दल-बदल विरोधी कानून में सुधार की सख्त ज़रूरत

अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार एक लेजिस्लेटिव पैकेज संसद के विशेष अधिवेशन में लेकर आयी, जिसका उद्देश्य लोकसभा की सीटों को 545 से बढ़ाकर 850 करना, 2011 की जनगणना के आधार पर चुनावी क्षेत्रों का परिसीमन करना और लोकसभा व विधानसभाओं में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण को 2026 की जनगणना की शर्त से अलग करना था। चूंकि 131वें संविधान संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी, जो सरकार के पास न था, इसलिए यह पैकेज पारित न हो सका, जोकि महिला आरक्षण कानून की आड़ में लाया जा रहा था। इसके बाद जब पांच राज्यों (असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरलम व पुडुचेरी) में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हो गये तो राजनीतिक पार्टियां अचानक टूटने लगीं या तोड़ी जाने लगीं। पहले राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी (आप) के सात सांसद अलग होकर भाजपा में शामिल हो गये, फिर पश्चिम बंगाल में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस दोफाड़ हुई, उसके 20 सांसद बागी होकर नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में शामिल हो गये, जोकि है तो पश्चिम बंगाल की अमान्यता प्राप्त पार्टी, लेकिन उसने त्रिपुरा 2023 विधानसभा में अपने तीन उम्मीदवार उतारे थे, जिन्हें कुल मिलाकर 822 वोट मिले थे व वित्तीय वर्ष 2022-23 का उसका क्लोजिंग बैलेंस मात्र 75 रुपये था, जिससे यह अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है कि तृणमूल बागियों ने सत्तारूढ़ एनडीए का हिस्सा बनने के लिए एक नये रास्ते का चयन किया है, इसलिए एनसीपीआई के हावड़ा में अंदुल स्थित दो कमरे के मुख्यालय की चौकीदारी बीएसएफ व बंगाल पुलिस कर रही है। 
अब शिव सेना (उद्धव) के 9 में से 6 सांसद बागी हो गये हैं और प्रबल संकेत यह हैं कि वह शिव सेना (शिंदे) में शामिल होकर एनडीए का समर्थन करेंगे। गौरतलब है कि शिव सेना (उद्धव) ने व्हिप जारी करके 18 जून, 2026 को नई दिल्ली के अपने संसदीय ऑफिस में अपने सांसदों की महत्वपूर्ण बैठक बुलायी थी, लेकिन उसमें सिर्फ तीन सांसद- अरविंद सावंत, अनिल देसाई व राजाभाऊ वाज़े ही पहुंचे, जिनमें से एक राज्यसभा के सदस्य हैं। बागी सांसदों के नेताओं ने 17 जून, 2026 को लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला से मुलाकात करके लोकसभा के 9 में से 6 सांसदों के समर्थन का दावा किया था। पार्टियों की तोड़-फोड़ से ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा अपने अप्रैल के लेजिस्लेटिव पैकेज को सदन में पुन: लाने की तैयारी कर रही है और उसके लिए दो-तिहाई बहुमत का जुगाड़ कर रही है। लेकिन यह लेख भाजपा की संभावित योजना से संबंधित नहीं है। यहां कुछ बुनियादी प्रश्न हैं, क्या दल-बदल कानून मात्र कागज़ का टुकड़ा बनकर रह गया है? एक मतदाता जब चुनाव में अपने क्षेत्र से किसी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करता है, तो वह उसकी राजनीतिक पार्टी की विचारधारा से सहमत होने के कारण करता है या उसे विश्वास होता है कि संबंधित पार्टी अपने वायदों व घोषणापत्र के अनुसार कार्य करेगी, सत्ता में आने के बाद।  ऐसे में प्रतिनिधि जब अपनी मज़र्ी, लालच, दबाव या किसी अन्य कारण से दलबदल कर लेता है, तो बेचारा मतदाता तो ठगा-सा रह जाता है। इस स्थिति में क्या यह अनिवार्य नहीं होना चाहिए कि सांसद व विधायक न तो उस पार्टी को छोड़ सकें जिससे जीतकर आये हैं और न उसे तोड़ सकें? अगर वह अपनी पार्टी के नेतृत्व से असहमत हैं तो उन्हें अपनी सदस्यता से इस्तीफा देकर पुन: जनता के समक्ष जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त मतदाताओं को भी बागी हुए अपने प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। यह लोकतंत्र को मज़बूत करने के लिए आवश्यक है।
