यहां सब चलता है, बन्धु
जंग खत्म हो गई, किसने कहा? जंग के मसीहा कभी जंग खत्म होने की इजाज़त नहीं देंगें, फिर भी जंग खत्म हो गई। क्या शांति और ज़िन्दगी की पुकार इस पर हावी हो गई, जो जंग खत्म हो गई? नहीं साहब ज़माना तो जंग जारी रखने का है। युद्धरत देशों को हथियार बनाने वाली अपनी फैक्टरियों को ज़िन्दा रखना है। इतना भी नहीं समझते कि जंग जारी रहेगी तो हथियारों का इस्तेमाल होता रहेगा। उनकी खरीददारी के बाज़ार सजते रहेंगे। जंग बन्द हो गई तो हथियार कैसे बिकेंगे? फुटकर बाज़ारों की रौनक तभी बढ़ती है, अगर उनमें चोर बाज़ारी होती रहे। लोग अपनी रोज़मर्रा की चीज़ों के लिए हाय तौबा करते हुए कतारें सजाते रहें। दस रुपये की चीज़ व्यक्तिगत एहसान जता कर चालीस रुपये में बिकती रहे। जंग बन्द हो गई, तो दस रुपये की चीज़ दस रुपये ही में मिलने लगेगी। कंजी आंखों वाला चोर बाज़ारी का शहजादा उदास हो जाएगा। हम किसी शहजादे को उदास नहीं देखना चाहते। इसलिए जंगबन्दी स्थायी नहीं होनी चाहिए, किसी न किसी रूप में उसे फिर से शुरू करने की गुंजाइश बनी रहनी चाहिए। इसलिए हमारी बस्तियों में जंगबन्दी करवाने वाले मसीहा अपने आपको शांति का अवतार कह गले में हार डलवाने के बाद ही दूसरे दिन सोचने लगते हैं, आओ कोई और जंग लड़ें। इस धरातल पर नहीं तो, किसी और धरातल पर लड़ लें। लेकिन जंग ज़रूर जारी रहे। जंग होती है तो आपात धर्मनिमता है। चार पैसे बनते हैं।
आपात धर्म से शिकायत नहीं होती। बस जीने का जुगाड़ करने की फिक्री लगी रहती है। जब जुगाड़ ही करना है तो बेहतर होने की इच्छा नहीं हो सकती। केवल किसी न किसी तरह हमें ज़िन्दगी से समझौता करके ज़िन्दा रहना है। गैस का सिलेण्डर नहीं मिला तो चूल्हा जला लो, सिलेण्डर के ऊपर ही रख कर जला लो।
किसने कहा था, उज्जवला योजना में हर घर में गैस सिलेण्डर होगा। सस्ते दाम साल में नौ सिलेण्डर मिलेंगे। आंकड़ा शास्त्री औसत निकालने लगे। कहते हैं गरीब के घर गैस के सिलेण्डर कम जलते हैं। औसत साल में चार की निकली है। इसलिए इनकी आपूर्ति नौ से चार कर दो। अब जब जंग खत्म हो जाए तो क्या फिर आपूर्ति चार से नौ हो जाएगी? जी नहीं, बचे हुए सिलेण्डर तो कमर्शियल के तौर पर दुगना चौगना दाम लायेंगे। इसलिए बाज़ार का सीधा सिद्धांत है जो कीमत एक बार बढ़ गई, वह बढ़ी रहेगी। सिलेण्डरों की आपूर्ति कम की है तो वह कम ही रहेगी।
नहीं ऐसा क्यों कहते हो? जनता अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाएगी। सरकार क्रांति धर्मी है और इसका लक्ष्य जन-कल्याण है। इसलिए यह अन्याय बहुत दिन नहीं चलने वाला। सही कहा आपने? लेकिन जितने दिन चल सके उतने दिन ही चला लो। बाद में इस कदम को पीछे हटाना पड़ा, तो नोट बटोरने की अंधी दौड़ कहीं और लगा लेंगे।
कोई और दांव न चला तो जंग लड़ने की यह विरासत ही गरीब गुरबा के हवाले कर देंगे। उसके पैदा होने से लेकर उसके मरने तक, उसके जन्म का प्रमाण-पत्र बनवाने से लेकर उसका मृत्यु प्रमाण-पत्र बनवाने तक आम आदमी को हर कदम जंग ही तो लड़नी पड़ती है। सरकार ने नौकरशाही पर नियन्त्रण करने के लिए सुविधा केन्द्र बना दिये हैं। वे घोषित अघोषित दलालों की मदद के बिना असुविधा केन्द्र बन गये हैं।
कौन-सी राजनीति या प्रशासन की मंज़िल है, जहां भ्रष्टाचार को खत्म करने के नारे नहीं लगते। ऊंचे स्वर से यह नहीं कहा जाता कि ‘हम भ्रष्टातचार’ को शून्य स्तर पर भी सहन नहीं करेंगे। शून्य स्तर पर न सहने का मतलब है कि पर्दानशीन हो सके तो इसे सौ प्रतिशत चलाएंगे। ईमानदारी का राग अलापेंगे, और दुनिया के भ्रष्टाचारी देशों के सूचकांक में हम अपना दर्जा एक इंच भी इधर-उधर नहीं होने देंगे।
हमें बदलाव के नाम पर यथास्थितिवाद का रूप बदलने की आदत हो गई है। तभी तो देखते हो अपने शहरों, बाज़ारों या चौराहों का नाम बदलते हुए हम, एक पल की भी देर नहीं लगाते, और इसे सांस्कृतिक संस्करण कह कर वायवीय सुख लेते हैं। शहरों के, चौराहों के नाम बदल कर हमने खोया हुआ इतिहास तो पुन: सृजित कर लिया, लेकिन भूख और बेकारी का इतिहास तो बदल नहीं पाये। शोषण और उत्पीड़न की दास्तान अभी तक उसी तरह ज़िन्दगी के हर मोड़ पर अपने दांत किटकिटाती हुई नज़र आती है। इसका मुकाबला हम क्रांति और प्रहार से नहीं बल्कि उपकार और दया धर्म से करना चाहते हैं। लोगों को सो कर उठने पर उनके खातों में पैसे होने का जादू-करिश्मा दिखाते हैं। ज़रूरत की चीज़ों को मुफ्त बांट देने की दानवीरता दिखाते हैं, चाहे वह बिजली हो या पानी। जन-विकास का दूसरा नाम यहां मुफ्तखोरी हो गया है, परन्तु हंम इसे आजकल एक नया शीर्षक देने लगे हैं, जन-कल्याण। क्यों बंधू?



