रस्किन बॉन्ड में ऐसा क्या है ?

वह आठ वर्ष के थे, जब उसके माता-पिता अलग हो गये। उनकी मां ने दूसरी शादी कर ली। वह अपने पिता से बहुत प्यार करते थे, परन्तु दो वर्ष के बाद 10 वर्ष की आयु में पिता की मौत हो गई।
नाम तो बहुत सुना था, परन्तु नज़दीक से जान पहचान तब हुई जब मसूरी दौरे के दौरान होटल के कमरे के टेबल पर खूबसूरत ‘कॉफी टेबल बुक’ पड़ी देखी ‘दा मसूरी इयर्स’ टाइटल पर टाइपराइटर के आगे बैठे रस्किन बॉन्ड की बड़ी तस्वीर थी। टाइपराइटर के आस-पास किताबें पड़ी थी। हम जितने दिन मसूरी रहे मैं उस कॉफी टेबल बुक को देखता रहा।
घर आकर जब तक वह किताब दिल्ली से मंगवा न ली, तब तक चैन नहीं मिला।
रस्किन बॉन्ड मुझे बहुत प्यारे हैं। इसलिए नहीं कि विश्व प्रसिद्ध लेखक हैं। इसलिए भी नहीं कि ब्रिटिश अधिकारी के बेटे हैं। बल्कि इस लिए कि बचपन में अनेक तूफान झेलने के बावजूद उन्होंने अपना वजूद बचा कर रखा। ज़िंदगी अपनी शर्तों पर सहज, शांत बसर की। अंतत: अपनी रचनाओं का लोहा मनवाया। मई 2026 में उसने ज़िंदगी के गौरवमयी 92 साल पूरे कर लिए हैं।  माता-पिता का हाथ सिर पर नहीं था। गार्डियन के सख्त व्यवहार ने उसको और परेशान कर दिया। एक दिन मार खाने के बाद रस्किन गुस्से में घर से भाग गए। जीवन की इन दुखद स्थितियों ने ‘रस्टी’ नामक किरदार को जन्म दिया। रस्टी किरदार का इस्तेमाल उन्होंने अपने बचपन और जवानी की परिस्थितियों को दर्शाने के लिए किया।
ब्रिटिश मूल के होने के बावजूद उसका दिल भारतीय है। उनका जन्म भारत में हुआ। प्राथमिक पढ़ाई यहां की, परन्तु अच्छे जीवन के लिए अपनी मौसी के पास इंग्लैंड चले गए। कुछ समय बाद उन्हें अहसास हुआ कि वह भारत के बिना नहीं रह सकते और हमेशा के लिए भारत आ गए।
गुमसुम रहने वाला नौजवान जब अपना अकेलापन दूर करने के लिए पहाड़ों की ओर गया तो वहां का ही होकर रह गया। पिछले 64 वर्ष से वह मसूरी में रह रहे हैं। उसे पहाड़ अपनी ओर आकर्षित करते हैं। वादियां, झरने, वृक्ष अच्छे लगते हैं, क्योंकि उनका बचपन पहाड़ों में गुज़रा था। 
रोज़ाना जीवन की ज़रूरतों की पूर्ति के लिए रस्किन कुछ वर्ष दिल्ली और देहरादून के प्रमुख समाचार पत्रों के लिए आर्टीकल लिखते रहे।
21 वर्ष की आयु में उन्होंने अपना पहला नावल ‘रूम ऑन दा ऱूफ’ प्रकाशित करवाया। इस नावल के लिए उन्हें ‘जॉन लेवेनिन राइस पुरस्कार’ मिला। इस पुरस्कार से मिली राशि का उन्होंने भारत आकर देहरादून में रहने के लिए उपयोग किया।
1963 वह वर्ष था जब उन्होंने ‘हॉल टाइमर’ लेखक बनने का फैसला किया और मसूरी रहने के लिए चले गए। मसूरी का माहौल, शांत वातावरण और वादियों से उन्हें प्रेरणा मिलती है।
रस्किन जैसे-जैसे जीवन में आगे बढ़े वैसे-वैसे उसके अनुभव ने उसकी कहानी बताने की कला, शैली और समझ को प्रभावित किया।
उनकी रचनाओं की विशेषता है कि उनमें हिमालय की गोद में बसी साधारण ज़िंदगी, प्रकृति और बच्चों का बचपन धड़कता है।
उनकी स्वै-जीवन ‘लोन फॉक्स डांसिंग’ उनके बचपन, पढ़ने-लिखने के प्रेम और प्रेरणा का वर्णन करती है।
17 वर्ष की आयु में लिखना शुरू किया और जब तक शरीर साथ देता रहेगा तब तक उनका लिखते रहने का इरादा है।
अब तक रस्किन 150 से अधिक किताबें लिख चुके हैं। लिखना उनका शौक ही नहीं बल्कि जुनून और सबसे पसंदीदा काम है।
