, चुनाव लूटे जा रहे हैं और पूरा सिस्टम हाईजैक हो चुका है। यानी लोकतंत्र कहने को बचा है। 
ऐसे में बड़ा सवाल ये है विपक्ष क्या करे? वो अपनी पार्टी बचाये, लड़े या फिर भाजपा के सामने पूरी तरह से नतमस्तक हो जाये? ये भी सवाल है कि क्षेत्रीय दलों का क्या भविष्य है? वो छोटी होती हैं तो उनको तोड़ना सबसे आसान है। पहले शिवसेना टूटी, फिर एनसीपी के दो टुकड़े हुए और अब तृणमूल धराशायी। उड़ीसा में नवीन पटनायक के बावजूद बीजू जनता दल की नय्या डगमगा रही है। बिहार में नितीश को गद्दी से उतारा जा चुका है। यूपी में बीएसपी की हालत खस्ता है। कर्नाटक में जनता दल सेकुलर समाप्ति के कगार पर है। अकाली दल का भविष्य अनिश्चित है। आम आदमी पार्टी दिल्ली गंवाने के बाद पंजाब बचाने के लिये  जान लगा रही है। आरजेडी ज़िंदा है लेकिन बेहद कमज़ोर है। असम गण परिषद, लोक जनशक्ति पार्टी, अपना दल, एनसीपी अजीत पवार, शिवसेना एकनाथ शिंदे, जैसे दल भाजपा की दया पर आश्रित हैं। टीडीपी सरकार में है तो अभी फिलहाल सुरक्षित है लेकिन कब तक? वाईएसआर कांग्रेस और बीआरएस का क्या होगा, ये सवाल हवा में तैर रहा है। 
क्षेत्रीय दलों को ये समझना चाहिये कि भाजपा की विचारधारा क्षेत्रीय अस्मिता को मज़बूत भारत की दिशा में एक बाधा मानती है। उसकी सोच में क्षेत्रीयता का उभार भारत को कमज़ोर करता है। वो एक एकीकृत शासन व्यवस्था की वकालत करती है यानी एक नेता, एक विधायिका और एक सरकार। ये बात आरएसएस के दूसरे प्रमुख एम.एस. गोलवालकर लिख चुके हैं। दीन दयाल उपाध्याय भी एकात्म मानववाद में कह चुके हैं कि भारत के संविधान में बंग माता है, तेलुगु माता है, तमिल माता है, कन्नड़ माता है लेकिन भारत माता कहां है? वो मज़बूरी में विविधता में एकता की बात करते हैं लेकिन वो विविधता को सम्मान नहीं देते। ऐसे में क्षेत्रीय दलों को ममता बनर्जी के प्रसंग के बाद नई रणनीति पर सोचना होगा। ये संकट उत्तरजीविता का संकट है यानी अस्तित्व बचाने का संकट है। राहुल गांधी यू ही नहीं कह रहे हैं कि अब प्रतिरोध करना होगा। 
विपक्ष को ये समझना होगा कि जैसे 1970 के दशक में जब असाधारण परिस्थिति बनने पर सारे विपक्षी दलों ने जनता पार्टी में खुद के विलय का फैसला लिया था, वो समय आ गया है। अकेले जीने का मतलब है पार्टी का खत्म हो जाना। ऐसे में दो रास्ते हैं। एक, कांग्रेस से निकले हुए दल कांग्रेस में समा जायें। तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी शरद पवार, जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस इस विकल्प के बारे में सोच सकते हैं। ऐसे में उनका अस्तित्व भी बचा रहेगा और एक राष्ट्रीय पार्टी के टेंट में आने से राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा रोल प्ले करने का मौका भी रहेगा। दो, समाजवादी विचारधारा से निकले दल फिर से एक जनता दल बनाने का विचार कर सकते हैं। अलग अलग तो एक भी नहीं बचेगा। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, तेजस्वी यादव की आरजेडी, नवीन पटनायक की बीजेडी और नितीश कुमार की जनता दल युनाईटेड वैसे ही एक हो सकते हैं जैसे 1989 के चुनाव में एक हुये थे। और फिर विस्तारित कांग्रेस के साथ विस्तारित जनता दल का अखिल भारतीय मोर्चा बन जाये।  ये विकल्प मुश्किल है लेकिन असंभव नहीं। विपक्ष अगर संकुचित सोच से ऊपर उठे तो ये संभव है, सामने लोकतंत्र और संविधान को बचाने का संकल्प हो तो ये हो सकता है। अगर 1970 के मध्य में जनसंघ जैसी हिंदुत्ववादी पार्टी समाजवादी और कांग्रेस से टूटे धड़ों के साथ अपना अस्तित्व खत्म कर जनता पार्टी में समाहित हो सकती है तो आज के हालात में कांग्रेस और जनता दल से टूट कर अलग हुई पार्टियां क्यों नहीं ऐसा कर सकतीं। असाधारण परिस्थितियां असाधारण फैसलों की मांग करती हैं। क्या विपक्ष असाधारण फैसले करने को तैयार है?

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