नदियों में गाद भरने से बढ़ता है बाढ़ का खतरा
हर वर्ष मानसून पंजाब में एक परिचित विडम्बना लेकर आता है। हम वर्षा के लिए प्रार्थना करते हैं ताकि हमारी फसलें हरी-भरी हों और भूमिगत जल भंडार भर सकें, जिससे कृषि अर्थव्यवस्था टिकी रहे। लेकिन बाढ़ के कारण तबाही और अनिश्चितता की आशंका दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। नदी क्षेत्रों में बसे गांव जल स्तर को घबराहट से देखते रहते हैं, शहरी बस्तियां जलभराव के डर से सहमी रहती हैं और सरकारें बाढ़ चेतावनियों पर प्रतिक्रिया देने में जुटी रहती हैं। पंजाब के सामने अब चुनौती केवल बाढ़ प्रबंधन की नहीं रही, यह बदलती जलवायु परिस्थितियों, सिकुड़ती नदी क्षमताओं और दशकों की पारिस्थितिक उपेक्षा के बीच मानसून की तैयारी का सवाल बन गई है। राज्य की नदियां, विशेषकर सतलुज और ब्यास, आज उस बोझ तले दबी हैं जो उन्हें कभी नहीं उठाना था। वर्षों से अनियंत्रित गाद जमाव, बाढ़ के मैदानों पर अतिक्रमण और अपर्याप्त वैज्ञानिक नदी प्रबंधन ने मानसून जल प्रवाह को सुरक्षित रूप से वहन करने की क्षमता को बुरी तरह घटा दिया है। नतीजतन आज मध्यम मात्रा में छोड़ा गया पानी भी उन क्षेत्रों में बाढ़ का कारण बन जाता है जो कभी सुरक्षित माने जाते थे।
पंजाब में बाढ़ की कहानी ऊपरी धारा से शुरू होती है। सतलुज और ब्यास नदियां हिमालय के संवेदनशील जलग्रहण क्षेत्रों से भारी मात्रा में अवसाद लेकर आती हैं। परंपरागत रूप से नदियों में इस सामग्री को आगे बहाने के लिए पर्याप्त चौड़ाई और गहराई थी, लेकिन दशकों की गाद जमाव ने नदियों की तलहटी ऊंची कर दी है और उनके प्रवाह मार्ग संकरे हो गए हैं। इसके साथ ही नदी तलों से अंधाधुंध रेत और बजरी खनन ने इस समस्या को और विकराल बना दिया है। विशेषज्ञों ने बताया है कि पंजाब में कई स्थानों पर अवसाद जमाव के कारण नदी की तलहटी 5 से 12 फीट तक ऊंची हो गई है, जिससे नदियों और जल निकासी चैनलों की वहन क्षमता में भारी कमी आई है। कुछ हिस्सों में यह क्षमता पहले की तुलना में एक-तिहाई रह गई है।
इसके परिणाम स्पष्ट दिखते हैं। जो पानी पहले नदी के किनारों के भीतर बहता था, अब तटबंधों को पार करके बस्तियों में घुस जाता है। जो मानसून प्रवाह पहले सामान्य माना जाता था, वह वैज्ञानिक तैयारी की कमी के चलते बाढ़ आपात स्थिति में बदल जाता है। यह समस्या तब और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि नदी तलों और बाढ़ के मैदानों पर लगातार अतिक्रमण हो रहा है। ऐसे क्षेत्रों में शहरी बस्तियां उग आई हैं जो ऐतिहासिक रूप से प्राकृतिक बाढ़ अवरोधक का काम करते थे। जब नदियां गहराई और चौड़ाई दोनों खो देती हैं, तो बाढ़ के इस संकट को टालना नामुमकिन हो जाता है। पंजाब की बाढ़ की कमज़ोरी का संबंध गोविंद सागर जलाशय की स्थिति से भी जुड़ा है जो भाखड़ा बांध द्वारा निर्मित एक जीवनरेखा है। छह दशकों से अधिक के संचालन में इस जलाशय के भीतर भारी मात्रा में गाद जमा हो गई है। हालिया आकलन बताते हैं कि जलाशय की मूल भंडारण क्षमता का लगभग एक-चौथाई हिस्सा गाद के कारण नष्ट हो चुका है। अनुमान है कि 2.5 अरब घन मीटर से अधिक भंडारण स्थान गाद से भर चुका है।
यह कोई छोटा-मोटा तकनीकी मुद्दा नहीं है। जलाशय का भंडारण भारी वर्षा के दौरान एक सुरक्षा कुशन का काम करता है। जैसे-जैसे भंडारण कम होता जाता है, अचानक आने वाले जल प्रवाह को अवशोषित करने की क्षमता घटती है, जिससे बांध संचालन और डाउनस्ट्रीम बाढ़ प्रबंधन पर दबाव बढ़ता है। इस वर्ष का मानसून जलवायु परिवर्तनशीलता और एल नीनो जैसी बड़े पैमाने की मौसमी घटनाओं के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के बीच आया है। मौसम प्रणालियां तेजी से अप्रत्याशित होती जा रही हैं, जो लंबे सूखे दौर के बाद अचानक भारी वर्षा के रूप में सामने आती हैं। यह अस्थिरता जल संरचनाओं पर अतिरिक्त दबाव डालती है। भाखड़ा बांध का जलग्रहण क्षेत्र हिमालय में लगभग 68,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जबकि गोविंद सागर जलाशय करीब 164 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत है। इस विशाल जलग्रहण क्षेत्र में कोई भी अत्यधिक वर्षा या बादल फटने की घटना कम समय में भारी जल प्रवाह उत्पन्न कर सकती है और अंतत: बांध के निचले इलाकों में भीषण तबाही का कारण बन सकती है।
रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि इस मौसम में जलाशय का स्तर पिछले वर्ष की तुलना में काफी ऊंचा है। स्वस्थ भंडारण सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए आवश्यक है, लेकिन यह इस बात की भी याद दिलाता है कि चरम मानसून प्रवाह आने से पहले पर्याप्त बाढ़ कुशन बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है।
पंजाब यह नहीं मान सकता कि बाढ़ केवल एक मौसमी आपात स्थिति है जिस पर ध्यान तभी देना है जब पानी गांवों में घुस जाए। बाढ़ के प्रति सहनशीलता को साल भर की शासन प्राथमिकता बनाया जाना चाहिए। इसके लिए नदियों और जलाशयों से वैज्ञानिक गाद निकासी, बाढ़ मैदानों को अतिक्रमण से कड़ाई से बचाना, तटबंधों को मजबूत करना, प्राकृतिक जल निकासी प्रणालियों की बहाली, वास्तविक समय में जल विज्ञान की निगरानी और नदी घाटियां साझा करने वाले राज्यों के बीच बेहतर तालमेल आवश्यक है।
पंजाब ने हमेशा विपरीत परिस्थितियों में अपनी सहनशीलता का परिचय दिया है, लेकिन यह सहनशीलता तैयारी का विकल्प नहीं हो सकती। जैसे-जैसे जलवायु जोखिम बढ़ते हैं और नदी प्रणालियां कमज़ोर होती जाती हैं, राज्य को प्रतिक्रियात्मक बाढ़ राहत से आगे बढ़कर सक्रियता से बाढ़ रोकथाम की दिशा में बढ़ना होगा। मानसून हर साल पंजाब की परीक्षा लेता रहेगा। सवाल यह है कि क्या हम आपदाओं के बाद प्रतिक्रिया देते रहेंगे, या फिर उनके आने से पहले उन्हें रोकने में निवेश करेंगे?
-सांसद राज्यसभा

