विश्व भर के लिए राहत की सम्भावना

लगभग विगत 4 माह से अमरीका-इज़रायल और ईरान के युद्ध ने न सिर्फ पश्चिम एशिया के क्षेत्र का ही भारी नुकसान किया, अपितु इसका विश्व भर के देशों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा। खाड़ी देशों का तेल और गैस का उत्पादन बहुत कम हो गया। होर्मुज़  जलमार्ग और ईरान की नाकाबंदी के कारण आवागमन वाले जहाज़ रुक गए। इस मार्ग से लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का निर्यात होता था। फैली इस गड़बड़ी ने जहां तेल और गैस की कीमतों को एक तरह आग लगा दी, वहीं खाद की सप्लाई रुक जाने से कृषि के लिए भी संकट खड़ा हो गया था। भारत द्वारा निर्यात किए जाते बासमती चावल और अन्य सामान की सप्लाई में भी रुकावट पड़ने से व्यापार बेहद घाटे में चला गया था। इसलिए फ्रांस में डोनाल्ड ट्रम्प और ईरान में मसूद पेज़ेश्कियन द्वारा निर्धारित समय से 2 दिन पहले ही समझौते पर डिज़िटली हस्ताक्षर करने के बाद विश्व भर ने सुख की सांस ली है। यह संधि अंतरिम है। आगामी 2 माह तक सभी पक्षों द्वारा इस संबंध में विस्तारपूर्वक ज़रूरी पहलुओं पर बातचीत होगी, परन्तु ताज़ा जानकारी के अनुसार समझौते की कुछ धाराओं को लेकर अमरीका और ईरान के बीच पुन: कुछ मतभेद पैदा हो गए हैं। 
 संधि के संबंध में उठ रहे अनेक तरह के किन्तु-परन्तु के कारण क्षेत्र में शांति होने संबंधी अभी भी विश्वास से कुछ नहीं कहा जा सकता। इज़रायल ने लेबनान पर हमले जारी रखने की घोषणा की है। उसने लेबनान के 20 प्रतिशत क्षेत्रफल पर कब्ज़ा कर लिया है। उसका तर्क है कि वहां सक्रिय हिज़्बुल्लाह संबंधी इस समझौते में कोई फैसला नहीं किया गया। यदि यमन के हूती, हिज़्बुल्लाह और हमास इज़रायल के विरुद्ध अपनी लड़ाई जारी रखते हैं तो यह समझौता पूरी तरह सफल होना कठिन हो जाएगा। अमरीका द्वारा ईरान के विरुद्ध यह हमला शुरू किया गया था, जिसके संबंध में अब उसे नमोशी से गुज़रना पड़ रहा है। वर्ष 1979 में 47 वर्ष पहले ईरान के शाह का तख्ता पलट कर वहां इस्लामिक शासन स्थापित किया गया था। उसके बाद अमरीका और अन्य यूरोपियन देशों द्वारा उस पर तेल और अन्य वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा  दिए गए थे, जिस कारण ईरान को कड़ी समस्याओं में से गुज़रना पड़ा। देश के भीतर इस्लामिक सरकार द्वारा अनेक तरह के प्रतिबन्ध लगाए जाने के कारण वहां ज्यादातर लोग, विशेष रूप से महिलाओं ने कई बार ब़गावत की, परन्तु इन ब़गावतों को सख्ती से दबा दिया जाता रहा। खाड़ी देशों को भी लगातार ईरान से ़खतरा महसूस होता रहा है, जिसके लिए अमरीका ने इन देशों में अपने सैन्य ठिकाने बनाए थे। इज़रायल के लिए भी वह इसी कारण ़खतरा बना रहा, क्योंकि हमास, हिज्बुल्लाह और हूती गुरिल्लों की वह इज़रायल के विरुद्ध लगातार सहायता करता आया है। इस युद्ध में ईरान का बहुत भारी नुकसान हुआ। इसका ज्यादातर मूलभूत ढांचा तबाह कर दिया गया। इसके साथ ही उसके सुप्रीम नेता आयतुल्ला अली खामेनेई और लगभग 40 मुख्य कमांडरों की भी हत्या कर दी गई थी। उसके परमाणु ठिकानों पर हमले किए गए और इन हमलों में हज़ारों ही लोगों के साथ बड़ी संख्या में बच्चे भी मारे गए।
