सांस्कृतिक नैतिक-मूल्यों का अवसान

अप्रैल माह में राज्यसभा में ‘आम आदमी पार्टी’ का प्रतिनिधित्व कर रहे 6 राज्यसभा सांसदों ने अपना अलग गुट बना कर पार्टी से ब़गावत करके भाजपा के साथ अपना रिश्ता जोड़ लिया था। ‘आप’ के राज्यसभा में 9 सांसद थे। दल बदल कानून के अनुसार यदि दो तिहाई सदस्य अपनी पार्टी बदलते हैं तो उनकी सदस्यता समाप्त नहीं होती। दलबदल कानून इसी कारण ही बनाया गया था कि देश भर में लगातार अवसरवादी राजनीति का बोलबाला था। ज्यादातर राजनीतिज्ञ इस तरह की राजनीति करते हैं कि समय मिलते ही जहां लाभ मिले, वहीं राजनीतिक झूला झुलने के लिए तैयार हो जाते हैं। इन सांसदों के पार्टी बदलने पर ‘आप’ ने पंजाब भर में प्रदर्शन किए थे और इन्हें ‘गद्दार’ और ‘अवसरवादी’ कहा था, परन्तु उन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा और आज भी ये सभी स्थान-स्थान पर दनदनाते फिरते हैं। 
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को कड़ी हार मिलने के बाद लोकसभा में इसके ज्यादातर सदस्यों ने ब़गावत कर दी और एक नाम ‘निहाद’ पार्टी ‘नैशनलिस्ट सिटीज़न्स ऑफ इंडिया’ के ध्वज तले एकजुट हो गए और वहां की विधानसभा के ज्यादातर विधायक भी अपना राजनीति पासा बदल चुके हैं। उन्होंने अपना अलग गुट बना कर स्वयं को असली तृणमूल कांग्रेस के विधायक बताया है। यह स्पष्ट है कि आज की राजनीति में शर्म नाम की कोई चीज़ नहीं रही और न ही प्रतिबद्धता बची रह सकी है। जिस पार्टी से यह टूट कर गए, उसके नेता इनके दबाव में या बिकाऊ होने के कारण पार्टी बदलने का आरोप लगा रहे हैं, परन्तु आज देश की समूची राजनीति जिस तरह चल रही है, उसमें सांस्कृतिक नैतिक-मूल्य बिखर गए हैं। यदि हमारे प्रतिनिधि राजनीतिज्ञ ही अवसरवादी का खेल खेल कर शर्म महसूस नहीं करते और बाद में लोग भी इन्हें भूल जाते हैं तो इन्होंने समाज के समक्ष कैसा मॉडल पेश करना है, लोगों पर कौन-सा प्रभाव पड़ना है, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। मार्ग से भटक चुकी ऐसी राजनीति ने आज बड़ी सीमा तक जन-साधारण को भी अवसरवादी का मार्ग दिखा दिया है। इसी तरह के समाचार अब महाराष्ट्र से प्राप्त हो रहे हैं, जहां 4 वर्ष में शिव सेना जैसी मज़बूती पार्टी दूसरी बार टूटने की कगार पर है। समाचार ये भी हैं कि उद्धव ठाकरे की शिव सेना (यू.बी.टी.) में बड़ी दरार पड़ी दिखाई देने लगी है। इस पार्टी के लोकसभा में 9 सांसद हैं। जिनमें 6 सांसदों ने ब़गावत करके एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिव सेना में जाने की इच्छा प्रकट की है। ये सांसद लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला से भी मिलकर आए हैं। इससे उद्धव ठाकरे की शिव सेना और भी कमज़ोर हुई दिखाई देती है। उद्धव की पार्टी के नेता और प्रवक्ता संजय राऊत ने यह आरोप लगाया है कि इन सांसदों को 50-50 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई है। ऐसे समाचारों का जन-साधारण की मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका सभी को अहसास है। 
बात यहीं खत्म नहीं हो रही, अब उत्तर प्रदेश की बड़ी और मज़बूत समाजवादी पार्टी भी टूटने की कगार पर है। यहां की एक और पार्टी ‘सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी’ के प्रमुख और उत्तर प्रदेश की सरकार में पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी के टूटने का दावा किया है। राजभर ने यह आरोप लगाया है कि समाजवादी पार्टी के प्रमुख राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद राम गोपाल यादव ने केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखा है, जिसमें उन्होंने समाजवादी पार्टी के सन्दर्भ में माइनिंग घोटाला और गोमती रीवर फ्रंट घोटाले का ज़िक्र करते हुए इनसे राहत मांगते समाजवादी पार्टी के कुछ सांसदों और विधायकों को भाजपा में लेने की मांग की है। इसी तरह उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मोर्या ने भी कानपुर में दावा किया कि समाजवादी पार्टी के 25-26 सांसद टूटने के लिए तैयार हैं। लोकसभा में समाजवादी पार्टी के 37 सांसद हैं। इस तरह की हो रही तोड़-फोड़ का लाभ मोदी सरकार को ही मिलता दिखाई दे रहा है क्योंकि दोनों ही सदनों में अन्य पार्टियों से टूट कर आने वालों से इसकी सहयोगी पार्टियों में लगातार वृद्धि हो रही है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा अपना स्पष्ट बहुमत सिद्ध करने से पिछड़ गई थी। उस समय उसे बहुमत के लिए तेलगू देशम पार्टी और जनता दल (यूनाइटिड) का सहारा लेना पड़ा था। इसलिए उस वर्ष के केन्द्रीय बजट में इन सहयोगी पार्टियों द्वारा पहले ही रखी गई बड़ी आर्थिक मांगों को भाजपा द्वारा मानना पड़ा था।
 उसके बाद तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों के पार्टी बदलने और अब महाराष्ट्र में शिव सेना शिंदे में उद्धव के सांसदों के शामिल होने से भाजपा के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. में नरेन्द्र मोदी का बढ़ता प्रभाव दिखाई दे रहा है और अब समाजवादी पार्टी में टूट-फूट के समाचारों ने केन्द्र सरकार की ताकत को और भी बढ़ा दिया है। यदि देश की राजनीति में इसी तरह अवसरवादी दौड़ जारी रहेगी तो भविष्य में इस बात की सम्भावना बन जाएगी कि दोनों सदनों में सत्तारूढ़ सांसदों की बढ़ती संख्या के सहारे भाजपा संविधान में मूलभूत बदलाव करने में समर्थ हो जाएगी। भाजपा इसी दिशा में काम करती दिखाई दे रही है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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