जी-7 में मोदी की शमूलियत

आज विश्व भर में विभिन्न देशों के अपने-अपने हितों की रक्षा के लिए अनेक संगठन बने हुए हैं। इनके सम्मेलनों की चर्चा लगातार होती रहती है। इसी क्रम में अब फ्रांस में हो रही जी-7 संगठन की बैठक की भी चर्चा हो रही है। यह संगठन 1975 में अस्तित्व में आया था। इसकी वार्षिक बैठकें होती हैं, जिनमें इनके सदस्य देशों के प्रमुख शामिल होते हैं। इस संगठन के स्थायी सदस्य अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और जापान हैं।
भारत को भी समय-समय पर इसके सम्मेलनों में कुछ अन्य देशों के साथ-साथ अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है। इस बार इसमें भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाग लेना विश्व के बदलते माहौल में अहम महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। इस संगठन के अस्तित्व में आने के समय से इसका ध्यान अपने-अपने देशों के आर्थिक सरोकारों, लोकतंत्र और विश्व के अन्य मामलों पर केन्द्रित रहा है। यूरोपियन यूनियन के प्रमुखों को भी इसकी बैठकों में बुलाया जाता है। वर्तमान समय में अन्तर्राष्ट्रीय हालात बहुत बदले हुए होने के कारण और इन देशों में भी आपसी तनाव होने के कारण चाहे ऐसे सम्मेलनों का महत्त्व ज़रूर कम हो जाता है, परन्तु ऐसे सम्मेलन अधिक आपसी दूरियों को कम करने में ज़रूर सहायक होते हैं। विगत अवधि में विश्व में दो बड़े युद्ध के चलते इन देशों में दूरियां बढ़ती जा रही हैं। विशेष रूप से अमरीका-इज़रायल और ईरान का कुछ महीने से चल रहे युद्ध के दौरान भी होर्मुज़ जल मार्ग के संबंध में अमरीका और ज्यादातर यूरोपियन देशों के बीच दूरियां बढ़ती रही थीं। अमरीका ने यह मार्ग खोलने के लिए यूरोपियन यूनियन के देशों को सहायता देने की अपील की थी, परन्तु उन्होंने ट्रम्प का इस मामले पर साथ नहीं दिया, जिस कारण अमरीकी राष्ट्रपति इनसे काफी नाराज़ भी हो गए थे। रूस और यूक्रेन के युद्ध में भी इनके आपसी मतभेद सामने आते रहे हैं। इस संगठन के देश राष्ट्रपति ट्रम्प के साथ इसलिए भी नाराज़ रहे हैं कि उन्होंने अपनी इच्छा से इन देशों का अमरीका में होते निर्यात पर भारी टैक्स लगाने की घोषणा की थी। इस मामले को लेकर अभी तक भी उनमें दूरियां बनी रही हैं। 
इन कारणों के दृष्टिगत इस वार्षिक सम्मेलन में पहले ये अनुमान लगाए जा रहे थे कि ट्रम्प इसमें शामिल होंगे या नहीं, परन्तु ट्रम्प ने इसमें भाग लिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इस स्थान पर बहुत लम्बी अवधि के बाद उनसे मिले हैं, परन्तु यह भेंट भारत के साथ आईं दूरियों को कितना कम कर सकेगी यह देखने वाली बात होगी। इस सम्मेलन में व्यापारिक असंतुलन संबंधी भी बातचीत होने की सम्भावना है। पर्यावरण बदलाव और इस संबंधी योजनाओं के बारे में भी इस सम्मेलन में विचार किया जाएगा और टैरिफ का मुद्दा भी इसमें उभर सकता है।
विगत वर्ष अमरीका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भारत की यात्रा की थी परन्तु अमरीका के राष्ट्रपति द्वारा लगातार भारत के विरुद्ध की जाती बयानबाज़ी और विगत दिवस में अमरीकी बमबारी से ओमान की खाड़ी में तीन भारतीय मछुआरों के मारे जाने ने भी अब एक नई स्थिति पैदा कर दी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विश्व भर में बहुत चर्चित नेता रहे हैं। इस सम्मेलन में उनका इन बड़ी आर्थिकता वाले देशों के नेताओं से मिलना और अलग-अलग रूप से उनके साथ भारत से संबंधित मामलों पर विचार-विमर्श करना एवं और सांझ बढ़ाना भी महत्त्वपूर्ण माना जाएगा, क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत को दृष्टिविगत करना अब आसान नहीं है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

#जी-7 में मोदी की शमूलियत