ट्रम्प ने इस युद्ध से पहले वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति को हमला करके गिरफ्तार कर लिया था और वहां अपनी इच्छा से सरकार बना दी थी। शायद इसी भ्रम में ही इज़रायल के उकसाने पर ट्रम्प ने ईरान पर हमला किया था, जो अमरीका जैसी बड़ी शक्ति के लिए बेहद नुकसानदायक सिद्ध हुआ। 4 माह तक यह युद्ध हवाई हथियारों से ही लड़ा गया परन्तु अपने भारी नुकसान के बावजूद ईरान ने अमरीका के ठिकानों वाले 6 खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले कर उन्हें भारी नुकसान पहुंचाया और खाड़ी देशों में तेल सैक्टर के मूल ढांचे को भी अधिक सीमा तक नष्ट कर दिया। इज़रायल का भी इस युद्ध के दौरान भारी नुकसान हुआ, परन्तु उसका इसमें हासिल यह रहा कि उसने भी हिज़बुल्लाह, हूतियों और हमास का भारी नुकसान कर दिया है। आगामी समय में ईरान इन गुरिल्ला संगठनों की कितनी सहायता करने में समर्थ हो सकेगा, यह देखने वाली बात होगी, परन्तु इस सब कुछ के बावजूद अमरीका को इसलिए नमोशी सहन करनी पड़ी है क्योंकि जिन उद्देश्यों को लेकर उसने यह युद्ध शुरू किया था वह अधूरे ही रह गए हैं। दूसरी तरफ ईरान इसमें मज़बूत होकर निकला है। इस समझौते में ईरान ने होमुज़र् जल मार्ग बिना शर्त खोलने पर सहमति दी है परन्तु उसकी ओर से परमाणु बम बनाने या यूरेनियम को भरपूर बनाने की सीमा निश्चित करने संबंधी अभी फैसला नहीं लिया गया। ट्रम्प इस बात से संतुष्टि प्रकट कर सकते हैं कि उन्होंने होमुज़र् जल मार्ग खोलने के लिए ईरान को सहमत कर लिया है और ईरान को परमाणु बम न बनाने के लिए भी सहमत कर लिया है। ट्रम्प ने समझौते के लिए इस कारण भी जल्दबाज़ी की है कि आगामी नवम्बर माह में अमरीका में मध्यकालीन चुनाव होने जा रहे हैं। वह इस समझौते को अपने पक्ष में इस्तेमाल कर सकते हैं। ईरान को अब यह लाभ भी मिल गया है कि उस पर 47 वर्ष पहले लगाए गए प्रतिबन्ध समाप्त हो गए हैं। वह अपनी इच्छा से तेल का निर्यात कर सकेगा और उसकी विदेशों में प्रतिबन्धित सम्पत्तियों संबंधी भी छूट मिल जाएंगी।
ईरान ने इस संधि द्वारा इस बात पर भी सफलता हासिल की है कि उसके मूलभूत ढांचे के हुए बड़े नुकसान के पुनर्निर्माण के लिए उसे 28 लाख करोड़ रुपये मिलेंगे। यह राशि भी खाड़ी देशों को देनी पड़ेगी, जबकि इस युद्ध में संयुक्त राष्ट्र अमीरात, कुवैत, कतर और सऊदी अरब का भी बड़ा नुकसान हुआ है। भारत के लिए यह समाचार कई तरह से राहत वाला है। यह अपनी ऊर्जा की ज़रूरतों के लिए लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करता है। होमुज़र् जल मार्ग के खुलने से उसे लाभ होगा। ईरान पर प्रतिबन्ध हटाए जाने से भारत उससे भी तेल खरीद सकेगा और चाबहार बंदरगाह, जिसके निर्माण पर भारत ने अब तक 1400 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, उसके भी पुन: खुलने से भारत-ईरान द्वारा अ़फगानिस्तान और केन्द्रीय एशिया के देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंध को भारी बल दे सकता है। इसलिए इस समझौते से भारत सहित विश्व भर के देशों ने एक बड़ी राहत महसूस की है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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