सचिन की बहादुरी

गांव में कोई स्कूल नहीं होने के कारण गांव के बच्चों को प्रतिदिन तीन से चार किमी दूर पढ़ने के लिए जाना पड़ता था और छुट्टी के बाद इतना ही पैदल चलकर वापस आना पड़ता था। शुरु शुरु में तो गोपाल, सुनील, चेतन को बड़ी परेशानी आने जाने में होती थी लेकिन सचिन ने उनकी हिम्मत बंधाई और सभी साथी एक साथ स्कूल आने जाने लगे। रास्ते में गप-शप लड़ाते जिससे समय आसानी से निकल जाता और दूरी का पता भी नहीं चलता। 15 अगस्त आने वाला था। स्कूल में 15 अगस्त की तैयारियां चल रहीं थीं। इसी बीच 15 अगस्त से दो दिन पूर्व बच्चे स्कूल जा रहे थे तभी सचिन ने देखा कि एक तेंदुआ एक बच्ची पर हमला करने वाला हैं। उसने बिना सोचें-समझें बच्ची को एक ओर कर तेंदुए से बचा लिया। इससे गुस्साए तेंदुए ने इस बार बच्चों की टोली पर हमला बोल दिया। लेकिन बहादुर सचिन उस तेंदुए से भीड़ गया और खुद जख्मी हो गया लेकिन अपने साथियों व बच्ची को तेंदुए के हमले से बचा लिया।
इसी दौरान कुछ गांव वाले अपने खेतों की ओर जा रहें थे जब उन्होंने सचिन व तेंदुए को लड़ते देखा तो लठ बजाकर तेंदुए को वहां से भगाया और सचिन को गांव के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर उपचार के लिए ले गये। वहां उसका प्राथमिक उपचार किया गया। इधर गोपाल, सुनील व चेतन घबराएं हुए स्कूल पहुंचे और प्रधानाध्यापक को सारी बात बताई। वे तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र पहुंचे और डॉक्टर से सचिन के स्वास्थ्य की जानकारी ली।  प्रधानाध्यापक ने इस घटना की जानकारी सचिन के परिजनों, शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों, ज़िला कलेक्टर व वन विभाग के अधिकारियों को दी। दूसरे समाचार पत्रों में सचिन की बहादुरी की खबरें प्रकाशित हुई। 15 अगस्त को ज़िला कलेक्टर ने अस्पताल पहुंच कर सचिन को उसकी बहादुरी के लिए राष्ट्रीय स्तरीय बहादुरी पुरस्कार से सम्मानित किया और उसके परिजनों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि धन्य है ऐसे माता-पिता जिन्होंने ऐसे बहादुर बच्चे को जन्म दिया। कुछ दिनों के उपचार से सचिन स्वस्थ हो गया और उसने कहा कि मैंने तो अपना फर्ज अदा किया। बचाने वाला तो वह परमात्मा हैं, मैं नहीं। यह सुनकर सभी बच्चों व गांव वालों ने तालियां बजाकर सचिन का जोरदार स्वागत व अभिनन्दन किया। (सुमन सागर)

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