पूसा-44 की काश्त को बंद करना उचित नहीं
पंजाब में धान की रोपाई शुरू हो गई है, परन्तु बहुत कम रफ्तार से यह काम चल रहा है। पंजाब सरकार ने प्रिज़र्वेशन ऑफ सब-स्वॉइल वॉटर एक्ट-2009 के तहत किसानों को 15 जून से धान की रोपाई शुरू करने की अनुमति दी थी, जिसमें थोड़ा-बहुत बदलाव करके प्रत्येक वर्ष धान लगाया जाता है। इस वर्ष सरकार ने 1 जून से तीन चरणों में धान की रोपाई को मंज़ूरी दी है। यह तारीख इसलिए तय की जाती रही है ताकि किसान अगेता धान न लगाएं और पानी की बचत हो सके। धान की अगेती रोपाई के लिए पूसा-44 किस्म को चुना गया, क्योंकि यह पकने के लिए अन्य किस्मों से हफ्ता-दस दिन ज़्यादा लेती थी।
राज्य पुरस्कारी पीएयू से सम्मानित बिशनपुर छन्ना (पटियाला) के प्रगतिशील किसान राजमोहन सिंह कालेका 1993 से लगातार अपनी 18 एकड़ ज़मीन पर पूसा-44 किस्म लगाते आ रहे हैं। उन्होंने पूसा-44 किस्म की काश्त करके औसतन 40 क्ंिवटल प्रति एकड़ उपज प्राप्त करके 2017-18 में इस किस्म की राज्य में सबसे अधिक उपज प्राप्त करने पर केंद्र से पंजाब सरकार के साथ ‘कृषि करमन पुरस्कार’ प्राप्त किया। इस उपलब्धि के लिए उन्हें आईसीएआर (भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान) ने ‘फैलो फार्मर’ पुरस्कार देकर सम्मानित किया।
पूसा-44 लगातार कई वर्षों तक धान की काश्त के अधीन कुल रकबे के 70 प्रतिशत से अधिक रकबे पर लगाई जाती रही है। यह किस्म आंधी, तूफान और तेज़ हवाओं में भी नहीं गिरती। आढ़ती एसोसिएशन पटियाला के अध्यक्ष तथा प्रसिद्ध राइस मिल मालिक देवी दयाल कहते हैं कि मिल मालिक पूसा-44 खरीदना इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि इसका चावल नहीं टूटता, टोटा अन्य किस्मों के मुकाबले बहुत कम होता है और चावल की वसूली 70 प्रतिशत तक है। सरकार ने पूसा-44 की काश्त और इसके बीज की पंजाब सीड सर्टिफिकेशन अथॉरिटी से सर्टिफिकेशन बंद करवा कर और पीएयू की सिफारिश पर अन्य पाबंदियां लगा कर इस किस्म की काश्त को रोकने पर ज़ोर दिया, जिसके बाद इसकी काश्त कम होती गई। फिर भी पिछले वर्षों में लगभग 20 प्रतिशत रकबे पर इसकी काश्त की जाती रही। इस किस्म को विकसित करने वाली आईएआरआई ने भी इसका बीज बनाना बंद कर दिया है। हालांकि, यह किस्म केंद्र की फसलों की किस्मों और स्तरों की मंज़ूरी संबंधी बनाई गई सब-कमेटी द्वारा नोटिफाइड है। अन्य अप्रमाणित हाइब्रिड किस्में, पीली पूसा, डोगर पूसा आदि जो नोटिफाइड भी नहीं, मंडी में बेची जा रही हैं और किसान उन्हें लगा रहे हैं।
पंजाब सरकार ने जो इस वर्ष तीन चरणों में धान लगाने का आदेश जारी किया, उसका मुख्य लक्ष्य पानी की बचत है। पूसा-44 के बीज उपलब्ध न होने और किसानों द्वारा किए तजुर्बों के आधार पर कि 20 जून के आसपास लगाई गई फसल कीड़े-मकौड़ों से सुरक्षित रहती है , किसान अगेता धान नहीं लगा रहे। अमलोह के पास धर्मगढ़ गांव के पीएयू से सम्मानित प्रगतिशील किसान बलबीर सिंह जड़िया कहते हैं कि पूसा-44 को पकने में 145 दिन लगते हैं और इससे पानी की खपत कोई ज़्यादा नहीं होती। कालेका और जड़िया के अनुसार अब जो कम समय में पकने वाली किस्मों के आने से किसान आलू, बसंत मक्का और धान का फसली चक्र अपना रहे हैं, उससे पूसा-44 के मुकाबले पानी की खपत कहीं अधिक होती है। चाहे आईएआरआई ने कम समय में पकने वाली पूसा-1824 और पूसा-2090 किस्में विकसित कीं, लेकिन कालेका का कहना है कि पूसा-44 के बीज बनाना सरकार को तब तक बंद नहीं करना चाहिए था, जब तक नई किस्मों को पूरी तरह अपनाया नहीं जाता। सभी किस्मों में से पूसा-44 का लगाना जो किसानों, शैलरों तथा अढ़तियों की पसंद थी, को बंद करना नहीं चाहिए था। धान के सीज़न में किसानों को 8 घंटे बिजली देने का सरकार द्वारा जो आश्वासन दिया गया है, उसके दृष्टिगत तो पूसा-44 जैसी किस्म जो लगातार 30 वर्षों से सफलता से लगाई जा रही थी, की काश्त तथा बीज बनाना बंद करना किसानों के हित में नहीं है।
हाइब्रिड धान की बढ़ती काश्त से जो नया फसली चक्र सामने आया है, उससे कृषि पर संकट मंडरा रहा है। हाइब्रिड्स से धान की गुणवत्ता खराब होने से धान के मंडीकरण में किसानों को बहुत मुश्किल आएगी। इस वर्ष बासमती किस्मों का रकबा बढ़ने की संभावना नहीं है, क्योंकि खाड़ी युद्ध की वजह से किसानों को आशंका है कि बासमती का निर्यात कम होगा, जिससे बासमती की कीमत गिरने का अंदेशा है। इस पर एमएसपी भी नहीं है। चाहे मौसम विभाग द्वारा इस वर्ष पिछले वर्षों के मुकाबले कम बारिश होने की भविष्यवाणी की गई है, परन्तु धान खरीफ की मुख्य फसल बनी रहेगी। पीएयू को ऐसी वैकल्पिक फसलें विकसित करने की ज़रूरत है, जो किसानों को धान जितना मुनाफा दें।
ई-मेल : bhagwandass226@gmail.com