बहरहाल, वर्तमान घटनाक्रम संविधान की दसवीं अनुसूची जिसे दल-बदल विरोधी कानून भी कहते हैं को फोकस में ले आता है। यह कानून 1985 में चुने हुए प्रतिनिधियों की इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए लाया गया था कि वह एक पार्टी से दूसरी में कूदकर तख्ता पलटते हैं। लिहाज़ा इस कानून के तहत सदन के पीठासीन अधिकारी को यह अधिकार प्रदान होता है कि एक सदस्य की याचिका पर दलबदलू को अयोग्य घोषित कर दे। इस कानून में दो प्रकार के दलबदल का संज्ञान है- 1. सदस्य अपनी इच्छा से उस पार्टी की सदस्यता त्याग दे जिसके चुनाव चिन्ह पर वह चुना गया था; 2. सदस्य पार्टी द्वारा जारी की गई मतदान व्हिप का जान-बूझकर उल्लंघन करे या मतदान से अनुपस्थित रहे। हालांकि पार्टी व्हिप का उल्लंघन अयोग्य घोषित किये जाने का सीधा तरीका है, लेकिन अन्य तरीके विवाद व मुकद्दमों का स्रोत रहे हैं। ‘अपनी इच्छा से सदस्यता छोड़ना’ साधारण त्याग-पत्र व औपचारिक रूप से दूसरी पार्टी में शामिल होना नहीं है। 
गौरतलब है कि दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 4 के तहत दल-बदल के आधार पर अयोग्यता उस समय लागू नहीं होगी जब एक पार्टी का दूसरी में विलय हो जाये। लेकिन इसमें पेच यह है कि पार्टी के कुल सदस्यों के कम से कम दो तिहाई सदस्यों का विलय करना आवश्यक है। पहले दसवीं अनुसूची में अयोग्यता नियम के अपवाद के रूप में पार्टी में ‘विभाजन’ की बात कही गई थी कि अगर लेजिस्लेचर पार्टी के एक-तिहाई सदस्य उसे छोड़ देते हैं या दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं, तो इसे ‘विभाजन’ माना जायेगा और ऐसे सदस्यों को अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता। इससे जब बहुत अधिक दल-बदल होने लगा व पार्टियां टूटने लगीं तो 2003 में 91वें संविधान संशोधन के ज़रिये पैराग्राफ 3 को दसवीं अनुसूची से हटा दिया गया, जिसमें ‘विभाजन’ का अपवाद प्रावधान था। इस पृष्ठभूमि में यह सवाल उठता है कि क्या दल-बदल विरोधी कानून अर्थहीन हो गया है? यह प्रश्न इस लिहाज़ से अधिक प्रासंगिक है कि पक्षपाती राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति करने के लिए पार्टियां, सदस्य व स्पीकर्स इस कानून से बचने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाते हैं। 
आजकल तो ‘इस्तीफे के ज़रिये दल-बदल’ का चलन आम हो गया है, इस कानून से बचने के लिए। इस पर सुप्रीम कोर्ट को कहना ही पड़ा कि स्पीकर के पास यह अधिकार है कि वह इस्तीफे के ऐच्छिक व वास्तविक होने की जांच करे, लेकिन यह साबित करना कठिन है कि इस्तीफा अपनी मर्जी से दिया गया है या नहीं और इस्तीफे के पीछे का उद्देश्य ज़ाहिर होते हुए भी औपचारिक तौर पर सिद्ध करना मुश्किल है। 
इसलिए दल-बदल बे-रोकटोक जारी है, खासकर इसलिए कि स्पीकर अपनी राजनीतिक वफादारी के कारण कार्रवाई नहीं करते हैं। दरअसल, दल-बदल विरोधी कानून में सुधार की सख्त ज़रूरत है।  
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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