‘एक था रस्टी’ पर टैलीविज़न शो बन चुका है। ‘फ्लाइट ऑफ पिजन्स’ नावल पर आधारित ‘जुनून’ फिल्म बनी थी। इसी प्रकार उनके नावल ‘सुसाना के सैवन हसबैंड’ पर हिन्दी फिल्म ‘सात खून म़ाफ’ बन चुकी है।
रस्किन बॉन्ड की रचनाएं कोमल, भावपूर्ण और शांत है। मन को सुकून देने वालीं। जो सहज़ ढंग से जीवन के सबक सिखा जाती हैं। इसलिए उनके पाठकों में हर आयु के लोग शामिल हैं। प्रकृति, पाठकों और पहाड़ों के सुंदर वर्णन करने के कारण उनको ‘पहाड़ों का लेखक’ भी कहा जाता है।
उनकी रचनाओं के बहुत सारे असली पात्र मसूरी की सड़कों और आस-पास के क्षेत्रों में चलते-फिरते देखे जा सकते हैं।
मसूरी में शुरुआती दिनों में लोग उनको पहचान लेते और लंच या डिनर के लिए घर आने के लिए कहते।
ऐसे धीरे-धीरे रस्किन बॉन्ड मसूरी के चर्चित चेहरा बन गए। समय के साथ उनकी रचनाओं ने उन्हें भारत व पूरी दुनिया में प्रसिद्ध कर दिया।
मसूरी में रस्किन बॉन्ड ने शानदार जीवन व्यतीत किया। वह मसूरी निकट लैंडोर में रहते है। मसूरी शहर उन्हें बहुत प्यारा है। उन्हें बड़े शहरों की भाग-दौड़ वाला जीवन पसंद नहीं। पहाड़ों, पक्षियों, वृक्षों और प्रकृति से उनको लिखने के लिए प्रेरणा मिलती है।
उन्होंने पूरी उम्र विवाह नहीं किया। वास्तव में उनकी तबीयत ठीक नहीं। वह फिल्मी शैली वाली, अनेक मुश्किलों, रूकावटों में से निकलकर विवाह करवाना चाहते थे या फिर भारतीय मर्यादा अनुसार मां-बाप के कहे अनुसार। फिल्मी शैली वाली शादी का सबब न बना और उनके लिए बोलने वाले, कोशिश करने वाले मां-बाप मौजूद नहीं थे। दो बार विवाह होते-होते रह गया। रिश्ता टूट गया। रस्किन कहते हैं, ‘शायद मैं सुंदरता के पक्ष से कोई बहुत आकर्षक व्यक्ति नहीं, इसलिए’
19 जनवरी 1958 को उन्होंने अपनी डायरी में लिखा, ‘जो चीज़ें, जो काम मैंने अपने-आप अकेले, बिना किसी की सलाह, मंज़ूरी या मदद के किए, वही मैं अच्छे ढंग से कर सका।’
वह कहते हैं, ‘ज़िंदगी गुलाब के फूलों की सेज नहीं। बावजूद इसके मूझे अनेक बेमौसमी गुलाब मिलते रहे हैं।’
उन्होंने जीवन में जो कुछ गंवाया उसका हिसाब नहीं, परन्तु जो कुछ प्राप्त किया उससे वह खुश और संतुष्ट हैं।
रस्किन बॉन्ड का एक प्रशंसक उनको कहता है, ‘मैं आपकी तरह एक लेखक बनना चाहती हूं, ताकि घास पर लेटा रहूं और कुछ भी न करूं।’
उसको नहीं पता था कि घास पर लेटकर कोई 50 वर्ष तक कुलवकती लेखक नहीं बना रह सकता।
उसके लिए उठना पड़ता है, कपड़ों से घास के तिनके झाड़कर, हाथ मुंह धोकर, लिखने के लिए मेज़ पर टाइपराइटर के सामने बैठना पड़ता है। 
वह तकनीक का बहुत कम उपयोग करते हैं कागज़, कलम और शांत समय उनकी प्राथमिकता है।
बहुत मान-सम्मान मिलने के बावजूद वह नम्र और मिलनसार व्यक्ति हैं। पूरी उम्र अपनी जड़ों के साथ जुड़े रहने के कारण उनकी रचनाओं में भी वह गहराई मिलना स्वाभाविक है।
1992 में रस्किन बॉन्ड को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला । 1999 में पद्म श्री और 2014 में पद्म भूषण।
व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं होता। उसका योगदान महत्वपूर्ण होता है। जश्न योगदान का मनाया जाता है।
आओ, रस्किन बॉन्ड के योगदान का जश्न मनाएं।

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