सपने दिखाते हो तो पूरे भी करें

केंद्र में पिछले 12 साल से और अनेक प्रदेशों में 10-15 वर्षों से भाजापा सरकारें चल रही हैं। जब आए थे तो दो करोड़ लोगों को प्रति वर्ष रोज़गार देने, 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने और देश में गिफ्ट सिटी, स्मार्ट सिटी तथा औद्योगिक नगर बनाने का वायदा किया। वास्तविकता यह है कि बहुत कम काम हुआ। योजनाबद्ध समय-सारणी के अनुसार नीतियां बनाने की बजाय लोगों को गुमराह करने तथा धोखा देने का यत्न हुआ है।
पहले प्रोजेक्ट, फिर आधारभूत ढांचा : बहुप्रचारित ज़ेवर एयरपोर्ट, यमुना एक्सप्रेसवे टाउनशिप और औद्योगिक नगरी तथा फिल्म सिटी बनाने की बात हुई। 2003 में एयरपोर्ट को मंज़ूरी मिली। 2014-17 में ज़मीन अधिग्रहण, 2021 में आधारशिला और जून में घरेलू उड़ान शुरू हुई। यहां से हर साल सवा करोड़ यात्रियों के उड़ान भरने की बात कही गई जो 5 रनवे बनने के बाद 23 करोड़ हो जाएंगे। इसी तरह शहरों में उद्योग लगाने, आवासीय योजना, उद्योगों की स्थापना, संस्थागत प्लाट, स्कूल, अस्पताल के लिए जगह और उद्योगपतियों तथा उद्यमियों के लिए योजनाएं घोषित की गईं। साइन बोर्ड लग गए, उद्घाटन हुए और इस क्षेत्र की ही नहीं, पूरे प्रदेश की आर्थिक उन्नति के ़ख्वाब दिखाए। 
हकीकत देखिए। सरकार के एजेंडे में ही नहीं था कि एयरपोर्ट और अन्य जगहों पर श्रमिक, कर्मचारी, अधिकारी और कारखानेदार तथा उद्यमी यहां तक कैसे पहुंचेंगे। स्थिति यह है कि आवंटित प्लाट की पहचान मुश्किल है क्योंकि झाड़ झंखाड़, जंगल जैसी हालत, सड़क नदारद, बिजली, पानी की समस्या और अपने काम करने की जगह तक पहुंचना लगभग असंभव। अधिकारी से मिलो तो सुनने को मिला कि इंतज़ार करो और किस्ते समय पर देते रहना वरना प्लाट पर कब्ज़ा कर लेंगे। निवेशक का सपना चकनाचूर हो गया। 
यही हालत पूरे देश में है : 1970 में नवी मुम्बई की घोषणा हुई ताकि बॉम्बे पर दबाव कम हो सके, लेकिन अभी तक आधारभूत सुविधाएं नहीं हैं। गुजरात में 2007 में गिफ्ट सिटी घोषित हुई, लेकिन पहली इमारत 2015 में बनी। सरकार की नीति यह रही कि पहले प्लाट बेचो उसके बाद मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। सरकार को यह बात समझने में बहुत देर लगी कि जिन देशों में शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों का विकास हुआ, उन्होंने पहले ढांचागत सुविधाओं को विकसित करने पर ध्यान दिया और उसके बाद उद्यमियों तथा निवासियों को आने के लिए प्रोत्साहित किया। सरकार को गतिशक्ति जैसी योजनाएं मज़बूरन लानी पड़ीं वरना लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ता। 
जिन्होंने पैसा लगाया, अफसोस करने लगे कि कहां फंस गए। ऐसी अवस्था में निराशाजनक वातावरण, युवाओं का आक्रोश, बढ़ती बेरोज़गारी और महंगाई के कारण आत्महत्या जैसे कृत्य बढ़ने ही थे। इसका कारण यह कि भारत एसेट खड़े कर रहा है लेकिन जीविका का साधन नहीं बन रहे। चीन ने अस्सी करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाल कर आत्मनिर्भर बनाया और भारत इतने ही लोगों को मुफ्त अनाज देकर उनका पेट भर रहा है और सरकार का आश्रित बना रहा है। औद्योगिक सेक्टर में 85 प्रतिशत उद्योगों में से केवल 12 प्रतिशत ढंग से चल रहे हैं। सरकार पहले किसानों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर उन्हें मुआवज़ा देकर बेसहारा बनाती है, उनकी आमदनी बढ़ाने के स्थान पर उनकी उपज का सही मूल्य भी नहीं दे पाती। 
सच का सामना : सरकार कभी नहीं सोचती कि उद्यमी हो या निवासी, उसे वायदे नहीं, यथार्थ यानी झूठ के रास्ते के स्थान पर वास्तविक जीवन जीने की कला चाहिए। सरकार को अगर नौकरियों का वादा पूरा करना है तो लैंड बैंक का मॉडल छोड़कर जॉब बैंक मॉडल पर चलना होगा, यह न हुआ तो 2047 तक विकासशील ही रहेंगे। 
प्रश्न उठता है कि जब नौकरी नहीं तो कैसा और किसका विकास हो रहा है? देश को पांचवी अर्थव्यवस्था बनाना कोई ऐसा मैडल नहीं है जिस पर गर्व हो, क्योंकि एक आदमी की जेब में खर्च करने को पैसा ही नहीं है, उपयोगी वस्तुओं से लेकर दवाइयों तक का खर्च उठाना कठिन है। हर साल दो करोड़ लोगों को आजीविका के साधन देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जा सकता था लेकिन वे गरीबी से जूझ रहे हैं, किसान की दुगनी से अधिक आमदनी हो सकती थी लेकिन वह सरकारी नियमों और बेमतलब बातों में उलझकर रह गया।   मेक इन इंडिया हो या मैन्युफेक्चरिंग हब का वायदा हो, अगर समय सीमा नहीं है तो कोई सपना पूरा नहीं हो सकता। हमारे देश में पैसे की कमी नहीं है लेकिन नीयत साफ न होने से लोगों की ज़िन्दगी मुश्किल होती जा रही है। इस पर जितनी जल्दी सोचा जाएगा, उतना अच्छा होगा वरना बाज़ी पलट सकती है। 

#सपने दिखाते हो तो पूरे भी करें