अयोध्या मंदिर में दान-पात्रों पर संशय के बादल

पूरा हिंदू समाज सन्नाटे में है। उसे समझ में ही नहीं आ रहा, कैसे प्रतिक्रिया की जाए। जिस राम मंदिर के लिए साढ़े पांच सौ साल तक अनथक संघर्ष किया गया, जिस राम मंदिर के निर्माण हेतु सैकड़ों लोगों ने अपना बलिदान दे दिया, जिस राम मंदिर की सियासत के लिए भाजपा को लोगों ने गठबंधन के दौर में भी दो बार बंपर बहुमत से और दो बार सामान्य मतों से जिताकर केन्द्र में सत्ता दिलायी और फिलहाल लगभग दो तिहाई देश में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता में बिठाया, उसी राम के मंदिर के साथ इतना बड़ा विश्वासघात। रह-रह कर चंदे में चोरी के आरोप लगते रहे, मंदिर निर्माण के मामले में घोटाले और हेरफेर के आरोप लगते रहे, लेकिन जिम्मेदार लोग हमेशा इसे अफवाह, झूठ और बेमतलब के आरोप बताते रहे, लेकिन जब पानी सिर के ऊपर से गुजर गया और राम मंदिर प्रशासन से बार-बार की जा रही शिकायतों के बावजूद एक बार भी ध्यान देना ज़रूरी नहीं समझा गया तो इसी व्यवस्था के एक कर्मचारी ने सालों से मंदिर के दान पात्रों से हो रही चोरी को सार्वजनिक रूप से खुलासा कर दिया। चूंकि अयोध्या में समाजवादी पार्टी का सांसद है, इसलिए यह बात सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव तक पहुंच गई और जब उन्होंने इसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के सामने 5 से 7 करोड़ तक के घोटाले के रूप में भंडाफोड़ कर दिया, तब कहीं जाकर शासन-प्रशासन के कान में जूं रेंगी। पिछले एक सप्ताह की छानबीन के बाद जिसका अभी तक आधिकारिक रूप से सार्वजनिक खुलासा नहीं हुआ, अब यह बात खुलकर सामने आ रही है कि मंदिर से दो, चार, पांच करोड़ रुपये की नहीं बल्कि 200 करोड़ रुपये तक के चढ़ावे की चोरी हो सकती है। अब इस पूरे कांड के लिए 50 कर्मचारी राडार पर हैं, जिनमें से कुछ तो महज कुछ सालों के भीतर कई-कई करोड़ रुपयों की संपत्ति के मालिक बन चुके हैं। अब तक जो जांच के जरिये खुलासा हुआ है, वह यह है कि अभी तक पूरी तरह से सार्वजनिक नहीं की गई जांच के बावजूद 2 करोड़ रुपये कैश मिल चुके हैं और सूत्रों के मुताबिक कई करोड़ रुपये का सोना भी बरामद हो चुका है, जिसे अभी एसआईटी (विशेष जांच समिति) द्वारा सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया गया। इन पंक्तियों के लिखे जाने के पांच दिन पहले दिल्ली से एक आईएस ऑफिसर अयोध्या पहुंचा, जिसे एक स्पेशल विमान लेकर आय है। उसके श्रीराम जन्मभूमि परिसर में ट्रस्ट के पदाधिकारियों से बातचीत इसकी जांच के लिए शासन ने भी एक विशेष जांच समिति का गठन कर दिया है, जिसे 15 दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट देनी है।
हालांकि अभी तक इस पूरी जांच का कोई अधिकृत खुलासा नहीं हुआ, लेकिन जो बातें सामने आ रही हैं, उनके मुताबिक रामलला के गर्भगृह के पास रखे दानपात्रों और दूसरी अन्य जगहों पर मौजूद दानपात्रों से जिनकी संख्या 45 बतायी जाती है, नकदी निकालकर जन्मभूमि परिसर के अंदर ही एक गोपनीय कक्ष में ले जाया जाता है। इस कमरे की सटीक स्थिति को सुरक्षा के मद्देनज़र गुप्त रखा गया है और यहां किसी भी तरह का बाहरी प्रवेश पूरी तरह से वर्जित है। दानपात्रों से निकाले गये दान को गिनने और उसकी व्यवस्था करने के लिए तीन स्तर की सुरक्षा है। 24 कर्मचारी नोट गिनकर उनके बंडल बनाते हैं। ये कर्मचारी प्राइवेट एजेंसी के जरिये ट्रस्ट ने रखे हैं। 12 कर्मचारी जो कि ट्रस्ट के हैं, इन 24 कर्मचारियों पर नजर रखते हैं यानी एक कर्मचारी दो लोगों पर निगाह रखता है। शेष 14 कर्मचारी जिनमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और टीसीएस की ऑडिट टीम के सदस्य भी होते हैं। ये दान की राशि को ले जाकर बैंक में जमा करते हैं। इसके बावजूद घोटाला कैसे हो गया सचमुच जांच का विषय है।  चार दिन की जांच के बाद से एक के बाद एक जो भयावह खुलासे हो रहे हैं और इन खुलासों से जिस षड्यंत्र की तस्वीर उभरकर सामने आ रही है, उससे अंदाजा लगता है कि यह सब कितना भयावह है। यह महज एक चोरी या घोटाले की जांचभर का मामला नहीं है। आज पूरे देश में सिर्फ और सिर्फ इसकी चर्चा है तथा चर्चा के साथ ही अविश्वास और हताशा का वातावरण बन चुका है। उसमें केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को संज्ञान लेना चाहिए और किसी तरह की लीपापोती की बजाये दोषियों को कटघरे में लाना चाहिए अन्यथा आगामी हिन्दू समाज इस विश्वासघात के लिए जिम्मेदार लोगों को कभी माफ नहीं करेगा।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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