अवैध बांग्लादेशियों को वापस भेजने में आ रही दिक्कत
बांग्लादेशी अवैध प्रवासियों को अब तलाशने की ज़रूरत नहीं पड़ रही। लोग खुद वेरिफिकेशन कराने और अपनी पहचान दर्ज कराने तथा बांग्लादेश वापस जाने के लिए सीमावर्ती चैकपोस्ट पर पहुंच रहे हैं। मगर उन्हें बांग्लादेश भेजने की बजाए होल्डिंग सेंटर भेजा जा रहा है। सवाल यह है कि देश से चुन-चुनकर बांग्लादेशियों को वापस भेजने का वादा कब और कैसे पूरा किया जा सकेगा, साथ इस समस्या का समाधान कैसे निकलेगा?
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार कहा था कि अगर भाजपा पश्चिम बंगाल में सत्ता में आती है, तो बांग्लादेशी घुसपैठियों को चुन-चुनकर खदेड़ा जाएगा। पर जो लोग अवैध रूप से भारत आए थे, अगर ‘स्वेच्छा से’ वापस लौटना चाहें तो उनके खिलाफ कोई मुकद्दमा दर्ज नहीं किया जाएगा। सरकार आते ही मुख्यमंत्री सुवेंदू अधिकारी ने अवैध बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं पर कार्रवाई शुरू की। नई सरकार की कारगुजारी और गृहमंत्री के बयानों के चलते अवैध प्रवासी अब तलाशने नहीं पड़ रहे बल्कि भविष्य के भय से वे खुद बाल बच्चों समेत हर रोज़ सीमा पार कर बांग्लादेश में दाखिल होने के लिए 24 परगना के सीमावर्ती इलाकों में पहुंच रहे हैं। गृह मंत्रालय ने बीते महीने यह घोषणा की थी कि उसके पास इन्हें बांग्लादेश भेजने की पूरी कार्य योजना तैयार है। लेकिन यह योजना बीच में ही अटकी हुई है। डिटेक्ट और डिलीट का जो भी हो, परन्तु डिपोर्ट का मामला हिरासत से आगे नहीं बढ़ पा रहा है यानी बस होल्डिंग सेंटर तक। सवाल है कि बांग्लादेश अगर इन्हें अपना नागरिक मानने, उनकी पहचान करने से इन्कार कर देता है, तो फिर क्या होगा? उन्हें कैसे वापस भेजा जाएगा? फिलहाल कुछ भारतीय नेताओं के बयानों से नाराज़ बांग्लादेश ने इसे अपनी संप्रभुता का मामला बना अवैध प्रवासियों को अपना न मानने की हठधर्मी पर उतारू है, ऐसे में बांग्लादेशी होने का स्वयंभू दावा करने वाले इन प्रवासियों या भविष्य में पहचाने वाले अवैध प्रवासी न घर के रहेंगे न घाट के यानी हिंदुस्तान के। सरकारी और गैर-सरकारी आंकड़ा ऐसे प्रवासियों की संख्या डेढ़ से दो करोड़ बताता है, इस तरह तो यह समस्या देश और उन पर यानी दोनों पर भारी पड़ेगी।एक ही महीने में दोनों देशों की सीमा सुरक्षा बलों के बीच कई बार आमना-सामना और आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिल चुका है, तो बांग्लादेश सरकार भी आंखे तरेर रही है कि भारतीय सीमा सुरक्षा बल मौका देखकर भारतीयों को या जो प्रमाणिक तौर के बांग्लादेश के नहीं हैं अथवा रोहिंग्या शरणार्थी हैं, उन्हें गलत तरीके से उनके देश में ढकेल रहा है। उसकी ऐसी कई कोशिशों को उसके बांग्लादेश बार्डर गार्ड ने विगत कुछ ही दिनों में विफल किया है। वहां के विदेश राज्यमंत्री ने बयान दिया है कि बांग्लादेश एक भी ऐसे व्यक्ति को बांग्लादेश में वापस नहीं लेगा। इस प्रकार की कार्रवाई न केवल अस्वीकार्य है बल्कि सीमा पार आवागमन को नियंत्रित करने वाले अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और प्रोटोकॉल का भी उल्लंघन है। बांग्लादेश बार्डर गार्ड के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल 7 मई से इस साल 26 जनवरी तक आठ महीनों की अवधि में भारत से 2,479 लोगों को बांग्लादेश में धकेला गया। इनमें से कम से कम 120 लोगों की पहचान बाद में भारतीय नागरिकों के रूप में हुई, जबकि कुछ रोहिंग्या शरणार्थी भी थे। वह असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के उस विवादास्पद साक्षात्कार का हवाला देता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि बांग्लादेशी नागरिकों को विदेश मंत्रालय के जरिए आधिकारिक तरीके से, वापस भेजना बहुत मुश्किल है। इसमें बहुत देर लगेगी।
इसके बजाय लोगों को ‘रात के अंधेरे का फायदा उठाकर, उन जगहों पर जहां बीडीआर (अब बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश) मौजूद नहीं होती, वापस धकेल दिया जाता है। भारतीय सीमा सुरक्षा बल ऐसे लोगों को तब तक ही हिरासत में रखती है, जब तक उन्हें वापस बांग्लादेश भेजने का सही मौका नहीं मिल जाता।’ सरमा की टिप्पणियों को द्विपक्षीय संबंधों के लिए ‘अपमानजनक’ बताते हुए बांग्लादेश मानवाधिकार हनन संबंधी मुद्दे भी उठा रहा है। मानवाधिकार समूह एनओ सालिश केंद्र ने 2026 के पहले चार महीनों में बीएसएफ की गोलीबारी में मारे गए कम से कम चार बांग्लादेशियों के दस्तावेज़ीकरण का दावा किया तो शोंगस्कृति फाउंडेशन ने कहा कि अकेले मई में ही बीएसएफ ने चार बांग्लादेशियों मार दिया। बांग्लादेशी मीडिया इन घटनाओं को मानवाधिकार, अंतर्राष्ट्रीय कानून और द्विपक्षीय विश्वास के प्रश्नों से जोड़कर वहां अनुचित तरीके से उत्तेजना फैला रहा है और भारत विरोध को हवा दे रहा है। जबकि भारत का दृष्टिकोण अवैध प्रवासन, सीमा सुरक्षा और सत्यापित विदेशी नागरिकों की वापसी से जुड़ा हुआ है और नितांत व्योहारिक है।
बांग्लादेश बखूबी जानता है कि पश्चिम बंगाल, असम और पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में अवैध घुसपैठ भारत में राजनीतिक और सामाजिक बहस का दशकों पुराना और जायज मामला है। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

